काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 836, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४७६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] |
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उचित काल में योग्य मात्रा में खटाई तथा नमक डले हुए पञ्चमुष्टिकयूष अथवा जांगल-मांसरस के साथ भोजन कराये ॥१०२॥
यवकोलकुलत्थानां पञ्चमूलद्वयस्य च ।। १०३ ।।
क्वाथे दधियवक्षारचव्यचित्रकनागरैः । पिप्पलीभिश्च तत् सिद्धं सर्पिर्ज्वरहरं पिबेत् ।। १०४ ।।
वातश्लेष्मविबन्धघ्नं ग्रहणीदीपनं परम् । श्यामातिल्वकसिद्धेन सर्पिषा च विरेचयेत् ।। १०५ ।।
यव, कोल (बेर), कुलत्थ तथा लघु एवं बृहत् पञ्चमूल के क्वाथ में दही, यवक्षार, चव्य, चित्रक, सोंठ तथा पिप्पली डालकर सिद्ध किया हुआ घृत पिलाना चाहिये। यह ज्वर को नष्ट करता है, वायु तथा श्लेष्मा (कफ) के विबन्ध को दूर करता है तथा ग्रहणी को उत्तेजित करता है। इसके बाद श्यामा (त्रिवृत्) तथा तिल्वक (लोध्र) से सिद्ध किये हुए घृत के द्वारा विरेचन देना चाहिये ॥१०३-१०५॥
स चेद्वातोल्बणत्वाच्च वेपथुर्नोपशाम्यति । स्वभ्यक्तामुष्णतैलेन धूपयेत् सुरदारुणा ।। १०६ ।।
सुखोष्णैरम्लपिष्टैश्च सर्वगन्धैः प्रलेपयेत् ।
यदि वायु की प्रधानता के कारण उस ज्वर में वेपथु (कम्पन) शान्त न हो तो उसे शरीर पर उष्ण तैल की मालिश करके देवदारु की धूप देनी चाहिये। तथा सर्वगन्ध¹ द्रव्यों को कांजी में पीसकर उनका शरीर पर ईषदुष्ण लेप करना चाहिये ॥१०६॥
स्योनाकवासावंशानां तर्कर्येरण्डयोस्तथा ।। १०७ ।।
अपामार्गस्य काश्मर्या भङ्गोष्णाम्लेऽवगाहयेत् ।
अरलु, बांसा, बांस, तर्कारी (अग्निमन्थ-अरणी), एरण्ड, अपामार्ग, गंभारी तथा भांग के गरम काढ़े में कांजी डालकर उसमें उसका अवगाहन करे।
अवगाहन से अभिप्राय निमज्जन (Tub-bath) से है। अर्थात् एक टब में उपर्युक्त द्रव्यों के क्वाथ को भरके उसमें रोगी यथाविधि बिठाकर Bath देना चाहिये ॥१०७॥
सुखावगाढामाश्वस्तां मांसाद्याजिनकम्बलैः ।। १०८ ।।
कुष्ठगुग्गुलुधूपेन घृतमिश्रेण धूपयेत् । उष्णानि चान्नपानानि ............. ।। १०९ ।।
तदनन्तर मांसरस खिलाकर तथा मृगचर्म एवं गरम कम्बलों से उसे सुखपूर्वक ढककर आश्वासन.देके तथा घी मिले हुए कुष्ठ, गूगल तथा धूप के द्वारा उसका धूपन करे। तथा उसके बाद उष्ण अन्नपान का प्रयोग कराये ॥१०८-१०९॥
उष्णो वर्ज्यश्च पवनः पित्ते चोष्णं विरुध्यते । अतीक्ष्णोपद्रवं तस्मात् पित्तज्वरमुपक्रमेत् ।। ११० ।।
कषायतिक्तमधुरैः प्रदेहाभ्यञ्जनौषधैः ।
उष्णता (गर्मी) पित्त की विरोधी है तथा उष्ण वायु भी इसमें वर्जित है अतः जिसमें तीक्ष्ण उपद्रव नहीं हैं ऐसे पित्तज्वर की कषाय, तिक्त एवं मधुर द्रव्यों तथा प्रदेह (लेप) और मालिश की ओषधियों के द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये ॥११०॥
१. सर्वगन्ध—चातुर्जातककर्पूरकक्कोलागुरूंकुङ्कुमम् । लवङ्गसहितञ्चैव सर्वगन्धं प्रकीर्तितम् ॥