काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५०६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विसर्पचिकित्सिताध्यायः १४]
५. आगारधूम (गृहधूम), हल्दी तथा सैन्धव । आधे श्लोकों के द्वारा कहे हुए उपर्युक्त योगों में थोड़ा घी मिलाकर प्रदेह (लेप) के रूप में प्रयोग करने चाहिये । ये विसर्प की शोफ (ऐल्तण्डु), कण्डू तथा वेदना को नष्ट कर देते हैं ।।
सप्तपर्णं सखदिरं मुक्त्मारगवधत्वचम् ।।
कुरण्टकं देवदारु प्रलेपनमनुत्तमम् । पलाशभस्म चैकाङ्गं लेपो गोमूत्रसंयुतः ।।
सप्तपर्ण, खदिर, नागरमोथा, अमलतास की छाल, कुरण्टक (पीतझिण्टी) तथा देवदारु का लेप उत्तम होता है । अथवा पलाश (ढाक) की भस्म (राख) तथा चन्दन को गोमूत्र में मिलाकर लेप करना चाहिये ।।
सक्षारं सार्षपं तैलमथवाऽपि ससैन्धवम् ।
अभ्यङ्गार्थे प्रयोक्तव्यं तैलं कारञ्जमेव वा । कुष्ठसैन्धवचूर्णं वा तैलाक्तस्यावघर्षणम् ।।
सरसों के तेल में क्षार अथवा सैन्धव मिलाकर या करञ्ज तैल का अभ्यङ्ग (मालिश) करना चाहिये । अथवा रोगी को तैल की मालिश करने के बाद कुष्ठ और सैन्धव के चूर्ण के द्वारा शरीर का घर्षण (रगड़ना) करना चाहिये ।।
स्वर्जिकातिविषे मुस्तं त्वगेलेल्वार्थ(लैल्वालु)वत्सकैः । शताह्वागरुकुष्ठैश्च पिष्टैस्तैलं विपाचयेत् ।।
तदस्याभ्यञ्जने योज्यं कण्डूकोठारुनाशनम् ।
स्वर्जिका (सज्जी क्षार), अतीस, नागरमोथा, दालचीनी, एलवालुक (गन्धद्रव्य अथवा लोध्र), इन्द्रजौ, सोया, अगरु तथा कुष्ठ के कल्क से तैल सिद्ध करे । इस तैल के अभ्यङ्ग (मालिश) से कण्डू, कोठ तथा क्षतव्रण आदि नष्ट होते हैं ।।
शिग्रुमूलमहिंस्त्रां च पिष्ट्वा सर्पिर्विपाचयेत् । तेनास्याभ्यञ्जयेद्गात्रं कुष्ठतैलेन वा पुनः ।।
सहिजने की जड़ तथा अहिंसा (कण्टकपाली-Capparis sepiaria) के पिसे हुए कल्क से घृत पाक करें । इस घृत या कुष्ठ तैल के द्वारा रोगी के शरीर का अभ्यङ्ग करे ।।
एतेन विधिना व्याधिर्यदि नैवोपशाम्यति । कण्डूमद्भिः सदाहैश्च मण्डलैर्विदहेदपि ।।
ततो विरेचनं दद्याद्रक्तं चास्यावसेचयेत् । विनिहृते दुष्टके कुर्याद्रक्तप्रसादनम् ।।
सघृतैस्त्रिफलाकल्केर्मधुकोदुम्बरान्वितैः ।
उपर्युक्त विधि के द्वारा यदि रोग शान्त न हो तथा कण्डू एवं दाहयुक्त मण्डलों (चकत्तों) के द्वारा शरीर में दाह होती हो तो रोगी को विरेचन देना चाहिये तथा रक्तमोक्षण करना चाहिये । तथा दूषित रक्त का निर्हरण हो जाने पर मुलहठी, गूलर और घृतयुक्त त्रिफला के कल्क से रक्त-प्रसादन करना चाहिये ।।
इति वातादिजानां ते वैसर्पाणां चिकित्सितम् ।।
समासव्यासयोगैश्च पृथक्त्वेन च कीर्तितम् ।
एतदेव च संसृष्टं संसृष्टेषु प्रयोजयेत् ।
इस प्रकार मैंने संक्षेप तथा विस्तार से पृथक् २ वातज आदि विसर्पों की चिकित्सा का वर्णन कर दिया है । संसृष्ट दोषो वाले विसर्पों में यही चिकित्सा ही ससृष्ट (मिलाकर) करनी चाहिये । अर्थात् यदि विसर्प वातिक एवं पैत्तिक हो तो उसमें वातिक एवं पैत्तिक विसर्प की सम्मिलित चिकित्सा करनी चाहिये ।।