काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविसर्पचिकित्सिताध्यायः १४] खिलस्थानम् ५०१
उक्ताभिराभिः स्निग्धाभिः पायसैः कृसरेण वा ।।
शुष्कमूलककल्कैर्वा कल्कैः शोभाञ्जनस्य वा ।
सुखोष्णैः प्रदिहेदेनं नात्युष्णं वाऽऽचरेद्विधिम् ।
स्वेदैः प्रशान्ते त्वनिले प्रकुप्येत् पित्तमग्निवत् ।
यथा न च प्रकुप्येत् पित्तं वायुश्च शाम्यति ।।
तथा भिषक् प्रयुञ्जीत वातपित्तहरीं क्रियाम् ।।
उपर्युक्त स्निग्ध द्रव्यों अथवा सुखोष्ण (ईषदूष्ण) पायस¹ (दूध चावलों की बनी हुई खीर), कृशरा² (तिल, चावल तथा उड़द कीक खिचड़ी), सूखी हुई मूली का कल्क अथवा सहिजने की कल्क की कल्क का लेप लगाना चाहिये। परन्तु ये लेप अत्यन्त उष्ण नहीं लगाने चाहिये। उपर्युक्त स्वेदों के द्वारा वायु के शान्त हो जाने पर अग्नि के समान पित्त प्रकुपित हो जाता है। चिकित्सक को इस प्रकार की वात एवं पित्तनाशक चिकित्सा करनी चाहिये कि जिससे पित्त का प्रकोप न हो तथा वायु की शान्ति हो जाये ॥
पैत्तिके तिक्तकं सर्पिरुक्तं ज्वरचिकित्सिते । निरामं पाययेद्वैद्यः स्निग्धं ज्ञात्वा विरेचयेत् ।।
पैत्तिक विसर्प की चिकित्सा—रोगी को निराम (आम रहित-आम का पाचन हो जाने पर) हो जाने पर वैद्य ज्वरचिकित्सा में कहा हुआ तिक्तक घृत पिलाये। तथा इस घृत के द्वारा स्नेहन हो जाने पर उसे विरेचन देवे। चरक चि. अ. २१ में भी ऐसा कहा है ॥
चन्दनं पद्मकोशीरं तथा चन्दनसारिवाम् । मृद्वीकां च विदारीं च काश्मर्याणि परूषकम् ।।
वासाश्रुतं पिबेदेतद्वैसपर्ज्वरनाशनम् ।
चन्दन, पद्माख, खस, रक्तचन्दन, सारिवा, मुनक्का, विदारीगन्धा, काश्मर्य (गंभारी), फालसा—इन्हें बांसे के साथ पकाकर काढ़ा बनाकर पिलाये। यह विसर्प ज्वर को नष्ट करता है ॥
उशीरं मधुकं द्राक्षां काश्मर्याण्युत्पलानि च । कशेरुकामिक्षुगण्डं परूषकफलानि च ।।
पूर्वकल्पेन पेयानि ज्वरवैसर्पशान्तये ।
खस, मुलहठी, मुनक्का, गंभारी, कमल, कसेरु, इक्षुगण्ड (काशतृण) तथा फालसा-इन्हें भी उपर्युक्त विधि से ही पकाकर विसर्पज्वर को शान्त करने के लिये पिलाना चाहिये ॥
कैरातं मधुकं लोध्रं चन्दनं सबिभीतकम् ।।
पद्मोत्पलं नागपुष्पं नागरं सदुरालभम् । निष्क्वाथ्य शीतं मधुना पेयं वैसर्पशान्तये ।। १६ ।।
चिरायता, मुलहठी, लोध्र, रक्तचन्दन, बहेड़ा, श्वेतकमल, नील कमल, नागकेसर, सोंठ, दुरालभा (जवासा)-इन सब का क्वाथ बनाकर ठण्डा करके उसमें मधु मिलाकर विसर्प की शान्ति के लिये पीना चाहिये ॥
पटोलं चन्दनं मूर्वा गुडूचीं कटुरोहिणीम् । मुस्तां पाठां सयष्टीकां पूर्वकल्पेन पाचयेत् ।।
१. अतप्ततण्डुली धौतः परिभृष्टो घृतेन च। खण्डयुक्तेन दुग्धेन पाचितः पायसो भवेत् ।।
२. तण्डुला दालिसंमिश्रा लवणाईकहिङ्गुभिः। संयुक्ताः सलिलैः सिद्धाः कृशरा कथिता बुधैः ।।