भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 864, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 864
५०४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्विसर्पचिकित्सिताध्यायः १४]

चतुर्भागावशिष्टं च खजेनाभिप्रमन्थयेत्। तत्रोत्थितं घृतं भूयः पयसाऽष्टगुणेन तु।।
कल्कैः पयस्यामधुकचन्दनानां विपाचितम्। अभ्यङ्गे भोजने पाने दद्याद्वैसर्पनाशनम्।।
घृतेन परिषिक्त ........... न्तर।

अथवा उपर्युक्त ओषधियों के साथ ही घृत सिद्ध करे। इसमें इस कषाय के बराबर ही दूध डाल दे। चतुर्थांश शेष रहने पर उसे उतार कर खोंचे से खूब मथ दे। इस प्रकार तैयार हुए घृत को पुनः आठ गुने दूध तथा पयस्या (जीवन्ती या क्षीरकाकोली), मुलहठी और रक्तचन्दन के कल्क से पकाये। घृत सिद्ध होने पर अभ्यङ्ग (मालिश), भोजन तथा पान में प्रयोग करे। यह घृत विसर्प को नष्ट करता है। इस घृत के द्वारा परिषेक भी करना चाहिये॥

यष्टीमधुकतोयेन क्षीरेणेक्षुरसेन वा। वटादिवल्कतोयेन शीतेन परिषेचयेत्।

मुलहठी के क्वाथ, इक्षुरस अथवा बड़ आदि की छाल के क्वाथ को ठंडा करके उससे परिषेक करना चाहिये।

प्रदिहेद्वा वटादीनां कल्केन सघृतेन तु।।
तथा सहस्रधौतेन (शतधौतेन) वा पुनः।
सर्पिषा प्रदिहेदेनं दाहे क्षीरोत्थितेन वा।

बड़ आदि के कल्क में घृत मिलाकर अथवा सहस्रधौत या शतधौत घृत का लेप करना चाहिये। अथवा यदि विसर्प में दाह हो तो क्षीरोत्थ सर्पि (दूध से निकाले हुए घृत) का लेप करना चाहिये॥

सदाहराम(ग)पाके तु श्वयथौ विप्रसर्पति। अन्तर्विशुद्धदेहानां जलौकाभिहरेदसृक।
(इति ताडपत्रपुस्तके २३६ तमं पत्रम्)

निःस्राव्य दुष्टं रुधिरं कुर्याद्रक्तप्रसादनम्।।
सवृतैः क्षीरिणां कल्कैरथोक्तैः शीतलैरपि।

यदि विसर्प रोग में दाह (जलन), राग (लालिमा–Redness) तथा पाक (पकना–Suppuration) हो तो रोगी के शरीर का वमन, विरेचन आदि के द्वारा अन्तःशोधन करके जलौका (जोंक–थाम्पे) के द्वारा रक्तमोक्षण करना चाहिये। तथा दूषित रक्त के निकल जाने के बाद उपर्युक्त शीतल क्षीरीवृक्षों की छाल के कल्क में घी मिलाकर रक्तप्रसादन करना चाहिये। अर्थात् दूषित रक्त के निकल जाने के बाद शेष रक्त का प्रसादन करना चाहिये॥

आदितः श्लेष्मवैसर्पे वमनं संप्रकल्पयेत्।।
लङ्घनं वाऽल्पदोषाणां ततः कुर्यादिमां क्रियाम्।

**श्लैष्मिक विसर्प की चिकित्सा—**श्लैष्मिक विसर्प में प्रारंभ में रोगी को वमन कराना चाहिये अथवा यदि शरीर में दोष कम हों तो लङ्घन कराकर निम्न चिकित्सा करनी चाहिये। अर्थात् यदि दोष अधिक हों तो पहले वमन करा लेना चाहिये। परन्तु यदि दोष अधिक न हों तो वमन कराने की आवश्यकता नहीं होती है अपितु लङ्घन कराकर प्रारंभ से ही उसमें निम्न चिकित्सा की जा सकती है॥

मुस्तां पाठां हरिद्रे द्वे कुष्ठं तेजोवतीं वचाम्।।
शाङ्गिष्ठां त्रिफलां मूर्वामग्निं हैमवतीमपि। वत्सकातिविषे चैव तथा कटुकरोहिणीम्।।
निष्क्वाथ्य पाययेदेनं पिष्टैस्तैश्च प्रलेपयेत्।