काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४७९
पटोलं धान्यकं मुस्ता मूर्वा पाठा निदिग्धिका । कषाय एषां पातव्यः षडङ्गो मधुसंयुतः ।। १३० ।।
पटोल (परवल), धनियां, नागरमोथा, मरोड़फली, पाठा तथा छोटी कटेरी इन ६ चीजों का क्वाथ मधु डालकर पीना चाहिये ।। १३० ।।
नागरामरदारुभ्यां शृतमुष्णं पिबेज्जलम् । बालमूलकयूषेण जाङ्गलानां रसेन वा ।। १३१ ।। कटूष्णद्रव्ययुक्तेन मन्दस्निग्धेन भोजयेत् ।
सोंठ तथा देवदारु से पकाया हुआ उष्ण जल पीना चाहिये । तथा कच्ची मूली के यूष अथवा जांगल मांसरस में कटु एवं उष्ण द्रव्य तथा थोड़ा स्नेह डालकर भोजन कराना चाहिये ।। १३१ ।।
पिबेद्गोमूत्रसंयुक्तं त्रिवृत्कल्कविरेचनम् ।। १३२ ।। काले कल्याणकं सर्पिः पिबेद्वा दाशमौलिकम् ।
विरेचन के लिये उचित काल में त्रिवृत् के कल्क में गोमूत्र मिलाकर पिलाना चाहिये अथवा कल्याणक घृत या दशमूल घृत का सेवन कराना चाहिये ।। १३२ ।।
लाक्षा मुस्ता हरिद्रे द्वे शताह्वा भद्ररोहिणी ।। १३३ ।। देवपुष्या वचा दारु सरलं चेति तैः समैः । पचेत्तैलं तदेतेन कुर्यादभ्यञ्जनं भिषक् ।। १३४ ।।
लाक्षा, नागरमोथा, हरिद्रा, दारुहरिद्रा, सोया, भद्ररोहिणी, लौंग, बच, देवदारु तथा सरल (चीड़) सब समभाग लेकर यथाविधि तैलपाक करे । उस तैल के द्वारा वैद्य रोगी का अभ्यङ्ग कराये ।। १३३-१३४ ।।
कुष्ठागरुव्याघ्रनखं मांसी धान्यकसामकम् । वक्रं हरेणुं ह्रीबेरं स्थौणेयं केसरं त्वचम् ।। १३५ ।। एले द्वे सरलं दारु मूर्वा कालानुसारिवा । बर्हिष्ठं शतपुष्या च पृथ्वीका देवपुष्पकम् ।। १३६ ।। एतैर्हि समभागैस्तु तैलं धीरो विपाचयेत् । एतदभ्यञ्जनादेव कफज्वरमपोहति ।। १३७ ।। शेषं वातज्वरहितं कार्यमत्र चिकित्सितम् ।
कुष्ठ, अगर, व्याघ्रनख (बृहन्नखी), जटामांसी, धनियां, सामक, वक्र (कुटिल-तगर), हरेणु, गन्धबाला, स्थौणेयक (सुगन्ध औषध विशेष-थुनेर-Clerodendron-Infortunatum) नागकेसर, दालचीनी, छोटी तथा बड़ी इलायची, सरल (चीड़), देवदारु, मरोड़फली, कालानुसारिवा (उत्पलसारिवा), बर्हिष्ठ (नेत्रबाला), सौंफ, पृथ्वीका (स्थूलजीरा), लौंग-समभाग लेकर बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि यथाविधि तैलपाक करे । इस तैल के मर्दन से ही कफज्वर नष्ट हो जाता है । शेष जो वातज्वर में हितकारी चिकित्सा है वह सारी यहां भी करनी चाहिये ।। १३५-१३७ ।।
मधुराण्यन्नपानानि स्निग्धानि च गुरूणि च ।। १३८ ।। कफज्वरे विवर्ज्यानि प्रत्यनीकानि चाचरेत् ।
कफज्वर का पथ्यापथ्य—कफज्वर में मधुर, स्निग्ध एवं गुरु अन्नपान का त्याग कर देना चाहिये तथा इनसे विपरीत गुण वाले पदार्थों का सेवन करना चाहिये अर्थात् कटुरस युक्त रूक्ष तथा लघु अन्न-पान का सेवन करना चाहिये ।। १३८ ।।
सन्निपातज्वरस्यातः प्रवक्ष्यामि चिकित्सितम् ।। १३९ ।। स सर्वलक्षणोऽसाध्यः कृच्छ्रसाध्योऽल्पलक्षणः । बलहीनस्य नष्टाग्नेः सर्वथा नैव सिद्ध्यति ।। १४० ।। किमङ्ग ! सूतिकानां तु क्षीणधातुबलौजसाम् । तथाऽपि यत्नमातिष्ठेदानृशंस्याद्भिषग्वरः ।। १४१ ।।
५३ का.सं.