काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविसर्पचिकित्सिताध्यायः १४] खिलस्थानम् ५०३
खस, रक्तचन्दन, दूर्वा, शङ्खपुष्पी, कमल तथा वेतस् की जड़ों को चावलों के साथ पीस कर लेप करना चाहिये ॥
ह्रीबेरं चन्दनोशीरं मञ्जिष्ठां कुमुदोत्पलम् ।।
शारिवां पद्माकिञ्जल्कं प्रलेपनमनुत्तमम् ।
ह्रीबेर (नेत्रबाला), रक्तचन्दन, खस, मंजीठ, कमल, नीलकमल, सारिवा तथा पद्मकेसर—इनको पीसकर उत्तम प्रलेप बनाया जाता है ॥
विदारीं चन्दनोशीरं तथा चन्दनसारिवाम् ।।
मधुकं क्षीरशुक्लां च दद्या(दालेप)नं भिषक् ।
विदारीगन्धा, रक्तचन्दन, खस, चन्दन, सारिवा (कृष्ण सारिवा), मुलहठी तथा क्षीरशुक्ला (खिरनी अथवा भूमिकूष्माण्ड)—इनको पीसकर लेप करें ॥
तालीशं पद्मकोशीरं मञ्जिष्ठां चन्दनद्वयम् ।।
प्रपौण्डरीकं मधुकं प्रलेपो दाहनाशनः ।
तालीश, पद्माख, खस, मंजीठ, श्वेत चन्दन, रक्तचन्दन, पुण्डरीक, मुलहठी—इनका लेप दाह को शान्त करता है ॥
मुक्ताशङ्खप्रलेपैश्च शुक्तिस्फाटिकगैरिकैः ।। सुघृतैः प्रदिहेदेनं समस्तैर्लाभतोऽपि वा ।
मुक्ता (मोती) और शङ्ख अथवा मुक्ताशुक्ति, स्फटिक और गेरु इन्हें पृथक् २ मिलाकर अथवा इनमें से जो द्रव्य मिल सके उन्हें परस्पर लेकर घी के साथ मिलाकर लेप करना चाहिये ॥
कदलीकुशकाशानां तथैव नड(ल)वेत्रयोः ।।
मूलानि चन्दनोशीरं पद्मकर्षभजीवकम् ।
कुमुदोत्पलप (त्राणि मू) र्वासौगन्धिकानि च ।
मृणालविशशालूकतृणशोले(शाली) क्षुवालिकाः ।
प्रपौण्डरीकं मधुकं तालीशं सकशेरुकम् ।।
इक्षुवेतसमूलानि सानन्ताः क्षीरिणां त्वचः । शतावरीं समञ्जिष्ठां कुम्भीकामिति संहरेत् ।।
संक्षोद्यैतानि मतिमान् वासयेत् सलिले निशि । रसं तमथ निस्त्राव्य परिषेकं तु दापयेत् ।।
कदली (केला), कुश, काश, नल (नडा) तथा वेतस् (बेंत) की जड़ और रक्तचन्दन, खस, पद्माख, ऋषभक, जीवक, कुमुद और नीलकमल के पत्ते, मूर्वा (मोर बेल), सौगन्धिक (लाल कमल), मृणाल, विश, शालूक (कमलकन्द), तृण (गन्धतृण), शालि, इक्षुबालिका (कोकिलाक्षतालमखाना), पुण्डरीक, मुलहठी, तालीश, कसेरु, इक्षु एवं बेंत की जड़, अनन्ता, क्षीरीवृक्षों¹ की छाल, शतावरी, मंजीठ, कुम्भीका (रक्तपाटला)—इन सबों को लाये। और इनका यवकूट चूर्ण करके बुद्धिमान् व्यक्ति रात्रि में शीतल जल में डाल दे। प्रातः काल उन सबको निचोड़ कर उनका रस निकाल ले। उसके द्वारा परिषेक करना चाहिये।
घृतं वा विपचेदेभिर्म्रक्षणं पयसा सह । एतेनैव कषायेण पयस्तुल्यं पचेद्भिषक् ।।
१. न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थपारीषप्लक्षपादपाः । पञ्चैते क्षीरिणो वृक्षाः, ........ ।।