भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 869, कुल 942 में से

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पृष्ठ 869

चर्मदलचिकित्सिताध्यायः १५] खिलस्थानम् ५०९

तत्र या बालस्य माता वा धात्री वा रूक्षसमुदाचाराहारोदावर्त्तनोपवसनशीला तथाऽति- चङ्क्रमणव्यायामकलेशानत्यर्थमुपसेवते तस्या वायुः प्रकुपितः स्तन्यं दूषयति । तस्य लक्षणम्-उदके प्रक्षिप्तं प्लवते विच्छिद्यते छत्रायते श्यावावभासं, रसेन तिक्तकषायं विरसं चेति । तत् पिबतो जन्तोरिमानि रूपाणि भवन्ति-सकण्डूस्फुटितपरुषश्यावावभासान्यङ्गे मण्डलानि; पिप्लुतं तनु विवर्णमतिसार्यते; प्रवेपकमुखशोषरोमहर्षान्वितश्च वातचर्मदलः ॥७॥

निदान तथा सम्प्राप्ति—जब बालक की माता या धात्री रूक्ष आचार एवं आहार, उदावर्त्तन तथा उपवास करती है तथा अत्यधिक चङ्क्रमण (चलना-सैर आदि करना), व्यायाम तथा क्लेश आदि का सेवन करती है तब उसके शरीर में वायु प्रकुपित होकर दूध को दूषित कर देता है। उस वायु से दूषित दूध के निम्न लक्षण होते हैं—यदि उसे पानी में डाला जाय तो वह पानी में ऊपर तैरता रहता है, वह दूध अलग २ हो जाता है (अथवा फट जाता है), वह छत्र के समान दिखाई देता है, उसका रंग श्याव (काला) हो जाता है तथा स्वाद में उसका रस तिक्त तथा कषाय होता है और वह रसरहित प्रतीत होता है। वात दुष्ट स्तन्य के योगरत्नाकर में निम्न लक्षण दिये हैं—कषायं सलिलप्लावि स्तन्यं मारुतदूषितम्। उस दूध का सेवन करनेवाले बालक में निम्न लक्षण हो जाते हैं—उसके शरीर में कण्डू एवं स्फोटयुक्त कठोर तथा काले रंग के मण्डल (चकत्ते-दाग) दिखाई देने लगते हैं। उसके शरीर में चिमचिमाहट एवं फेन (झाग) युक्त विसर्प हो जाता है, उसे विप्लुत (मिले हुए), पतले, रंगबिरंगे दस्त आने लगते हैं तथा इसमें प्रवेपक (शरीर में कम्पन), मुखशोष तथा रोमहर्ष हो जाता है। ये वातिक चर्मदल के लक्षण होते हैं ॥७॥

यदा तु धात्री क्रोधसंतापोष्णाम्ललवणकटुकविदग्धाध्यशनविवशा (ता) नुपसेवते तस्याः पित्तं प्रकुपितं वायुना विक्षिप्यमाणं स्तन्यवहाभिः सिराभिरनुसृत्य स्तन्यं दूषयति । तस्य लक्षणानि-उदके प्रक्षिप्तं हरितरक्तासितावभासं भवत्यथ रसेन कट्वम्ललवणतिक्तं, स्पर्शेनोष्णमिति । तत् पिबतो जन्तोरिमानि रूपाणि भवन्ति-रक्तनीलावभासानि श्यावपीताभानि शुष्कच्छवीन्युष्णानि कु१थितदोषपूर्णानि मण्डलान्युत्पद्यन्तेऽस्य विसर्पीणित्वङ्मांसदारणानि प्रभिन्नानि पद्मपत्रप्रकाशान्यग्निदग्धोपमानि भवन्ति । अतोऽतिसार्यते हरितपीतगुदपाककरमभीक्ष्णं, दाहमुखशोषच्छर्दियच्च (पीत) वदनान्वितश्च पित्तचर्मदलः ॥८॥

जब धात्री क्रोध, सन्ताप तथा उष्ण, अम्ल, लवण, कटु रसयुक्त एवं विदग्ध (Fermanted) आहार-विहार तथा अध्यशन (पूर्व भोजन पर दूसरा भोजन करना) आदि का सेवन करती है तब उसका वायु से विक्षिप्त होकर प्रकुपित हुआ पित्त स्तन्यवहा सिराओं में प्रवेश करके स्तन्य को दूषित कर देता है। उस पित्त से दूषित दूध के निम्न लक्षण होते हैं—यदि उसे जल में डाला जाय तो उसका रंग कुछ हरा, लाल तथा काला सा दिखाई देने लगता है, रस में वह कटु, अम्ल, लवण तथा तिक्त हो जाता है तथा स्पर्श में वह उष्ण होता है। योगरत्नाकर में कहा है—कट्वम्ललवण पीतराजिमत्पित्तसञ्जितम् ।। उस दूध का सेवन करनेवाले बालक में निम्न लक्षण हो जाते हैं—उसके शरीर में लाल, नीले, काले तथा पीले रंगवाले, शुष्क छवियुक्त, उष्ण, दुर्गन्धयुक्त तथा दोषपूर्ण मण्डल (चकत्ते-दाग) हो जाते हैं। त्वचा तथा मांस का दारण (भेदन) करनेवाले, पद्मपत्र के तुल्य तथा अग्निदग्ध के समान विसर्प हो जाते हैं। उसे निरन्तर हरे-पीले तथा गुदा में पाक उत्पन्न कर देनेवाले दस्त आने लगते हैं। उसे दाह, मुखशोष, छर्दि एवं मुख का पीलापन आदि हो जाते हैं। ये पैत्तिक चर्मदल के लक्षण हैं ॥८॥


१. कुथितानि दुर्गन्धयुक्तानीत्यर्थः

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