भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 848, कुल 942 में से

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पृष्ठ 848
४८८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३]

सुरासवं पिष्टमयं तिलपिष्टाम्लकाञ्जिकम् । अभिष्यन्दीनि सर्वाणि काले काले निषेवते ॥४॥
भुक्त्वा भुक्त्वा दिवा शेते विसंज्ञा च विबुध्यते ।
तस्य दोषाः प्रकुपिता दूरं गत्वा च तिष्ठते ॥५॥
दोषेणावृतमार्गायास्ततः स्तन्यं च दुष्यते ।

जब शिशु की माता सदा मधुर द्रव्य, मछली, मांस, दूध, शाक, मक्खन, दधि, सुरा, आसव, उड़द की पिठ्ठी के बने हुए पदार्थ, तिल के बने हुए पदार्थ (तिलकुट आदि), खट्टी कांजी तथा सम्पूर्ण अभिष्यन्दि द्रव्यों का सेवन करती है, दिन में भोजन करते ही सो जाती है तथा संज्ञाशून्य हो जाती है—तब उस स्त्री के दोष प्रकुपित होकर शरीर में दूर जाकर स्थित हो जाते हैं तथा दोषों के द्वारा मार्गों के रुक जाने से उस स्त्री का दूध दूषित हो जाता है ॥३-५॥

प्रदुष्टदोषसंज्ञं तु यदा पिबति दारकः ॥६॥
लवणाम्लनिषेवित्वान्मातापुत्रौ रसादिह । आहारदोषात्तस्यास्तु बालस्यानन्नभोजिनः ॥७॥
अनुप्रवेशादाक्षेपादुष्णात्सत्त्वावनादपि । जायते नयनव्याधिः श्लेष्मलोहितसंभवः ॥८॥

दोषों के कारण दूषित हुए उस दूध को जब शिशु पीता है तब माता के लवण एवं अम्ल रस के सेवन करने से तथा उत्पन्न हुआ आहार दोष से–अन्न का सेवन न करनेवाले अर्थात् केवल दूध का पान करने वाले बालक में प्रवेश करके आक्षेप तथा उष्णता के कारण कफ तथा रक्त से उत्पन्न होनेवाला नेत्र रोग हो जाता है ॥६-८॥

अभीक्ष्णमस्रं स्रवते न च क्षीवति दुर्मनाः ।
नासिकां परिमृद्नाति कर्णं वाञ्छ(ह्य)ति दुःखितः ॥९॥
ललाटमक्षिकूटं च नासां च परिमर्दति । नेत्रे कण्डूयतेऽभीक्ष्णं पाणिना चाप्यतीव तु ॥१०॥
स प्रकाशं न सहते अश्रु चास्य प्रवर्तते । वर्त्मनि श्वयथुश्चास्य जानीयात्तं कुक्कुणकम् ॥११॥

कुक्कुणक के लक्षण—उसकी आंखों से निरन्तर पानी बहता रहता है, उसे छींक नहीं आती, उसका मन बड़ा अप्रसन्न रहता है, अत्यन्त दुखी हुआ अर्थात् कष्टपूर्वक वह नासिका तथा कानों को कुरेदता रहता है, ललाट (माथा), आंखों तथा नाक को मसलता है, आंखों में बहुत अधिक खाज चलती है जिससे वह उन्हें हाथों से रगड़ता है, वह प्रकाश (रोशनी–चमक–Light) को सहन नहीं कर सकता है, आंखों से अश्रु (पानी–Lacrimation) बहते रहते हैं तथा नेत्रवर्त्म (नेत्र पक्ष्म) में शोथ हो जाती है। ये कुक्कुणक के लक्षण हैं ॥९-११॥

तस्य चिकित्सितं श्रेष्ठं व्याख्यास्यामि यथा तथा ।
धात्रीं तु तस्य वामयेद्युक्तं चैव विपाचयेत् ॥१२॥
तस्या वान्तविरिक्ताया निर्दुह्य च स्तनावुभौ । भोजनानि च सर्वाणि यथायुक्तं प्रदापयेत् ॥१३॥
पथ्यं भुञ्जीत खादेत विपरीतं च वर्जयेत् । प्रयता शुद्धवस्त्रा स्यादक्लिष्टाऽमलिना तथा ॥१४॥

उसकी श्रेष्ठ चिकित्सा का मैं यथाविधि वर्णन करूंगा—उस बालक की धात्री को वमन कराये तथा युक्तिपूर्वक उसके दोषों का पाचन करे। वमन तथा विरेचन के बाद उसके दोनों स्तनों का दोहन करे अर्थात् स्तनों से (Breast pump) इत्यादि द्वारा दूध निकाल दे तथा उसके बाद उसे युक्तिपूर्वक सम्पूर्ण पथ्य भोजन खाने के लिये देवे और अपथ्य भोजन का त्याग कर दे। निर्मल वस्त्र धारण करे, क्लेशयुक्त न रहे तथा वह साफ सुथरी रहे ॥१२-१४॥

ततो वर्त्मनि बालस्य निर्भुज्याथ प्रमृज्य च । निर्मुच्य रुधिरं दुष्टं कुर्याच्छिरोऽवसेचनम् ॥१५॥

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