काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 838, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें४७८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]
मधुकं केसरं गोपी निम्बपत्रं कशेरुकम् ।।१२०।। शर्करामधुसंयुक्तो लेहो मुखविशोधनः ।
मुलहठी, नागकेशर, गोपी (सारिवा), नीम के पत्ते तथा कसेरु के चूर्ण में शर्करा और मधु मिलाकर बनाया हुआ चूर्ण मुख का शोधन करता है ।।१२०।।
शान्तवेगे ज्वरे चास्यै दद्यान्मृदु विरेचनम् ।।१२१।। चतुरङ्गुलमृद्वीकात्रिवृत्कल्केन बुद्धिमान् । प्रदिहेद्दारुसंयुक्तैस्तालीसोशीरचन्दनैः ।।१२२।।
ज्वर का वेग शान्त हो जाने पर बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि उसे अमलतास, मुनक्का तथा त्रिवृत् के कल्क से मृदु विरेचन देवे । तथा उसके शरीर पर देवदारु, तालीशपत्र, खश तथा चन्दन का लेप करना चाहिये ।।१२१-१२२।।
मधुकस्य च कल्केन कल्केन तगरस्य च । तैलमभ्यञ्जनं सिद्धं पीतं ज्वरमपोहति ।।१२३।।
मुलहठी तथा तगर के कल्क से सिद्ध किया हुआ तैल मालिश तथा पीने से ज्वर को नष्ट करता है ।।१२३।।
पटोलस्य गुडूच्याश्च रोहिण्यारग्वधस्य च । चन्दनस्य च कल्केन सिद्धं सर्पिर्ज्वरापहम् ।।१२४।।
पटोल (परवल), गिलोय, कटुरोहिणी, अमलतास तथा चन्दन के कल्क से यथाविधि सिद्ध किया हुआ घृत ज्वर को नष्ट करता है ।।१२४।।
चन्दनाद्येन वा सिद्धं पटोलाद्येन वा घृतम् । पाययेत्तिक्तसर्पिर्वा तित्तिराद्यमथापि वा ।।१२५।।
अथवा चन्दन आदि या पटोलादि ओषधियों से सिद्ध किये हुए घृत का प्रयोग कराये अथवा तिक्तसर्पि या तित्तिराद्य घृत का पान कराना चाहिये ।।१२५।।
अम्लानि चान्नपानानि तथोष्णकटुकानि च । पित्तज्वरे विवर्ज्यानि प्रत्यनीकानि चाचरेत् ।।१२६।।
पित्तज्वर में अम्ल, उष्ण तथा कटु अन्नपान आदि का त्याग कर देना चाहिये तथा इनसे विपरीत गुण वाले अन्नपान आदि का सेवन करना चाहिये । अर्थात् मधुर, तिक्त एवं कषाय रसयुक्त तथा शीतल अन्न-पान का सेवन करना चाहिये ।।१२६।।
सम्यक्संसर्गयोगेन भग्नवेगं कफज्वरम् । जयेद्भेषज्यपानैश्च सपिषाऽभ्यञ्जनेन च ।।१२७।।
जिसका वेग शान्त हो गया है ऐसे कफ ज्वर को अच्छी प्रकार औषध, पान, घृत तथा अभ्यङ्ग (मालिश) के संसृष्टयोग के द्वारा शान्त करे । अर्थात् उपर्युक्त सब उपायों को अच्छी प्रकार यथावश्यक मिलाकर चिकित्सा करनी चाहिये ।।
बृहत्यौ पुष्करं दारु पिप्पल्यो नागरं शटी । क्वाथमेषां पिबेदुष्णामादौ दोषविपाचनम् ।।१२८।।
कफ ज्वर के प्रारम्भ में दोषों का पाचन करने के लिये दोनों बृहती, पुष्करमूल, देवदारु, पिप्पली, सोंठ तथा कचूर का गरम २ क्वाथ पिलाना चाहिये ।।१२८।।
द्विपञ्चमूलीं भार्गीं च कर्कटाख्यां दुरालभाम् । नागरं पिप्पलीं दारुं पिबेद्वा सैन्धवान्वितम् ।।१२९।। (इति ताडपत्रपुस्तके २२९ तमं पत्रम्)
अथवा दोनों पञ्चमूल (बृहत् तथा लघु अर्थात् दशमूल), भारंगी, काकड़ाशृंगी, दुरालभा, सोंठ, पीपल तथा देवदारु के क्वाथ में लवण डालकर पीना चाहिये ।।१२९।।