काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५०८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् चर्मदलचिकित्सिताध्यायः १५]
को हेतुः ? किमात्मकः ? कतिविधः ? कानि चास्य लक्षणानि ? उपद्रवाश्च के ? इत्येवं व्याख्यातुमर्हसीति ।।३।।
ऐश्वर्यशाली, ऋषिगणों से घिरे हुए, ब्राह्मतेज से देदीप्यमान तथा ऋषियों में श्रेष्ठ कश्यप का अभिवादन करके भार्गव (भृगुकुलोत्पन्न वृद्ध जीवक) ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! यह बालकों के शरीर में उत्पन्न होने वाला चर्मदल नाम का कौन सा रोग है जो विसर्पण करने (फैलने) वाला है ? जिसके लक्षण अग्निदग्ध के समान होते हैं तथा जो अत्यन्त कष्ट देने वाला है ? यह क्षीरपायी (दूध पीने वाले) तथा दूध एवं अन्न दोनों का सेवन करने वाले बालकों को क्यों होता है ? तथा अन्नाद (अन्न का सेवन करने वाले) और बड़ी अवस्था वाले बालकों को यह क्यों नहीं होता है ? इसके उत्पन्न होने का कारण क्या है ? इसका क्या स्वरूप होता है ? इसके कितने भेद हैं ? इसके लक्षण क्या हैं ? तथा इसके उपद्रव कौन २ से हैं ? इत्यादि सब बातों का आप उपदेश कीजिये ।।
अथ भगवानब्रवीद्वत्स ! श्रूयतामिह खलु क्षीरपाणां कुमाराणां स्तन्यदोषेण, क्षीरान्नादानां स्तन्यदोषेणाहारदोषेण च, सुकुमाराणामस्थिरधातूनां बालानां गर्भशय्योचितमृदुशरीराणां वस्त्राङ्गा¹धारणोष्णा-निलातपस्वेदोपनाहस्वमलमूत्रपुरीषसंस्पर्शशौचपाणिपीडनाऽतीवोद्वर्त्तनकुलप्रकृत्यादिभिरुपायैर्मुखगलहस्तपादवृषणान्तर-कट्यङ्गसन्धिषु चोत्पद्यते ।।४।।
भगवान् कश्यप ने उत्तर दिया—वत्स ! सुनो, यह रोग क्षीरप बालकों को स्तन्य (दूध) के दोष से और क्षीरान्नाद (दूध तथा अन्न दोनों का सेवन करनेवाले) बालकों को दूध तथा आहार के दोष से होता है तथा जिनकी शारीरिक धातुएं स्थिर न हों, जिनका शरीर गर्भशय्या के योग्य मृदु हो तथा जो सुकुमार हैं ऐसे बालकों को वस्त्र के अत्यन्त धारण करने, निरन्तर उसे गोद में लेने तथा उष्ण वायु, धूप, पसीना, उपनाह (पुलटिस) एवं बालकों के स्वयं अपने शरीर के मलमूत्र पुरीष आदि के लगने, गन्दगी, हाथ के द्वारा पीडन, अत्यन्त उद्वर्त्तन (उबटन) आदि कारणों से अथवा कुलप्रवृत्ति (Heriditary) के कारण बालक के मुख, गले, हाथ, पैर, वृषण (अण्डकोश) के नीचे तथा कटि एवं अङ्गों की सन्धियों में उत्पन्न हो जाता है ।।४।।
नचान्नाद्वयःस्थानामिति कि कारणं ? स्थिरकठिनसंहतत्वगस्थिधातूनां तथा नित्यव्यायामोपचितगात्राणां क्लेशं सहतां न भवत्येष व्याधिरिति ।।५।। (इति ताडपत्रपुस्तके २३७ तमं पत्रम् ।)
अन्नाद तथा बड़ी अवस्था वाले बालकों को यह रोग न होने के कारण यह है कि इनकी त्वचा, अस्थियां तथा शारीरिक धातुएं स्थिर, कठोर तथा संहत (दृढ़) होती हैं तथा नित्य व्यायाम आदि करने से उनके शरीर पुष्ट हो जाते हैं तथा वे क्लेश को सहन कर सकते हैं इसीलिये उन्हें यह रोग नहीं होता है ।।५।।
वायुभूयिष्ठत्वाद्वातात्मकमेवोदाहरन्ति । चर्मदलमिति चर्मविदारणात् । स चतुर्विधो—वातिकः, श्लैष्मिकः सान्निपातिक इति ।।६।।
इस रोग में वायु की प्रधानता होने से इसे वातात्मक (वातिक) कहते हैं । चर्म का अवदारण कर देने से (चर्मत्वचा को काट देने के कारण) इसे चर्मदल कहते हैं । अर्थात् इस रोग में शरीर का चर्म फट जाता है । यह रोग चार प्रकार का होता है—१. वातिक, २. पैत्तिक, ३. श्लैष्मिक, ४. सान्निपातिक ।।
१. आधारणमतिशयेन धारणमिति यावत् ।