काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 858, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें४९८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विसर्पचिकित्सिताध्यायः १४]
अवस्था में कट जाने से, वेगों के धारण करने से तथा खट्टी दही, मन्दक (जो दही पूरी न जमी हो), सुरा, शुक्त (सिरका), सौवीर (निस्तुष जौ से बनाई हुई कांजी), तिल, उड़द, कुलत्थ, प्याज, लहसुन, ग्राम्य आनूप (जलीय भूमि में रहनेवाले) तथा औदक (जल में रहनेवाले-जलचर) पशुपक्षियों के मांस आदि के अधिक सेवन करने से, विरुद्ध भोजन, गुरु, अभिष्यन्दि (स्रोतों के मार्गों का रोध करनेवाले), पूति (दुर्गन्धियुक्त) तथा पर्युषित (बासी) भोजन करने से, दिन में सोने से, अजीर्ण से तथा शाकों और उड़द की पिट्ठी आदि से बने हुए पदार्थों के अधिक सेवन से, विष से दूषित हुए वायु, जल एवं वस्त्र से, जल तथा अन्न के सेवन करने से-उपर्युक्त तथा दूसरे कारणों से दूषित हुए वातादि (वात, पित्त, कफ) दोष बालक के शरीर में रक्त आदि (रक्त, मांस, त्वचा, लसीका आदि दूष्यों) को दूषित करके विसर्प रोग को उत्पन्न कर देते हैं। इसी प्रकार जब शिशु प्रकुपित हुए दोषों से दूषित दूध का सेवन करता है तब भी उस दूध के दोष के कारण विसर्प रोग हो जाता है ॥१०-१४॥
वातिकः पैत्तिकश्चैव श्लैष्मिको द्वन्द्वजास्त्रयः ।।१५।।
सन्निपाताच्च सप्तैते वैसर्पाः समुदाहृताः ।
विसर्प के भेद— १. वातिक, २. पैत्तिक, ३. श्लैष्मिक, ४. ५. ६ द्वन्द्वज तीन (वातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, पित्तश्लैष्मिक) ७. सान्निपातिक। इस प्रकार ये ७ विसर्प होते हैं। चरक में तीनों द्वन्द्वज विसर्पों के नाम क्रमशः आग्नेयविसर्प, ग्रन्थिविसर्प तथा कर्दमविसर्प दिये हैं ॥१५॥
न विना रक्तपित्ताभ्यां वैसर्पो जातु जायते ।।१६।।
रक्ताश्रयो रक्तभवः पित्तं रक्ते व्यवस्थितम्। तस्माद्रक्तावसेकोऽत्र भेषजं परमुच्यते ।।१७।।
बलकालवयोदोषदेशदेहव्यपेक्षया ।
रक्त तथा पित्त से बिना कभी विसर्प नहीं होता है। यह (विसर्प) रक्त के आश्रित होता है तथा रक्त से उत्पन्न होता है। और पित्त भी रक्त में स्थित होता है। इसलिये इसमें रोगी के बल, काल, अवस्था, दोष, देश तथा शरीर के अनुसार रक्तमोक्षण करना श्रेष्ठ चिकित्सा कही गई है। चरक चि. अ. २१ में कहा है— 'रक्तपित्तान्वये' अर्थात् प्रत्येक विसर्प में रक्त एवं पित्त का अनुबन्ध होता है। इसी से आगे कहा है— 'रुधिरस्यावसेकं च तंन्द्यस्याश्रयसंज्ञितम्' अर्थात् इसमें रुधिर का अवसेचन (रक्तमोक्षण) हितकर होता है क्योंकि रुधिर (रक्त) विसर्प का आश्रय कहा गया है। दूषित रक्तरूपी आश्रय के नष्ट हो जाने से विसर्प भी नष्ट हो जायेगा ॥
लक्षणान्यत ऊर्ध्वं तु प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ।।१८।।
अब मैं प्रत्येक विसर्प के क्रमशः पृथक् २ लक्षण कहूँगा।
हेतुभिः पूर्वमुद्दिष्टैर्यदा प्रकुपितोऽनिलः। रक्तादीन्यभिदूष्याशु वै ............. ।।१९।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २३४ तमं पत्रम्)
जब पूर्व निर्दिष्ट वातप्रकोपक हेतुओं के कारण वायु प्रकुपित होकर रक्त आदियों (रक्त, मांस, त्वचा तथा लसीका आदि दूष्यों) को दूषित करता है तब शीघ्र ही विसर्प रोग उत्पन्न हो जाता है।
वक्तव्य—यहां आचार्य ने विसर्प की त्रिदोषजता बतलाने के लिये ही रूक्ष, उष्ण तथा पूरण—ये तीन कारण दिये हैं। रूक्षता से वायु, उष्णता से पित्त तथा पूरण (पेट भर कर अन्न खाना) से कफ के संसर्ग की ओर संकेत किया गया है ॥१९॥
वातरक्तज्वर ..... स्फोटांश्चैष न .... येत्। वातिक विसर्प के लक्षण—उसके शरीर में वातरक्त, ज्वर......तथा स्फोट (फोड़े)....आदि हो जाते हैं। चरक चि. अ. २१ में निम्न लक्षण दिये हैं—भ्रमदवथुपिपासानिस्तोदशूलाङ्गमर्दोद्वेष्टनकम्प-