काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 832, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें४७२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]
बन्द हो जाते हैं जिससे स्तनों में स्तम्भ (अकड़ाहट), पिपासा, हृदयद्रव (Palpitation of the Heart), कुक्षिशूल, पार्श्वशूल, कटिशूल, अङ्गमर्द तथा शिरोवेदना हो जाती है। ये स्तन्योत्पत्ति के कारण उत्पन्न ज्वर के अपने लक्षण कहे गये हैं। तथा दूध का शोधन होने पर क्रमशः ज्वर शान्त हो जाता है ॥६३-६५॥
ग्रहावलोकितत्रासवाताघातावधूननैः । ज्वर्यते चेत् प्रसूता स्त्री तस्य वक्ष्यामि लक्षणम् ॥६६॥ उद्वेपको निष्ठननं चक्षुषो विभ्रमः श्रमः । कम्पनं हस्तनेत्राणां हारिद्रमुखनेत्रता ॥६७॥ क्षणेन श्यावताऽज्ञानं क्षणेन च सवर्णता । सुप्रबोधः सह .... क्रोशः केशलुञ्चनम् ॥६८॥ पवनज्वररूपाणि भूयिष्ठानि करोति च । विधिर्ग्रहघ्नोऽस्य हितः क्रमो यश्चानिलज्वरे ॥६९॥
ग्रहोत्थ ज्वर के लक्षण—ग्रहों के देखने से, भय से, वायु के कारण और आघात तथा कम्पन के कारण यदि प्रसूता स्त्री को ज्वर हो जाय तो उसके लक्षण मैं कहूंगा। वे निम्न होते हैं—शरीर में वेपथु, अङ्गों में पीडा, नेत्रविभ्रम, थकावट तथा हाथों और नेत्रों में कम्पन होता है, मुख तथा नेत्रों का वर्ण हारिद्र (पीला-हल्दी के समान) हो जाता है। क्षण भर में अङ्ग कृष्णवर्ण के हो जाते हैं तथा अगले क्षण ही वर्ण ठीक हो जाता है, उस समय उसे अच्छी प्रकार ज्ञान होता है, वह चिल्लाती है, बालों को नोचती है तथा विशेषरूप से वातज्वर के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। इस अवस्था में ग्रहनाशक उपचार तथा वातज्वर की चिकित्सा करनी चाहिये ॥६६-६९॥
श्लेष्माभिष्यन्दिनीं स्थूलामक्लिन्नामल्पनिःस्रुताम् । विदग्धभक्तां स्निग्धां च लङ्घनेनोपपादयेत् ॥७०॥
यदि उस स्त्री का शरीर कफ एवं अभिष्यन्द से युक्त हो, स्थूल हो, क्लेदरहित तथा स्राव कम हुआ हो, उसका खाया हुआ भोजन विदग्ध हो जाता हो अर्थात् पूरा पाक न होता हो तो उसे स्नेहन कराकर लङ्घन का प्रयोग कराये ॥७०॥
रूक्षां निःस्रुतरक्तां च कृशां वातज्वरार्दिताम् । क्षुत्तृष्णाभिहतां क्लान्तां शमनेनोपपादयेत् ॥७१॥ तस्यास्तदहरेवेह पेयादिः क्रम इष्यते । लङ्घितायाश्च मण्डादिरित्येष द्विविधः क्रमः ॥७२॥
जो स्त्री रूक्ष हो, जिसका रक्त न निकला हो, जो कृश एवं वातज्वर से पीडित हो, जो भूख और प्यास से व्याकुल हो तथा शरीर क्लान्त हो—उसकी संशमन ओषधियों के द्वारा चिकित्सा करे। तथा उसे उसी दिन पेयादि क्रम से भोजन कराये। और जिसे लङ्घन कराया गया है उसे मण्ड आदि का भोजन कराना चाहिये। इस प्रकार यह दो प्रकार का भोजन का क्रम होता है।
वक्तव्य—पेया तथा मण्ड यवागू के भेद होते हैं। सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है—सिक्थकै रहितो मण्डः पेया सिक्थसमन्विता। अर्थात् पके हुए चावलों में से सिक्थ (ठोस भाग) को छोड़कर केवल ऊपर का द्रवभाग छान कर निकाल लिया जाय तो उस द्रवभाग को मण्ड कहते हैं। तन्त्रान्तर में कहा है—'नीरे चतुर्दशगुणे सिद्धो मण्डस्त्वसिक्थकः'। सिक्थ (ठोस भाग) से युक्त यवागू को पेया कहते हैं। यहां पर उसीप्रकार १४ गुने जल में चावलों को पकाया जाता है परन्तु पकाने के बाद उसे मण्ड की भांति छानना नहीं चाहिये। उस सिक्थ (ठोस भाग) से युक्त यवागू को पेया कहते हैं। इसमें सिक्थ (ठोस) भाग थोड़ा ही होना चाहिये अन्यथा सिक्थभाग के अधिक होने पर वह यवागू का अगला भेद विलेपी बन जाता है। कहा है—विलेपी बहुसिक्था स्याद् यवागूर्विरलद्रवा ॥७१-७२॥
पेया हि दीपयत्यग्निं धातून् संशमयत्यपि । गर्भदोषावशेषघ्नो मण्डो दोषविपाचनः ॥७३॥
पेया अग्नि को प्रदीप्त करती है तथा धातुओं का संशमन करती है। मण्ड गर्भ के अवशिष्ट दोषों को नष्ट करता है तथा दोषों का पाचन करता है ॥७३॥
तस्मात् पेया च मण्डश्च क्रमादौ विहितौ हितौ । अकृतश्च कृतश्चैव द्वित्रियूषरसौ तथा ॥७४॥