भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 860

५०० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विसर्पचिकित्सिताध्यायः १४]


तथाऽपि न तेषामिच्छा भवति न च प्राणाद् विमुच्यते ॥ २५ ॥

बलां रास्त्रां बृहत्यौ द्वे वर्चीवं सपुनर्नवम् ।।
पाटलां सुषवीं चैव मधुकं देवदारुकम् । पिष्ट्वा विपक्वं दध्ना च तैलमभ्यञ्जने हितम् ।।

बला, रास्ना, दोनों बृहती, वर्चीव, पुनर्नवा, पाटला, सुषवी (काला जीरा), मुलहठी, देवदारु—इन सबको पीसकर तथा दही के साथ पकाकर तैल सिद्ध करे। यह तैल अभ्यङ्ग में हितकर होता है॥

बिल्वाग्निमन्थकाश्मर्यश्योनाकैरण्डपाटलैः । पयसा चाम्बुना वाऽपि शृतेन परिषेचयेत् ।।
बिल्व, अग्निमन्थ (अरणी), काश्मर्य (गम्भारी), श्योनाक (अरलु–पाढल), एरण्ड तथा पाटला—इन्हें दूध तथा जल में सिद्ध करके क्वाथ बनाये। इससे परिषेचन करें॥

**भृष्टैः पयसि निर्वातैरतसीतिलसर्षपैः । क्षीरपिष्टैः प्रलिम्पेद्वा वातवैसर्पपीडित