भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

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सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४७७

शार्ङ्गेष्ठां मरुवां पाठां नक्तमालं सवत्सकम् ।।१११।। निम्बमारग्वधोशीरमासुतं^१ मधुना पिबेत्।

इसमें शार्ङ्गेष्ठा (काकजंघा-कुल इसका अर्थ काकमाची तथा गुंजा भी कहते हैं), मरवा, पाठा, नक्तमाल (करञ्ज), इन्द्रजौ, नीम, अमलतास तथा खस-इन ओषधियों का आसव बनाकर उसमें मधु मिलाकर सेवन करना चाहिये ॥१११॥

स्थिराद्यं पञ्चमूलं च केसरं संकशेरुकम् ।।११२।। गोपीं पर्पटकशीरं धान्यकं चेति साधयेत् । पादावशिष्टं तच्छीतं पिबेत् समधुशर्करम् ।।११३।।

स्थिरा (शालपर्णी) आदि ओषधियां, पञ्चमूल, नागकेशर, कशेरुक, गोपी (सारिवा), पित्तपापड़ा, खस तथा धनियां इन्हें सिद्ध करे अर्थात् १६ गुने पानी में डालकर क्वाथ बनाये। चतुर्थांश शेष रहने पर ठण्डा करके उसमें मधु एवं शर्करा मिलाकर पिलाना चाहिये ॥११२-११३॥

मुस्ताद्विसारिवोशीरयष्टिकारोध्रपद्मकैः । सप्तपर्णैरष्टाङ्गैरैर्वार्यर्धार्ढकमाप्लुतम् ।।११४।। तन्निशामुषितं पूतं पातव्यं शर्करायुतम् । कर्षेण कटुरोहिण्याः श्लक्ष्णपिष्टेन चान्वितम् ।।११५।। सर्वाभिषवराजोऽयं सर्वज्वरनिवारणः ।

नागरमोथा, दोनों सारिवा (कृष्ण तथा श्वेत), खस, मधुयष्टि, लोध्र, पद्माख तथा सप्तपर्ण इन आठ द्रव्यों को आधा आढक पानी में भिगोकर रख दे। रात भर पड़ा रहने के बाद प्रातः काल छानकर उसमें शर्करा तथा एक कर्ष (तोला) बारीक पिसा हुआ कटुरोहिणी का कल्क मिलाकर पिलाना चाहिये। यह उत्तम अभिषव है। यह सब प्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है ॥११४-११५॥

मृद्वीका नागपुष्पं च मरिचान्यथ शर्करा ।।११६।। पत्रमेला च चव्यं च पानकं पैत्तिके ज्वरे।

पैत्तिक ज्वर में मुनक्का, नागकेशर, मरिच, शर्करा, तेजपत्र, छोटी इलायची तथा चव्य का पानक (शर्बत-Syrup)) बनाकर पिलाना चाहिये ॥११६॥

भद्रश्रीस्तिन्दुको मुस्ता पयस्या मधुकं वचा ।।११७।। कषाय एषां पातव्यो ज्वरातीसारनाशनः । पिबेन्मुद्गरसं वाऽपि पृश्निपर्णीस्थिरायुतम् ।।११८।।

ज्वरातीसार में भद्रश्री (चन्दन), तिन्दुक (तेंदूं- Diospyros Embroypteris), नागरमोथा, पयस्या (क्षीरकाकोली), मुलहठी तथा बच-इनका कषाय बनाकर पिलाना चाहिये। अथवा पृश्निपर्णी और शालपर्णी युक्त मुद्गयूष पिलाना चाहिये ॥११७-११८॥

सारिवाचन्दनोशीरद्राक्षापद्मकसाधिकम् । लाजपेयां पिबेच्छर्दिमूर्च्छादाहज्वरापहाम् ।।११९।। मुद्गयूषेण वाऽश्नीयान्मधुरेण रसेन वा।

छर्दि (वमन), मूर्च्छा, दाह तथा ज्वर को नष्ट करने के लिये सारिवा, चन्दन, खस, मुनक्का तथा पद्माख द्वारा सिद्ध की हुई लाजपेया अथवा उस लाजपेया में मुद्गयूष या मधुर रस युक्त द्रव्य मिलाकर पिलानी चाहिये। धान की खील से बनी पेया को लाजपेया कहते हैं ॥११९॥


१. आसवीकृतमित्यर्थः, “सन्धानाच्चिरकालाम्लमासुतं परिकीर्तितम्’।

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