काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविसर्पचिकित्सिताध्यायः १४] खिलस्थानम् ५०७
यवान्नं शालयो मुङ्गा मसूराः सहरेणवः । भोजनार्थे पुराणाः स्युर्जाङ्गलाश्च मृगद्विजाः ॥
विसर्प में पथ्य—भोजन में पुराने यवान्न (यवकृत-भक्त), शालिचावल, मूंग, मसूर, हरेण तथा जांगल पशु-पक्षियों के मांस देने चाहिये । चरक चि. अ. २१ में विसर्परोग में विदाहि अन्नपान, विरुद्ध भोजन, दिवास्वप्न, क्रोध, व्यायाम, धूप, अग्नि तथा प्रवात आदि का त्याग कर देने को कहा है ॥
मसूरिकाः सविस्फोटाः कक्ष्यां पामां तथैव च । संसृष्टपित्तरक्तोत्था वैसर्पवदुपक्रमेत् ॥
मसूरिका, विस्फोट, कक्षा तथा पामा आदि पित्त तथा रक्त के संसर्ग से उत्पन्न होते हैं। इनकी भी विसर्प के समान चिकित्सा करनी चाहिये ।
वक्तव्य—मसूरिका रक्त से मिला हुआ पित्त जब त्वचा को दूषित करता है तब मनुष्य के सारे शरीर में पिडकायें उत्पन्न हो जाती हैं । ये पिडकायें मसूर की आकृति की होती हैं अतः इस रोग को मसूरिका कहते हैं । आजकल की परिभाषा में यह Small pox कहा जा सकता है । विस्फोट—शरीर में बड़े २ फोड़े निकल आते हैं इन्हें आजकल Exanthemata कहते हैं । कक्षा—पित्त के प्रकोप से बाहु, पार्श्व, अंश और कक्षा में पिडकायें उत्पन्न हो जाती हैं । ये पिडकाएं काले वर्ण की होती हैं । तथा इनमें वेदना होती है । इन्हें कछरैली या Herpes zoster कहते हैं । पामा—इसे Eczema कह सकते हैं ॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः । (इति) उत्तरेषु खिलस्थाने भार्गवीयायां संहितायां वैसर्पचिकित्साध्यायश्चतुर्दशः ॥१४॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था । इति वसर्पचिकित्साध्यायश्चतुर्दशः ॥१४॥
अथ चर्मदलचिकित्सिताध्यायः पञ्चदशः ।
अथातश्चर्मदलचिकित्सितं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम चर्मदल चिकित्सित नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था । चर्मदल एक त्वग्रोग (Skin disease) है । इसकी आयुर्वेद में क्षुद्रकुष्ठों में गिनती की है । माधव निदान में कहा गया है कि इस रोग में लालरंग के, शूल एवं कण्डु युक्त स्फोट बन जाते हैं तथा वे अधिक स्पर्श को नहीं सह सकते हैं । इसके अतिरिक्त सुश्रुत नि. अ. ५ में इसका निम्न लक्षण दिया है—स्युर्यैन कण्डूव्यथनौषचोषास्तलेषु तच्चर्मदलं वदन्ति ॥१-२॥
अथ खलु भगवन्तमृषिगणपरिवृतं ब्राह्मा श्रिया देदीप्यमानमृषिश्रेष्ठं कश्यपमभिषांद्य पप्रच्छ भार्गवः— भगवन् ! क एष चर्मदलो नाम व्याधिर्विसर्पमाणोऽग्निदग्धोपरमरूपोऽत्याबाधकरो बालानामङ्गेषूपपद्यते, कथं चोत्पद्यते क्षीरपाणां कुमाराणां ? क्षीरान्नादानां तु(च), नवाऽन्नादवयः स्थानाम् ? अत्र