भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 862

५०२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विसर्पचिकित्सिताध्यायः १४]

पटोल (परवल), चन्दन, मूर्वा (मोरबेल), गिलोय, कुटकी, मोथा, पाठा, मधुयष्टि—इन सबको उपर्युक्त विधि से पकाकर पिलाना चाहिये ॥

व्याघातकं हरिद्रे द्वे कुटजं कटुरोहिणीम् । गुडूचीं मधुकं चैव चन्दनं चेति तत् पिबेत् ।।

व्याघातक (अमलतास), हरिद्रा, दारुहरिद्रा, कुटज, कुटकी, गिलोय, मुलहठी तथा रक्तचन्दन—इन सबका क्वाथ बनाकर पीना चाहिये ॥

वक्तव्य—यहां 'व्याघातक' के स्थान पर 'व्याधिघातक' पाठ हो तो संगत प्रतीत होता है । इसी के अनुसार उपर्युक्त अर्थ किया गया है ॥

पिचुमन्दं पटोलं च दार्वीं कटुकरोहिणीम् । गुडूचीं मधुकं चैव चन्दनं चेति तत् पिबेत् ।।

नीम, पटोल, दारुहल्दी, कुटकी, गिलोय, मुलहठी तथा रक्तचन्दन—इनका क्वाथ बनाकर पीना चाहिये ॥

पिचुमन्दं पटोलं च दार्वीं कटुकरोहिणीम् । त्रायमाणां सयष्टीकां पिबेद्वैसर्पशान्तये ।

नीम, पटोल, दारुहल्दी, कुटकी, त्रायमाणा, मुलहठी—इनका क्वाथ बनाकर विसर्प ज्वर की शान्ति के लिये पीना चाहिये ॥

पटोलनिम्बमुस्तानां चन्दनोशीरयोरपि । मुस्तकामलकोशीरसारिवाणामथापि वा ।। दद्यात् कषायं पानेन पित्तवैसर्पशान्तये । पटोलमुस्तामलकश्रुतं वा सघृतं पिबेत् ।।

१. पटोल, नीम तथा मोथा २. चन्दन और खस अथवा ३. नागरमोथा, आंवला, खस और सारिवा का कषाय पिलाना चाहिये । ये पित्त विसर्प को शान्त करते हैं । अथवा पटोल, नागरमोथा और आंवले के क्वाथ में घृत डालकर पिलाना चाहिये ॥

उदुम्बरत्वङ्मधुकं प्रियङ्ग्वो नागकेशरम् । पद्मोत्पलानां किञ्जल्कं प्रदेहः सघृतो हितः ।।

गूलर की छाल (अथवा उदुम्बर और त्वक्–दालचीनी), मुलहठी, फूल प्रियङ्गु, नागकेसर, कमल तथा नीलकमल के किञ्जल्क (केसर–पराग–Stamins)–इनके चूर्ण में घृत मिलाकर प्रदेह (प्रलेप) करना चाहिये ॥

अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षवटवेतसजाम्बवैः । त्वग्भिः सुपिष्टैरालेपः शतधौतघृताप्लुतः ।।

पीपल, गूलर, प्लक्ष (पिलखन), बड़, वेतस् (बेंत) और जामुन के वृक्ष की छाल को अच्छी प्रकार पीसकर शतधौतघृत में मिलाकर लेप करना चाहिये ।

वक्तव्य—१०० बार ठण्डे पानी में धोये हुए घृत को शतधौतघृत कहते हैं ॥

श(क)कुभोदुम्बराश्वत्थवटलोध्रत्वचः समाः ।
वेतसत्वक् सशालूका नऽ......पेषयेत् ।।
सहविष्कः प्रलेपोऽयं दाहरागनिवारणः ।

अर्जुन, गूलर, पीपल, बड़, लोध्र, वेतस् (बेंत) तथा शालूक (पद्मकन्द–कसेरु) इन सबको पीसकर घृत के साथ प्रलेप बनाये यह दाह एवं राग (लालिमा–Redness) को दूर करता है ॥

उशीरं चन्दनं चैव शाद्वलं शङ्खमुत्पलम् ।।
वेतसस्य च मूलानि प्रदेहः स्यात् सतण्डुलः ।