भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 865

विसर्पचिकित्सिताध्यायः १४] खिलस्थानम् ५०५

मोथा, पाठा, हल्दी, दारुहल्दी, कुष्ठ तेजोवती (ज्योतिष्मती-मालकंगनी), वच, शार्ङ्गिष्ठा (काकजङ्घा या काकमाची), त्रिफला, मूर्वा (मोरबेल), अग्नि (चित्रक), हैमवती (स्वर्णक्षीरी या श्वेत बच), इन्द्र जौ, अतीस, कुटकी— इन सबका क्वाथ करके रोगी को पिलाये तथा इन्हीं को पीसकर शरीर पर लेप करे ॥

आरग्वधं सोमवल्कं कुटजातिविषे घनम् ।।
पाठां मूर्वां सशार्ङ्गिष्ठां कुष्ठं च विपचेद्भिषक् ।
तत्कषायं पिबेत् काले सुपिष्टैस्तैश्च लेपयेत् ।।
तेनास्य कण्डूः कोठानि शोफश्चाशु प्रशाम्यति ।

अमलतास, सोमवल्क (श्वेत खदिर अथवा कई कायफल या करञ्ज का भी ग्रहण करते हैं), कुटज, अतीस, नागरमोथा, पाठा, मूर्वा, शार्ङ्गिष्ठा तथा कुष्ठ इन सबको पकाकर कषाय बनाये । उचित काल में इस कषाय को पीना चाहिये तथा इन्हीं ओषधियों को अच्छी तरह पीसकर लेप करना चाहिये । इस प्रयोग से विसर्प में कण्डु (खाज), कोठ (मण्डलचर्मरोग विशेष) तथा शोथ शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं ।

**वक्तव्य—**कोठ यह एक क्षुद्ररोगान्तर्गत चर्मरोग है । इसका लक्षण निम्न है—असम्यग्वमनोदीर्ण-पित्तश्लेष्मान्ननिग्रहैः । मण्डलानि सकण्डूनि रागवन्ति बहूनि च ॥ उत्कोठः सानुबन्धस्तु कोठ इत्यभिधीयते ॥ इसे 'ह्वैदेस' कहा जा सकता है ॥

श्रुतं वाऽप्यमृताशुण्ठीपर्पटैः सदुरालभैः ।।
पिबेत् कषायं मधुना वैसर्पज्वरपीडितः ।

विसर्प ज्वर से पीडित रोगी को गिलोय, सोंठ, पित्तपापड़ा तथा दुरालभा (जवासा) के कषाय में मधु मिलाकर पिलाना चाहिये ॥

त्रिफलोशीरमुस्तानि एरण्डं देवदारु च ।।
निष्क्वाथ्य परिषेक्तव्यो निम्बपत्रोदकेन वा ।

त्रिफला, खस, नागरमोथा, एरण्ड तथा देवदारु के क्वाथ अथवा नीम के पत्तों के क्वाथ से परिषेक करना चाहिये ॥

शिग्रुत्वक्सुरसास्फोटकालमालफणिज्झकैः ।।
साटरूषैः श्रुतं तोयं प्रदद्यात् परिषेचनम् । खदिरोदकसेको वा गोमूत्रेणाथवा हितः ।।

सहिजने की छाल, तुलसी, आस्फोट (आक), कालमाल (काली तुलसी), फणिज्झक (तुलसी भेद) तथा बांसे का क्वाथ बनाकर उसका अथवा खदिर के क्वाथ या गोमूत्र का परिषेचन करना चाहिये ॥

गृहधूमं हरिद्रे द्वे मालतीपल्लवानि च ! विडङ्गं द्वे हरिद्रे च पिप्पल्यस्तललण्डिका(?) ।।
मुस्ताऽमृता हरिद्रे द्वे पटोलारिष्टपल्लवाः । कुटजातिविषे मुस्तं कुष्ठं चेति प्रपेषयेत् ।।
आगारधूमं रजनीं सैन्धवं च प्रलेपनम् ।
श्लोकार्धविहिता होते योगाः स्वल्पघृतायु(न्वि)ताः ।।
प्रदेहार्थे प्रयोक्तव्याः शोफकण्डूरुजापहाः ।

१. गृहधूम, हल्दी, दारुहल्दी तथा चमेली के पत्ते । २. वायविडङ्ग, हल्दी, दारुहल्दी, पिप्पली, तललण्डिका(?) ३. नागरमोथा, गिलोय, हल्दी, दारुहल्दी, पटोल (परवल) तथा नीम के पत्ते । ४. कुटज, अतीस, नागरमोथा और कुष्ठ ।