काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविसर्पचिकित्सिताध्यायः १४] खिलस्थानम् ४९९
ज्वरतमककासास्थिसन्धिभेदविश्लेषणवनसनारोचकविपाकाश्रुश्वोशराकुलत्वमस्रागमनं पिपीलिकासंचार इव चाङ्गेषु, यस्मिंश्चावकाशे विसर्पोऽनुविसर्पति सोऽवकाशः श्यावारुणावभासः श्वयथुमान् निस्तोदभेदशूलायाससंकोचहर्षस्फुरणैरतिमात्रं प्रपीड्यते, अनुपक्रान्तश्चोपचीयते शीघ्रप्रभेदैः स्फोटकैस्तनुभिररुणाभैः श्यावैर्वा तनुविषमदारुणाल्यास्त्रावैर्विबद्धवातमूत्रपुरीषश्च भवति, निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते विपरीतानि चोपशेरत इति वातविसर्पः ।।
ऊर्ध्वाधःशुद्धदेहानां बहिर्मार्गाश्रिते मले । आदितश्चाल्पदोषाणां क्रियां कुर्यादिमां भिषक्^१ ।।
दोषों के बहिर्मार्गाश्रित होने पर तथा प्रारम्भ में दोषों के अल्प (कम शक्तिवाले) होने पर रोगी के शरीर का ऊर्ध्व एवं अधः शोधन (वमन विरेचन द्वारा) करके वैद्य को निम्न चिकित्सा करनी चाहिये ।
वक्तव्य—रोगों का बाह्यमार्ग चरक सू. अ. ११ निम्न दिया है—'तत्र शाखा रक्तादयो धातवस्त्वक् च, स बाह्यो रोगमार्गः ।'
लङ्घयित्वा यथाकालं कषायैः समुपक्रमेत् । प्रदेहैः परिषेकैश्च स्नेहैरभ्यञ्जनैरपि ।। रक्तावसेकैः पथ्यैश्च पानान्नौषधसेवनैः ।
रोगी की उचित काल में लंघन कराने के बाद कषाय, प्रदेह (लेप), परिषेक, स्नेह, अभ्यङ्ग, रक्तमोक्षण तथा पथ्यकारक पान, अन्न एवं औषधों के द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये ॥
वातवैसर्पिणं पूर्वमनुबन्धविशेषतः ।। पु^२राणं प्रपुराणं वा कौम्भं वा पाययेद् घृतम् ।
वातविसर्प में पहले अनुबन्ध की विशेषता के कारण पुराण, प्रपुराण अथवा कुम्भसर्पि का प्रयोग करना चाहिये ।
वक्तव्य—पुराण घृत के विषय में प्राचीन आचार्यों में कुछ मतभेद दिखाई देता है । कुछ लोग पुराण घृत का काल एक वर्ष का, कुछ १० वर्ष का तथा कुछ १५ वर्ष का मानते हैं । कुम्भसर्पि—चक्रपाणि इसका काल १० वर्ष मानते हैं । योगरत्नाकर में १०० वर्ष का कहा गया है तथा सुश्रुत सू. अ. ४५ में ११ से लेकर १०० वर्ष तक का पुराना घृत कुम्भसर्पि और उससे अधिक पुराने घृत को महाघृत कहा गया है ॥
तैलं सलवणं चास्य क्षिप्रमभ्यञ्जने हितम् ।। आरनालेन सुरया बलया वा विपाचितम् ।
कांजी, सुरा (मद्य) अथवा बला के द्वारा पकाये हुए तैल में लवण डालकर उससे शीघ्र ही रोगी का अभ्यङ्ग (मालिश) करना चाहिये ॥
मधुकस्य च कल्केन गुडूच्या स्वरसेन च ।। तुल्यक्षीरं पचेत्तैलं तदस्याभ्यञ्जने हितम् ।
अथवा मुलहठी के कल्क तथा गिलोय के स्वरस में समान मात्रा में दूध डालकर तैल सिद्ध करना चाहिये । इस तैल का अभ्यङ्ग करना हितकारी होता है ॥
१. अस्याग्रे एकं पत्रं खण्डितं ताडपत्रपुस्तके । २. उग्रगन्धं पुराणं स्याद्दशवर्षस्थितं घृतम् । लाक्षारसनिभं गीतं प्रपुराणमतः परम् ।। स्थितं वर्षशतं श्रेष्ठ कौम्भं सर्पिस्तदुच्यते ।