काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४७३
इसलिये चिकित्सा क्रम के प्रारम्भ में पेया और मण्ड का प्रयोग हितकर माना गया है। तथा दो-तीन दिन तक अकृत और कृत यूष तथा मांसरस का सेवन करना चाहिये।
वक्तव्य—मूंग आदि को १८ गुने पानी में पकाने से यूष बनता है। जो यूष स्नेह लवण आदि के द्वारा संस्कृत कर लिया जाता है उसे 'कृत' तथा स्नेह लवण आदि के द्वारा असंस्कृत यूष को 'अकृत' कहते हैं ॥७४॥
स्वेदोऽपतर्पणं युक्त्या पाचनौषधसेवनम्। कषायोऽभ्यञ्जनं सर्पिर्ज्वरघ्नः परमो विधिः ।।७५।।
ज्वर नाशक उपाय—स्वेद, युक्तिपूर्वक अपतर्पण, पाचन ओषधियों का सेवन, कषाय, अभ्यङ्ग एवं घृत-ये श्रेष्ठ ज्वरनाशक उपाय हैं ॥७५॥
शीतोपवासे व्यायाममायासमहिताशनम्। तद्धेतुसेवनं चैव क्षिप्रं ज्वरबलावहम् ।।७६।।
ज्वर को बढ़ाने वाले उपाय—शीत (ठण्ड लग जाना अथवा शीतल वस्तुओं का प्रयोग), उपवास, व्यायाम, परिश्रम, अहितकर भोजन तथा ज्वर को उत्पन्न करने वाले पदार्थों का सेवन करने से शीघ्र ही ज्वर के बल में वृद्धि हो जाती है अर्थात् उपर्युक्त कारणों से ज्वर की वृद्धि हो जाती है ॥७६॥
गर्भाशये च्युते नार्या दोषास्तदनुगामिनः। च्यवन्ति तस्माद्वमनं नस्यं बस्तिर्विरेचनम् ।।७७।। न कार्यमल्पदोषायाः शरीरे परिसंस्थिते। तदेव युक्तितः कार्यं वीक्ष्य दोषबलाबलम् ।।७८।।
प्रसूता स्त्री के गर्भाशय के अपने स्थान से च्युत हो जाने (नीचे आजाने) के कारण शरीरस्थित दोष भी उस गर्भाशय का अनुगमन करके नीचे की ओर आजाते हैं इसलिये उसे वमन, नस्य, बस्ति तथा विरेचन आदि नहीं कराने चाहिये। परन्तु यदि उसके शरीर में दोष अल्प मात्रा में ही विद्यमान हों तथा शरीर स्थित हो तो शरीर में दोषों के बलाबल को देखकर युक्तिपूर्वक उन सब का सेवन किया जा सकता है ॥
वमन वा विरेकं वा तीक्ष्ण तीक्ष्णौषधान्वितम्। न ह्यतिच्युतदोषायां ज्वरितायाः प्रशस्यते ।।७९।।
जिस ज्वरयुक्त प्रसूता स्त्री के शरीर में दोष बहुत अधिक मात्रा में अपने स्थान से च्युत हो गये हों-नीचे की ओर आ गये हों उसे तीक्ष्ण ओषधियों से युक्त तीक्ष्ण वमन एवं विरेचन नहीं देना चाहिये ॥७९॥
संतप्ते तूष्मणा देहे धातवः परिपाचिताः। भूयस्तीक्ष्णौषधं प्राप्य गच्छेयुरमितां गतिम् ।।८०।।
ज्वर की ऊष्मा (गरमी) के कारण संतप्त हुए शरीर में धातुओं का परिपाक हो जाता है। शरीर में पुनः तीक्ष्ण ओषधियों के पहुंचने से उन धातुओं का और अधिक पाक हो जाता है ॥८०॥
उत्क्लिश्यमाने हृदये कफे चाप्युरसि स्थिते। कफज्वरे क्षमे देहे विदध्याद्वमनं मृदु ।।८१।।
वमन का प्रयोग—कफ ज्वर में हृदय का उत्क्लेश होने पर, कफ के वक्षःस्थल में स्थित होने पर तथा शरीर के सहनशील होने पर मृदु वमन देना चाहिये ॥८१॥
अरुचौ कण्ठसंरोधे कफे चैव शिरोगते। अशक्यमाने कवले नस्यं तत्र विधापयेत् ।।८२।।
नस्य का प्रयोग—अरुचि और कण्ठरोध होने पर तथा कफ के सिर में स्थित होने पर यदि कवल का प्रयोग नहीं किया जा सकता हो तो नस्य का प्रयोग कराना चाहिये ॥८२॥
संसर्गपाचिते दोषे ज्वरे च मृदुतां गते। पञ्चाहात् सप्तरात्राद्वा कषायमवचारयेत् ।।८३।। पाचनीयं तु पञ्चाहात् सप्ताहादानुलोमिकम्।