भारतकोश
संग्रह पर लौटें

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४७९

पटोलं धान्यकं मुस्ता मूर्वा पाठा निदिग्धिका । कषाय एषां पातव्यः षडङ्गो मधुसंयुतः ।। १३० ।।

पटोल (परवल), धनियां, नागरमोथा, मरोड़फली, पाठा तथा छोटी कटेरी इन ६ चीजों का क्वाथ मधु डालकर पीना चाहिये ।। १३० ।।

नागरामरदारुभ्यां शृतमुष्णं पिबेज्जलम् । बालमूलकयूषेण जाङ्गलानां रसेन वा ।। १३१ ।। कटूष्णद्रव्ययुक्तेन मन्दस्निग्धेन भोजयेत् ।

सोंठ तथा देवदारु से पकाया हुआ उष्ण जल पीना चाहिये । तथा कच्ची मूली के यूष अथवा जांगल मांसरस में कटु एवं उष्ण द्रव्य तथा थोड़ा स्नेह डालकर भोजन कराना चाहिये ।। १३१ ।।

पिबेद्गोमूत्रसंयुक्तं त्रिवृत्कल्कविरेचनम् ।। १३२ ।। काले कल्याणकं सर्पिः पिबेद्वा दाशमौलिकम् ।

विरेचन के लिये उचित काल में त्रिवृत् के कल्क में गोमूत्र मिलाकर पिलाना चाहिये अथवा कल्याणक घृत या दशमूल घृत का सेवन कराना चाहिये ।। १३२ ।।

लाक्षा मुस्ता हरिद्रे द्वे शताह्वा भद्ररोहिणी ।। १३३ ।। देवपुष्या वचा दारु सरलं चेति तैः समैः । पचेत्तैलं तदेतेन कुर्यादभ्यञ्जनं भिषक् ।। १३४ ।।

लाक्षा, नागरमोथा, हरिद्रा, दारुहरिद्रा, सोया, भद्ररोहिणी, लौंग, बच, देवदारु तथा सरल (चीड़) सब समभाग लेकर यथाविधि तैलपाक करे । उस तैल के द्वारा वैद्य रोगी का अभ्यङ्ग कराये ।। १३३-१३४ ।।

कुष्ठागरुव्याघ्रनखं मांसी धान्यकसामकम् । वक्रं हरेणुं ह्रीबेरं स्थौणेयं केसरं त्वचम् ।। १३५ ।। एले द्वे सरलं दारु मूर्वा कालानुसारिवा । बर्हिष्ठं शतपुष्या च पृथ्वीका देवपुष्पकम् ।। १३६ ।। एतैर्हि समभागैस्तु तैलं धीरो विपाचयेत् । एतदभ्यञ्जनादेव कफज्वरमपोहति ।। १३७ ।। शेषं वातज्वरहितं कार्यमत्र चिकित्सितम् ।

कुष्ठ, अगर, व्याघ्रनख (बृहन्नखी), जटामांसी, धनियां, सामक, वक्र (कुटिल-तगर), हरेणु, गन्धबाला, स्थौणेयक (सुगन्ध औषध विशेष-थुनेर-Clerodendron-Infortunatum) नागकेसर, दालचीनी, छोटी तथा बड़ी इलायची, सरल (चीड़), देवदारु, मरोड़फली, कालानुसारिवा (उत्पलसारिवा), बर्हिष्ठ (नेत्रबाला), सौंफ, पृथ्वीका (स्थूलजीरा), लौंग-समभाग लेकर बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि यथाविधि तैलपाक करे । इस तैल के मर्दन से ही कफज्वर नष्ट हो जाता है । शेष जो वातज्वर में हितकारी चिकित्सा है वह सारी यहां भी करनी चाहिये ।। १३५-१३७ ।।

मधुराण्यन्नपानानि स्निग्धानि च गुरूणि च ।। १३८ ।। कफज्वरे विवर्ज्यानि प्रत्यनीकानि चाचरेत् ।

कफज्वर का पथ्यापथ्य—कफज्वर में मधुर, स्निग्ध एवं गुरु अन्नपान का त्याग कर देना चाहिये तथा इनसे विपरीत गुण वाले पदार्थों का सेवन करना चाहिये अर्थात् कटुरस युक्त रूक्ष तथा लघु अन्न-पान का सेवन करना चाहिये ।। १३८ ।।

सन्निपातज्वरस्यातः प्रवक्ष्यामि चिकित्सितम् ।। १३९ ।। स सर्वलक्षणोऽसाध्यः कृच्छ्रसाध्योऽल्पलक्षणः । बलहीनस्य नष्टाग्नेः सर्वथा नैव सिद्ध्यति ।। १४० ।। किमङ्ग ! सूतिकानां तु क्षीणधातुबलौजसाम् । तथाऽपि यत्नमातिष्ठेदानृशंस्याद्भिषग्वरः ।। १४१ ।।

५३ का.सं.

४८० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]

अब मैं सन्निपात ज्वर की चिकित्सा.का वर्णन करूंगा। हे प्रिय ! सम्पूर्ण लक्षणों वाला सन्निपात ज्वर असाध्य होता है तथा अल्प लक्षणों वाला कृच्छ्रसाध्य होता है। तथा जिसका शारीरिक बल एवं अग्नि नष्ट हो गई है तथा जिन प्रसूता स्त्रियों का धातु, बल एवं ओज क्षीण हो चुका हो उनमें सन्निपात ज्वर सर्वथा (बिलकुल) ठीक नहीं होता। अथवा सर्वथा ठीक नहीं होता का अभिप्राय यह है कि पूर्णरूप से ठीक नहीं हो पाता है—(अन्त में कुछ न कुछ कसर अवश्य रह ही जाती है)। तथापि चिकित्सक को रोगी की मृत्युपर्यन्त चिकित्सा का प्रयत्न अवश्य करते रहना चाहिये ॥

सन्निपातेषु दोषेषु यो दोषो बलवान् भवेत्। तमेवादौ प्रशमयेच्छेषदोषमतः परम् ।।१४२।।
अल्पान्तरबलेष्वेषु दोषेषु (मति)मान् भिषक् । श्लेष्माणमादौ शमयेत् स ह्येषामनुबन्धकृत् ।।१४३।।
गुरुत्वात् कृच्छ्रपाकत्वादूर्ध्वकायाश्रयात्तथा। तस्माज्ज्वरेण दुर्दिष्टं वातपित्तकफात्मके ।।१४४।।

सन्निपात ज्वर में जो दोष सबसे अधिक बलवान् हो सबसे पहले उसी की चिकित्सा करनी चाहिये। उसके बाद शेष (बचे हुए) दोषों की चिकित्सा करनी चाहिये। यदि वात, पित्त, कफ रूप सन्निपात ज्वर से आक्रान्त व्यक्ति में तीनों दोषों के बलों में विशेष अन्तर न हो अर्थात् तीनों दोष लगभग समान बल वाले हों तो बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि वह पहले श्लेष्मा की चिकित्सा करे क्योंकि गुरु, कृच्छ्रपाकी तथा शरीर के ऊर्ध्वभाग में स्थित होने के कारण श्लेष्मा ही इनमें अनुबन्ध कारक होता है। चरक चि. अ. ३ में भी सन्निपात ज्वर में पहले कफ की चिकित्सा का ही विधान किया गया है। उसके बाद पित्त तथा वात की चिकित्सा करनी चाहिये ॥

तस्यां तस्यामवस्थायां तत्तत् कार्यं चिकित्सितम् । सामान्येन तु वक्ष्यामि तद्विशेषं भिषग्जितम् ।।१४५।।

इसलिये सन्निपात ज्वर की उस २ अवस्था में वह २ चिकित्सा करनी चाहिये अर्थात् ज्वर में जैसी अवस्था हो उसके अनुसार चिकित्सा करनी चाहिये। फिर भी सामान्यरूप से उनमें जो विशेषता है उसका मैं वर्णन करता हूँ ।। १४५ ।।

कुशकाशश्वदंष्ट्रार्कसुधैरण्डपरू(षकैः) । ...... त्रयवद्रोणं चर्मण्यास्तीर्य युक्तितः ।।१४६।।
स्वेदयेत् सूतिकां तत्र गुरुप्रावरणावृताम् ।

सन्निपात ज्वर में स्वेदन—कुश, काश, गोखुरू, आक, थूहर, एरण्ड, परूषक (फालसा) तथा ....जौ—इन सबको एक द्रोण परिमाण में लेकर चमड़े पर फैलाकर प्रसूता स्त्री को भारी वस्त्रों से ढककर तदनन्तर उसे युक्तिपूर्वक स्वेदन देना चाहिये ।। १४६ ।।

नागरं दशमूलं च कट्वङ्गं दारुकद्वयम् ।।१४७।।
पिप्पलीस्त्रिफला भार्गी कर्कटाख्या दुरालभा । ससैन्धवः कषायोऽयं ज्वरे पूर्वापराह्निके ।।१४८।।
मधुहिङ्गुसमायुक्तो देयः सायाह्निके ज्वरे ।

पूर्वाह्न (दिन के पूर्व भाग १२ बजे से पूर्व) तथा अपराह्न (दिन के पिछले पहर ३ बजे के बाद) काल में होने वाले सान्निपातिक ज्वर में सोंठ, दशमूल, कट्वङ्ग (श्योनाक), हरिद्रा, दारुहरिद्रा, पिप्पली, त्रिफला, भारंगी, कर्कट (काकड़ाशृङ्गी अथवा बिल्वशलाटु) तथा दुरालभा के क्वाथ में लवण मिलाकर देना चाहिये। तथा सायंकाल होने वाले ज्वर में उपर्युक्त कषाय में मधु एवं हींग मिलाकर देना चाहिये ॥

पटोलमुस्तामधुकरोहि ........................... ।।१४९।।
सर्पिषा सह पातव्यं सन्निपातेऽनिलोत्तरे ।

यदि सन्निपात ज्वर में वायु की प्रधानता हो तो पटोल (परवल), नागरमोथा, मधुक (मुलहठी) तथा रोहिणी ..... आदि द्रव्यों के क्वाथ को घृत के साथ सेवन कराना चाहिये ॥

सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः १९] खिलस्थानम् ४८१

एतदेव त्रिफलया युक्तं च सुरदारुणा ।।१५०।।
पाययेन्मधुनाऽऽलोड्य सन्निपाते कफोत्तरे।

यदि सन्निपात ज्वर में कफ की प्रधानता हो तो उपर्युक्त क्वाथ में ही त्रिफला तथा देवदारु डालकर उसे मधु में मिलाकर पिलाना चाहिये ।।१५०।।

एलामधूकमधुकशीतपाकीपरूषकैः ।।१५१।।
त्रिफलासारिवापाठामञ्जिष्ठाचतुरङ्गुलैः। पित्तोत्तरे त्वभि(न्यासे) पिबेत् समधुशर्करम् ।।१५२।।

यदि सन्निपात ज्वर में पित्त की अधिकता हो तो छोटी इलायची, महुआ, मुलहठी, शीतपाकी (गुंजा), फालसा, त्रिफला, सारिवा, पाठा, मंजीठ तथा अमलतास के क्वाथ में मधु एवं शर्करा मिलाकर पिलाना चाहिये ।।१५१-१५२।।

भार्गी शृङ्गी त्रिवृद्दन्ती दशमूली दुरालभा।
कट्वङ्गं त्रिफला शुण्ठी पिप्पली चेति तैः शृतम् ।।१५३।।
क्वाथं ससैन्धवक्षारं पाययेच्चानुलोमिकम्। गोमूत्रयुक्तां त्रिवृतां केवलां वा वचां पिबेत् ।।१५४।।

अनुलोमन (Lexative) के लिये भारंगी, काकड़ाशृङ्गी, त्रिवृत् (निसोथ), दन्ती (जमालगोटा), दशमूल, दुरालभा, कट्वङ्ग (श्योनाक), त्रिफला, सोंठ तथा पिप्पली-इत्यादि ओषधियों द्वारा पकाकर बनाये हुए क्वाथ में सैन्धव तथा क्षार मिलाकर पिलाना चाहिये अथवा गोमूत्र में मिलाकर त्रिवृत् या अकेली घृच का सेवन कराये ।।१५३-१५४।।

अनुलोमं गते दोषे संजाते ग्रहणीबले। ........... ततः सर्पिर्वा साधु संस्कृतम् ।।१५५।।

दोषों के अनुलोम हो जाने पर अर्थात् उनकी गति अनुलोम (नीचे की ओर) हो जाने पर तथा ग्रहणी के बलवान् हो जाने पर .... अच्छी प्रकार संस्कृत किया हुआ घृत पिलाना चाहिये ।।

मधुकेनातिविषया रोहिण्या भद्रदारुणा। सिद्धं सर्पिः पिबेत् काले सन्निपातज्वरापहम् ।।१५६।।
कल्याणकं महान्तं वा पञ्चगव्यमथापि वा।

अथवा सन्निपात ज्वर को नष्ट करने के लिये उचित काल में मुलहठी, अतीस, रोहिणी तथा देवदारु से सिद्ध किया हुआ घृत पिलाना चाहिये। अथवा महान् कल्याण घृत या पञ्चगव्य घृत का सेवन कराना चाहिये ।।१५६।।

शीतोष्णैरौषधैस्तैलं सर्वैरिवोपसंस्कृतम् ।।१५७।।
अभ्यञ्जनं विधातव्यं यच्चान्यन्त्रि मलापहम्।

सम्पूर्ण शीत एवं उष्ण ओषधियों से सिद्ध किये हुए तैल का अभ्यङ्ग (मर्दन-मालिश) करना चाहिये। तथा अन्य जो भी त्रिदोषनाशक आहार-विहार आदि हैं, वे सब करने चाहिये ।।१५७।।

हरीतक्या प्रियंग्वा च मालत्याऽऽम(लकेन) च ।।१५८।।
मु(ख)प्रक्षालनं कार्यं वासया खदिरेण वा।

हरड़, प्रियङ्गु, मालती (चमेली), आंवला, बांसा और खदिर (के क्वाथ) से मुखप्रक्षालन करना चाहिये ।।१५८।।

श्लक्ष्णपिष्टं तथाऽऽम्रास्थि रसाञ्जनसमन्वितम् ।।१५९।।
दन्तमांसौष्ठजिह्वानां प्रधानं प्रतिसारणम्।

बारीक पिसी हुई आम की गुठली तथा रसौंत के चूर्ण का दन्तमांस (मसूड़े), होंठ तथा जिह्वा पर प्रतिसारण (Dust) करना चाहिये ।।१५९।।

४८२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]

सन्तप्यमाने शिरसि दधिसर्ज्जरसाक्षतैः ।। १६० ।।
साश्वगन्धैर्मधुयुतैर्ललाटमुपलेहयेत् ।

यदि सिर में बहुत सन्ताप हो तो दही, राल, अक्षत (चावल) तथा असगन्ध (अश्वगन्धा) को मधु में मिला कर मस्तिष्क पर लेप करना चाहिये ॥१६०॥

लघ्वन्नकृतसंसर्गे निरष्टाह¹परे ज्वरे ।। १६१ ।।
संसर्गे सन्निपाते वा सप्रलापेऽनिलोत्तरे । सशूलबद्धविण्मूत्रे सश्वासे च विशेषतः ।। १६२ ।।
पुराणसर्पिः संस्कारो विधेयो जाङ्गलो रसः । दशमूलकुलत्थानां यवानां कुवलस्य च ।। १६३ ।।
कुलीरशृङ्ग्या रास्नायाः शटीपुष्करमूलयोः । भार्ग्या दुरालभायाश्च निर्यूहे साधु साधितः ।। १६४ ।।
तेनास्य विगुणो वायुर्ज्वरश्चास्य प्रशाम्यति ।

ज्वर में आठ दिन व्यतीत हो जाने पर लघु अन्न का प्रयोग करने पर यदि प्रलाप (Delirium) युक्त द्वन्द्वज या सन्निपात ज्वर में वायु की प्रधानता हो तथा यदि उसमें विशेष रूप से शूल, मलमूत्र की रुकावट तथा श्वास की कठिनता हो तो उसे पुराण सर्पि से संस्कृत जांगल मांसरस देना चाहिये । तथा दशमूल, कुलत्थ, यव, कुबल (बेर या पद्म), कुलीरशृंगी (काकड़ाशृङ्गी), रास्ना, शटी (कपूर कचरी), पुष्करमूल, भारंगी तथा दुरालभा को अच्छी प्रकार सिद्धकर निर्यूह बनाना चाहिये । इससे रोगी का विगुण (प्रकुपित) हुआ वायु तथा ज्वर नष्ट हो जाते हैं ।। १६१-१६४।।

पाचनीयैरुपक्रान्ते भग्नवेगे सति ज्वरे ।। १६५ ।।
पक्वावशेषे च मले बले मन्दत्वमागते । पेयं सुशीतं सक्षौद्रमिदं संशमनद्वयम् ।। १६६ ।।
पिप्पली सदुरालम्भा मृद्वीका वा सपिप्पली ।

पाचन द्रव्यों का प्रयोग करने से ज्वर का वेग शान्त हो जाने पर, मल के पचने से कुछ शेष रहने पर तथा बल के कुछ कम हो जाने पर निम्न दो शीतल संशमन योगों में मधु मिलाकर पिलाना चाहिये— १. पिप्पली तथा दुरालभा तथा २. मुनक्का और पिप्पली ।। १६५-१६६।।

गुडूच्यामलकानां च स्वरसे साधितं घृतम् ।। १६७ ।।
कल्केन सारिवाशुण्ठीलोध्रदाडिमचन्दनै । तद्धि मङ्गल्यकं नाम विषमज्वरनाशनम् ।। १६८ ।।
ज्वराणां चापि सर्वेषामेतदेवामृतोपमम् ।

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। अचूष्के (१७४)
(इति) खिलेषु सूतिकोपक्रमणीयो (नामैकादशोऽध्यायः) ।।


गिलोय और आंवले के रस में सारिवा, सोंठ, लोध्र, अनार और चन्दन का कल्क डालकर घृत सिद्ध किया जाय । यह मङ्गल्यक नाम का घृत है । इसके सेवन से विषमज्वर नष्ट हो जाता है तथा अन्य ज्वरों में भी यह अमृत के समान है ॥


१. अष्टौ दिनान्यतिक्रान्त इत्यर्थः ।

जातकर्मोत्तराध्यायः १२] खिलस्थानम् ४८३

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अचूष्फ (१७४)

(इति) खिलेषु सूतिकोपक्रमणीयो (नामैकादशोऽध्यायः) ॥११॥


अथ जातकर्मोत्तराध्यायो द्वादशः।

अथातो जातकर्मोत्तरमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम जातकर्मोत्तर अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। इस अध्याय में उन क्रियाकर्मों का वर्णन किया जायेगा जो शिशु की उत्पत्ति के बाद किये जाते हैं ॥१-२॥

अथ खलु शिशोर्जातस्य तत्कर्मण्यभिनिवृत्ते प्रथम एव मासि कृतरक्षाहोममङ्गलस्वस्त्ययनस्य सूर्योदयदर्शनोपस्थानं, प्रदोषे चन्द्रमसः ॥३॥

अब शिशु की उत्पत्ति के बाद उस उत्पत्तिकर्म (प्रसव) के निवृत्त हो जाने पर प्रथम मास में ही उसकी रक्षा, होम, मङ्गल तथा स्वस्त्ययन (स्वस्तिवाचन) कराकर सूर्योदय का दर्शन एवं पूजा तथा रात्रि में चन्द्रमा का दर्शन कराना चाहिये। वेदों में भी सूर्यदर्शन का विधान दिया है। कहा है—आ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् पश्येम शरदः शतम् ॥३॥

चतुर्थे मासि स्नातालङ्कृतस्याहतवाससा संवीतस्य ससिद्धार्थकमधुसर्पिषा रोचनया चान्वालब्धस्य धात्र्या सहान्तर्गृहान्निष्क्रमणं देवतागारप्रवेशनं च। तत्राग्निं प्रज्वलन्तं घृताक्षतैरभ्यर्च्य ब्रह्माणमीश्वरं विष्णुं स्कन्दं मातृश्चान्यानि च कुलदेवतानि गन्धपुष्पधूपमाल्योपहारैर्भक्ष्यैश्च बहुभिर्बहुविधैः संपूज्य, ततो ब्राह्मणवाचनं कृत्वा, तेषामाशिषो गृहीत्वाऽभिवाद्य च गुरून् पुनः स्वमागारं प्रविशेत्। प्रविष्टं चैनमनेन मन्त्रेणाभ्युक्ष्य भिषग्वर्तेत ॥४॥

'शरच्छतं जीव शिशो! त्वं देवैरभिरक्षितः।
द्विजैरप्याशिषा पूतो गुरुभिश्चाभिनन्दितः' इति ॥५॥

चतुर्थ मास में उस शिशु को स्नान तथा अलंकार (आभूषणों) से युक्त करके नये वस्त्र पहना कर तथा सिद्धार्थक (श्वेत सरसों), मधु तथा घृत से अथवा गोरोचन से युक्त करके धात्री के साथ उसे प्रथम बार घर से बाहर निकाला जाता है तथा मन्दिर में प्रवेश कराया जाता है। वहां मन्दिर में प्रज्वलित हुई अग्नि की घृत तथा अक्षत (चावलों) के द्वारा अभ्यर्थना करके ब्राह्मण, भगवान् विष्णु, स्कन्द, मातृकाओं तथा अन्य भी कुलदेवताओं की गन्ध, पुष्प, धूप एवं माला आदि के उपहारों तथा नाना प्रकार के भक्ष्य पदार्थों द्वारा अनेकविध पूजा करके, ब्राह्मणों को नमस्कार करके तथा उनसे आशीर्वाद लेकर और गुरुओं को अभिवादन करके पुनः लौटकर अपने घर में प्रवेश करे। घर में प्रविष्ट होने पर वैद्य निम्न मन्त्र के द्वारा उसकी अभ्यर्थना करे—शरच्छतं जीव शिशो ! त्वं देवैरभिरक्षितः। द्विजैरप्याशिषा पूतो गुरुभिश्चाभिनन्दितः॥ (अर्थात् हे शिशु ! तुम देवताओं के द्वारा रक्षित, ब्राह्मणों के आशीर्वादों से पवित्र तथा गुरुओं के द्वारा प्रशंसित हुए सौ वर्ष तक जीओ) ॥४-५॥

षष्ठे मासि पुण्याहेऽभ्यर्च्य देवतां, द्विजांश्च भोजनेन सन्तर्प्य दक्षिणाभिः स्वस्ति वाच्य च, गृहमध्ये वास्तुमध्ये वा शुचौ देशे गोमयेनाद्भिश्च चतुर्हस्तमात्रं स्थण्डिलमुपलिप्य मण्डलं चतुरस्रं वा,

४८४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | जातकर्मोत्तराध्यायः १२]


हिरण्यसुवर्णरजतताम्रकांस्यसीसायसानि मणयो मुक्ताप्रवाला(दयः) सर्वे, सर्वाणि धान्यानि व्रीहयः सर्वसतालेष्टक(?) क्षीरदधिघृतमधुगोमयगोमूत्रकार्पासादीनि, बालक्रीडनकानि पिष्टमयानि, तद्यथा- गोगजोष्ट्राश्वगर्दभमहिषमेषच्छागमृगवराहवानररुरुशरभसिंहव्याघ्रकपिनरक्षुद्रककूर्ममीनशुकसारिकाकोकिलक-लविङ्कचक्रवाकहंसक्रौञ्चसारसम्यूरक्रकरचकोरकपिञ्जलचरणाधुधवर्तकाकाराणि, शैल^१कगृह(क)रथकयान-कस्यन्दनकशल्लिकाजिञ्झरिकाखैरिकेशीकातुम्बीकादुष्प्रवाहकभद्रकसंचोल्लकपीठप.......न्दिका-दुहितृकाकुमारकगोलगण्डुकादीन्यन्यानि च स्त्रीकौतुकानीति, भिषक् तस्य मण्डलं सन्निधाय वसुधायै अर्ध्यं दत्त्वाऽनेन मन्त्रेण- ।।६।।

त्वमग्रजा त्वं प्रभवाऽव्यया च लोकस्य धात्री सचराचरस्य ।
त्वमीज्यसे त्वं यजसे महीह मात्रेऽव नः (पा) हि कुमारमेनम् ।।७।।
तं ब्रह्मा अनुमन्यतां स्वाहा ।

छठे मास में किसी शुभ दिन देवता की पूजा करके और ब्राह्मणों को भोजन एवं दक्षिणा से सन्तुष्ट करके तथा स्वस्तिवाचन करके, घर या वास्तु (बड़े भवन) के मध्य में पवित्र स्थान पर गोबर तथा पानी के द्वारा चार हाथ प्रमाण की एक गोल या चौकोर वेदी लीप कर बनाये। उस वेदी के पास वैद्य सुन्दर तथा ऐश्वर्य युक्त, सोने, चांदी, तांबा, कांसी, सीसा तथा लोहे की सब प्रकार की मणियां और मुक्ता, प्रबाल आदि सम्पूर्ण व्रीहि (चावल) आदि धान्य, सर्वसतालेष्टक (?) दूध, दही, घृत, मधु, गोबर, गोमूत्र तथा कपास आदि तथा पिष्टयुक्त (खोये इत्यादि के बनाये हुए) निम्न आकृति वाले खिलौने यथा—गौ, हाथी, ऊंट, घोड़ा, गदहा, भैंस, मेंढा, बकरी, मृग, सूअर, बन्दर, रुरु तथा शरभ जाति के मृग, सिंह, व्याघ्र, कपि, चीता, भेड़िया, कछुआ, मछली, तोता, मैना, कोयल, कलविङ्क, चक्रवाक, हंस, क्रौञ्च, सारस, मोर, क्रकर (केंकड़ा), चकोर कपिञ्जल (गौरय्या), चरपायुध तथा बत्तख के आकार के तथा शिला, गृह, रथ, यान (सवारी), स्यन्दन, शल्लिका, झञ्झर, खैरिका, ईशीका (सरकण्डा), तुम्बी, दुष्प्रवाह, भद्र, संचोल्ल, पीठप... (नना) न्दिका (ननद), दुहिता (लड़की), कुमार, गोलगन्दुक (गेद) इत्यादि आकार वाले तथा अन्य भी स्त्रियों की पसन्द वाले खिलौने इत्यादि रखकर निम्न मन्त्र के द्वारा पृथ्वी को अर्ध्य देवे—त्वमग्रजा त्वं प्रभवाऽव्यया च लोकस्त धात्री सचराचरस्य। त्वमीज्यसे त्व यजसे महीह मात्रेऽव नः (पा) हि कुमारमेनम् ।। तं ब्रह्मा अनुमन्यतां स्वाहा । (अर्थात् हे पृथिवि ! तू सबसे प्रथम हुई है। तू प्रभवा—प्रकृष्ट उत्पत्तिवाली तथा अव्यया—क्षय न होने वाली है। और तू सम्पूर्ण जड़ एवं चेतन जगत् की धात्री धारण करने वाली-पोषक है। हम तेरी पूजा एवं यज्ञ करते हैं। तू हमारी माता के समान है। तू इस बालक की रक्षा कर। ब्रह्मा उसका अनुमोदन करे—इत्यादि) ।।

वक्तव्य—यद्यपि यहां उपर्युक्त मन्त्रों के अर्थ दे दिये गये हैं परन्तु यहां मूल मन्त्र ही अभिप्रेत है ।।६-७।।

ततस्तं मण्डलमध्ये तथैव स्नातमलङ्कृतमहतवाससं कुमारं प्राङ्मुखमुपवेशयेन्मुहूर्तं, मुहूर्तमुपविश्य यद्धस्ताभ्यां प्रथमं गृहीत परिमृशेद्वा कृष्याद्वा तद्भागी भविष्यतीति हृदि निमित्तं कृत्वोत्थाप्योत्तरकालमवहितया धात्र्याऽन्वितः कुमारेण वा एतैरेव क्रीडनकैस्तैजसैरितरैश्च लघुभिरखरैरतीक्ष्णैरवक्रङ्गमैरनवोपस्करैराकर्षण-हरणशक्तै रुचिरभिर्घोषवद्भिर्विनोद्यमानः सोपाश्रयास्तरणोपेतायां भूमौ प्रतिदिनमभ्यासार्थं सकृदुपविशेदिति ।।

इसके बाद उस बालक को उसी प्रकार स्नान, अलंकार (आभूषण) तथा नवीन वस्त्रों से भूषित करके उस मण्डल के मध्य में पूर्व दिशा की ओर मुख करके थोड़ी देर के लिये बिठा दें। थोड़ी देर बैठने के बाद वह बालक अपने हाथों


१. प्राचीनास्तत्तदाकाराः क्रीडनकविशेषा इमे। प्रतिकृत्यर्थे कप्रत्ययः।

जातकर्मोत्तराध्यायः १२] खिलस्थानम् ४८५

के द्वारा वहां उपस्थित पदार्थों में से जिस पदार्थ का सर्वप्रथम ग्रहण, स्पर्श या कर्षण (खींचना) करेगा वह उसी का भागी होगा-ऐसा मनमें सोच ले । उसके बाद उस बालक को उठाकर प्रमाद रहित धात्री अथवा दूसरे बालक के साथ उपर्युक्त अथवा अन्य तेजयुक्त, हल्के, जो खर (कठोर) न हों, जो बहुत तेज न हों, जो बहुत वक्र (टेड़े मेड़े) न हों, जो बिलकुल नवीन न हों, जो खींचकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाये जा सकते हों तथा रुचिकारक एवं शब्दयुक्त (नाना प्रकार के शब्द करने वाले) खिलौनों से विनोद करता हुआ प्रतिदिन किसी के सहारे तथा बिछौने से युक्त भूमि पर अपने खेल आदि के अभ्यास के लिये प्रवेश करे । बालकों के खिलौनों के विषय में चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—क्रीडनकानि खल्वस्य विचित्राणि घोषवन्त्यभिरामाण्यगुरूरायतीक्ष्णाग्राण्यनास्यप्रवेशीन्यप्राणहराण्यवित्रासनानि च स्युः ॥८॥

तत्र श्लोकाः— उपलिप्ते शुचौ देशे शस्त्रतोयाग्निवर्जिते । उपविष्टं सकृच्चैनं न चिरात् स्थापयेद् बुधः ॥९॥

गोबर, मिट्टी आदि से लिपी हुई, पवित्र तथा शस्त्र, जल एवं अग्नि आदि से रहित भूमि में एक बार बैठ हुए शिशुको लगातार बहुत देर तक बुद्धिमान् व्यक्ति न बैठा रहने दे । अर्थात् निरन्तर बहुत देर तक उस अवस्था में न बैठा रहने दे ॥९॥

स्तैमित्यं कटिदौर्बल्यं पृष्ठभङ्गः श्रमो ज्वरः । विण्मूत्रानिलसंरोधाध्मानं चात्युपवेशनात् ॥१०॥

लगातार बहुत अधिक देर तक बैठे रहने से शिशु के शरीर में स्तिमितता, कटि में दुर्बलता, पृष्ठभङ्ग (सीधा न बैठ सकना), श्रम, ज्वर, मल, मूत्र एवं वायु का अवरोध तथा आध्मान हो जाते हैं ॥१०॥

आसीनस्यातिबालस्य सततं भूमिसेवनात् । आसन्नान्येव दुःखानि निर्घातं गात्रभेदनम् ॥११॥ निर्घाताज्जर्जराङ्गत्वं वेदना ज्वर संभवः । ततो न वृद्धर्बालस्य कठोराङ्गत्वमेव च ॥१२॥

अत्यन्त छोटे बालक के निरन्तर बहुत देर तक भूमि पर बैठे रहने से उसे दुःख (रोग) बहुत शीघ्र हो जाते हैं । इससे उसे निर्घात (शरीर का बहुत अधिक हिलना) तथा अङ्गभेद (शरीर का भेदन) हो जाता है । निर्घात के कारण उसके सम्पूर्ण अङ्ग जर्जर हो जाते हैं और शरीर में वेदना तथा ज्वर हो जाता है । इस प्रकार बालक के शरीर की वृद्धि नहीं हो पाती है तथा उसके अङ्ग भी कठोर (दृढ़) नहीं हो पाते हैं ॥११-१२॥

मक्षिकाकृमिकीटानां वेलाझञ्झानिलस्य च । सर्पाखुनकुलादीनां गम्यो भवति नित्यशः ॥१३॥

तथा बहुत देर तक लगातार भूमि पर बैठने से बालक मक्खी, कृमि तथा कीड़े आदियों से उत्पन्न होने वाले रोगों, झञ्झावात (तेज वायु) तथा सांप, चूहे एवं नेवले आदि प्राणियों से आक्रान्त हो जाता है । अर्थात् लगातार बैठे रहने से बालक को उपर्युक्त प्राणियों का भय रहता है । मक्खी, मच्छर, कीड़े आदि उसे तंग कर सकते हैं । तेज हवा लग सकती है अथवा सांप, विच्छू आदि उसे काट सकते हैं ॥१३॥

तस्मान्नातिचिरं नैको न बालो न च रोगितः । उपवेश्यो भवेद्बालो नापुण्याहकृतादिकः ॥१४॥ इति ॥

इसलिये छोटे बालक रो रोगो अवस्था में तथा अशुभ दिन आदि के समय अकेले बहुत देर तक न बैठे रहने दे ॥१४॥

तस्मिन्नेव मासि विविधानां फलानां प्राशनं, भिषगनुतिष्ठेत् । तद्धिं दन्तजातस्यान प्राशनं दशमे वा मासि प्रशस्तेऽहनि प्राजापत्ये नक्षत्रेऽऽभ्यर्च्य देवतां ब्राह्मणांश्च समासेनान्नेन दक्षिणावता स्वस्ति वाच्य गोमयोपलिप्ते स्थण्डिले दर्भानास्तीर्य सुमनसोऽवकीर्य चतुर्षु स्थानेषु गन्धमाल्यालङ्कृतान् पूर्णकलशान्

४८६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | जातकर्मोत्तराध्यायः १२]

स्वस्तिकांश्च स्थाप्य क्रीडनकविहितानि पूर्ववदुपकरणानि सर्वाण्येवोपकल्प्य लावककपिञ्जल-तित्तिरचरणायुधानामन्यतमस्य मांसेनान्यैश्च विचित्रसुसंस्कृतकामिकैर्व्यञ्जनैः समुदितमन्नपानं मध्ये निधाय ततो भिषक् सुतमलङ्कृतमहतवस्त्रपरिहितमनुष्ठितरक्षाविधानं कुमारं प्राङ्मुखः प्रत्यङ्मुखमुपवेश्याग्निं प्रज्वाल्यान्नं सर्वव्यञ्जनोपेतं गृहीत्वाऽनेन मन्त्रेण जुहुयात्—।।१५।।

(इति ताडपत्रपुस्तके २३१ तमं पत्रम्)

फिर वैद्य को चाहिये कि उसी अर्थात् छठे मास में वह बालक को विविध प्रकार के फलों का सेवन कराये। उसके बाद दांत निकलने पर दसवें महीने में प्राजापत्य नक्षत्र के समय किसी शुभ दिन में देवताओं तथा ब्राह्मणों की अभ्यर्थना करके मांसयुक्त अन्न की दक्षिणा सहित स्वस्तिवाचन करके गोबर से लिपे हुए स्थण्डिल (वेदी) पर दर्भ डालकर तथा उस पर चमेली के फूल बिखेर कर चारों ओर गन्धद्रव्य एवं मालाओं से अलंकृत किये हुए जलपूर्ण घड़े तथा स्वस्तिक आदि के चिन्हों को स्थापित करके तथा खिलौनों की विधि के समय बनाये हुए सम्पूर्ण उपकरणों को पूर्ववत् तैयार करके लाव (बटेर), गौरय्या, तीतर, चरणायुध (कुक्कुट-मुर्गा) आदियों में से किसी एक का मांस तथा अन्य भी नाना प्रकार के सुसंस्कृत तथा मन को प्रसन्न करनेवाले व्यञ्जनों से सिद्ध किया हुआ अन्न-पान आदि मध्य में रख दे। तदनन्तर वैद्य को चाहिये कि वह पूर्व दिशा की ओर मुख करके आभूषणों से अलंकृत, नवीन वस्त्र पहने हुए तथा जिसका रक्षाविधान किया जा चुका हो ऐसे बालक को पश्चिम दिशा की ओर मुख करके बिठा दे। फिर अग्नि को प्रज्वलित करके उसमें सम्पूर्ण व्यञ्जनों से युक्त अन्न की निम्न मन्त्रों द्वारा आहुति देवे। (चरक शा. अ. ८ में भी शिशु की रक्षाविधान का वर्णन अच्छी प्रकार से किया गया है) ।।१५।।

यथा सुराणाममृतं नागेन्द्राणां यथा सुधा। तथाऽन्न प्राणिनां प्राणा अन्नं चाहुः प्रजापतिम् ।।१६।।
तदुद्भवस्त्रिवर्गश्च लोकाश्चैव यथा ह्यमी। जुहोमि तस्मात्त्वय्यन्नमग्नेऽमृतसुखोपगम् ।।१७।।
प्रजापतिरनुमन्यतां स्वाहा।

अर्थात् जिसस प्रकार देवताओं के लिये अमृत होता है तथा श्रेष्ठ हाथियों के लिये सुधा (मद) होती है उसी प्रकार प्राणियों के लिये अन्न प्राण होता है। अन्न को ही प्रजापति कहते हैं। जिस प्रकार इन त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) तथा लोक की उत्पत्ति होती है। उसी प्रकार अन्न की भी उत्पत्ति होती है। इसलिये हे अग्ने ! अमृत के समान सुख कोक देनेवाले इस अन्न की मैं तेरे अन्दर आहुति देता हूँ। प्रजापति इसस बात का अनुमोदन करते हैं। इसी प्रकार का मन्त्र सुश्रुत सू. अ. ४३ में वमनविधान में मिलता है। यहां पर भी ये मूल श्लोक ही पढ़ने चाहिये। अर्थ अभिप्रेत नहीं है ।।१६-१७।।

हुतशेषस्याङ्गुष्ठमात्रं सुमृदितं कृत्वाऽऽलभ्य बालं ततोऽस्य मुखे दद्यात्त्रीणि पञ्च वा वारान्, प्राश्योपस्पृशेच्चैनम्; उत्थाप्योर्ध्वं द्वादशमासिकस्यान्नमभिलषतोऽल्पशश्रूमानि दद्यादिति ।।१८।।

अग्नि में आहुति देने से बचे हुए (यज्ञशेष) अन्न में से थोड़ा सा अन्न लेकर उसे अच्छी प्रकार नरम करके बालक के मुख में तीन या पांच बार देवे। तथा अन्न खिलाने के बाद उसे जल का आचमन कराये। तदनन्तर १२ मास का होने के बाद अन्न की इच्छा करने पर उसे निम्न खाद्य पदार्थ थोड़े २ खाने को देवे। अर्थात् दसवें मास में अन्नप्राशन संस्कार किया जाता है तथा उसके बाद एक वर्ष का होने पर उसे धीरे २ अन्य (आगे वर्णित) शालि, षष्टिक आदि लघु खाद्य पदार्थ देने चाहिये। दस मास से पूर्व दूध तथा फल का सेवन ही कराया जाता है। सुश्रुत में छठे मास में ही अन्न देने का विधान दिया है ।।१८।।

कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३] खिलस्थानम् ४८७

तत्र श्लोकाः— शालीनां षष्टिकानां वा पुराणानां विशेषतः। तण्डुलैर्निस्तुषैर्भृष्टैः क्षालितैः साधिता द्रवाः ।।१९।। सस्नेहलवणा लेह्या बालानां पुष्टिवर्धनाः। गोधूमानां तथा चूर्णं यवानां वाऽपि सात्म्यतः ।।२०।।

पुराने छिलके रहित तथा भुने हुए शालि एवं षष्टिक चावलों को धोकर सिद्ध किये हुए (बनाये हुए) द्रव में स्नेह एवं लवण मिलाकर अवलेह बनाये। ये बालकों के लिये पुष्टिवर्धक होते हैं। तथा सात्म्य के अनुसार गेहूँ तथा जौ का चूर्ण भी सेवन कराना चाहिये ।।१९-२०।।

विडङ्गलवणस्नेहैः पक्वोष्णं लेहनं हितम्। भृशं भिन्नपुरीषस्य कोद्रवानां (णां) निधापयेत् ।।२१।।

विडङ्ग लवण तथा घृत आदि स्नेह मिलाकर पकाकर बनाया हुआ उष्ण अवलेह बालकों के लिये हितकर होता है। यदि बालक को मल भेद (अतिसार) होने लग जाय तो इसी में कोरदूषक (कोदो) मिलाकर देना चाहिये ।।२१।।

मृद्धीकामधुसर्पींषि दद्यात् पित्तात्मनः सदा। मातुलुङ्गरसोपेतं वाते सलवणाशनम् ।।२२।।

यदि उनमें पित्त की अधिकता हो तो मुनक्का, मधु तथा घृत मिलाकर देना चाहिये तथा यदि वायु की अधिकता हो तो बिजौरे के रस के साथ लवणयुक्त भोजन दिया जाता है ।।

एकान्तरं द्व्यन्तरं वा देशाग्निवलकालवित्। यदा वा क्षुधितं पश्येत्तदैनं सात्म्यमाशयेत् ।।२३।।

देश (स्थान), अग्नि (जाठराग्नि), बालक के शारीरिक बल तथा काल (समय) को जाननेवाले व्यक्ति को चाहिये कि एक समय या दो समय छोड़कर अथवा जब भी बालक को भूख समझे तब उसे सात्म्य भोजन कराये ।।२३।।

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः।
(इति) खिलेषु जातकर्मोत्तरं नाम (द्वादशोऽध्यायः)


ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति) खिलेषु जातकर्मोत्तरं नाम (द्वादशोऽध्यायः) ।।१२।।


अथ कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायस्त्रयोदशः।

अथातः कुक्कुणकचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम कुक्कुणक चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। कुक्कुणक का अभिप्राय शिशुओं के नेत्रवर्त्मगत रोग से है। इसके विषय में योगरत्नाकर में कहा है कि यह बच्चों में होने बाला एक नेत्र रोग है। इसमें नेत्र कमजोर हो जाते हैं (Weakness of the eyes in Infants) तथा बालक सूर्य के प्रकाश या अन्य चमकीले पदार्थों को देखने में असमर्थ होता है ।।१-२।।

यदा माता कुमारस्य मधुराणि निषेवते। मत्स्यं मांसं पयः शाकं नवनीतं तथा दधि ।।३।।

४८८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३]

सुरासवं पिष्टमयं तिलपिष्टाम्लकाञ्जिकम् । अभिष्यन्दीनि सर्वाणि काले काले निषेवते ॥४॥
भुक्त्वा भुक्त्वा दिवा शेते विसंज्ञा च विबुध्यते ।
तस्य दोषाः प्रकुपिता दूरं गत्वा च तिष्ठते ॥५॥
दोषेणावृतमार्गायास्ततः स्तन्यं च दुष्यते ।

जब शिशु की माता सदा मधुर द्रव्य, मछली, मांस, दूध, शाक, मक्खन, दधि, सुरा, आसव, उड़द की पिठ्ठी के बने हुए पदार्थ, तिल के बने हुए पदार्थ (तिलकुट आदि), खट्टी कांजी तथा सम्पूर्ण अभिष्यन्दि द्रव्यों का सेवन करती है, दिन में भोजन करते ही सो जाती है तथा संज्ञाशून्य हो जाती है—तब उस स्त्री के दोष प्रकुपित होकर शरीर में दूर जाकर स्थित हो जाते हैं तथा दोषों के द्वारा मार्गों के रुक जाने से उस स्त्री का दूध दूषित हो जाता है ॥३-५॥

प्रदुष्टदोषसंज्ञं तु यदा पिबति दारकः ॥६॥
लवणाम्लनिषेवित्वान्मातापुत्रौ रसादिह । आहारदोषात्तस्यास्तु बालस्यानन्नभोजिनः ॥७॥
अनुप्रवेशादाक्षेपादुष्णात्सत्त्वावनादपि । जायते नयनव्याधिः श्लेष्मलोहितसंभवः ॥८॥

दोषों के कारण दूषित हुए उस दूध को जब शिशु पीता है तब माता के लवण एवं अम्ल रस के सेवन करने से तथा उत्पन्न हुआ आहार दोष से–अन्न का सेवन न करनेवाले अर्थात् केवल दूध का पान करने वाले बालक में प्रवेश करके आक्षेप तथा उष्णता के कारण कफ तथा रक्त से उत्पन्न होनेवाला नेत्र रोग हो जाता है ॥६-८॥

अभीक्ष्णमस्रं स्रवते न च क्षीवति दुर्मनाः ।
नासिकां परिमृद्नाति कर्णं वाञ्छ(ह्य)ति दुःखितः ॥९॥
ललाटमक्षिकूटं च नासां च परिमर्दति । नेत्रे कण्डूयतेऽभीक्ष्णं पाणिना चाप्यतीव तु ॥१०॥
स प्रकाशं न सहते अश्रु चास्य प्रवर्तते । वर्त्मनि श्वयथुश्चास्य जानीयात्तं कुक्कुणकम् ॥११॥

कुक्कुणक के लक्षण—उसकी आंखों से निरन्तर पानी बहता रहता है, उसे छींक नहीं आती, उसका मन बड़ा अप्रसन्न रहता है, अत्यन्त दुखी हुआ अर्थात् कष्टपूर्वक वह नासिका तथा कानों को कुरेदता रहता है, ललाट (माथा), आंखों तथा नाक को मसलता है, आंखों में बहुत अधिक खाज चलती है जिससे वह उन्हें हाथों से रगड़ता है, वह प्रकाश (रोशनी–चमक–Light) को सहन नहीं कर सकता है, आंखों से अश्रु (पानी–Lacrimation) बहते रहते हैं तथा नेत्रवर्त्म (नेत्र पक्ष्म) में शोथ हो जाती है। ये कुक्कुणक के लक्षण हैं ॥९-११॥

तस्य चिकित्सितं श्रेष्ठं व्याख्यास्यामि यथा तथा ।
धात्रीं तु तस्य वामयेद्युक्तं चैव विपाचयेत् ॥१२॥
तस्या वान्तविरिक्ताया निर्दुह्य च स्तनावुभौ । भोजनानि च सर्वाणि यथायुक्तं प्रदापयेत् ॥१३॥
पथ्यं भुञ्जीत खादेत विपरीतं च वर्जयेत् । प्रयता शुद्धवस्त्रा स्यादक्लिष्टाऽमलिना तथा ॥१४॥

उसकी श्रेष्ठ चिकित्सा का मैं यथाविधि वर्णन करूंगा—उस बालक की धात्री को वमन कराये तथा युक्तिपूर्वक उसके दोषों का पाचन करे। वमन तथा विरेचन के बाद उसके दोनों स्तनों का दोहन करे अर्थात् स्तनों से (Breast pump) इत्यादि द्वारा दूध निकाल दे तथा उसके बाद उसे युक्तिपूर्वक सम्पूर्ण पथ्य भोजन खाने के लिये देवे और अपथ्य भोजन का त्याग कर दे। निर्मल वस्त्र धारण करे, क्लेशयुक्त न रहे तथा वह साफ सुथरी रहे ॥१२-१४॥

ततो वर्त्मनि बालस्य निर्भुज्याथ प्रमृज्य च । निर्मुच्य रुधिरं दुष्टं कुर्याच्छिरोऽवसेचनम् ॥१५॥

कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३] खिलस्थानम् ४८९

तदनन्तर उस बालक की आंखों को अच्छी तरह खोलकर साफ करे तथा उनमें से दूषित रक्त निकाल कर पानी के छींटे देवे ॥१५॥

एरण्डं रोहिषं चैव त्वक्क्षीरीं वरुणं तथा । निष्क्वाथ्यमेतत् कृत्वा च कुमारं परिषेचयेत् ॥१६॥

एरण्ड, रोहिष (गन्धतृण), त्वक्क्षीरी (तवाशीर–वंशलोचन) तथा वरुण–इनका क्वाथ बनाकर बालक का परिषेचन करे ॥१६॥

फणिज्झकस्य पत्राणि सुरसस्य च पीडयेत् । जातिप्रसन्नामण्डेन यष्टीमधुकमेव च ॥१७॥
एतदाश्चोतनं तस्य शारदेन जलेन तु । त्र्यहमेतत् प्रयुञ्जीत द्व्यहं वाऽपि विधानवित् ॥१८॥

चिकित्सा कार्य को जानने वाले वैद्य. को चाहिये कि वह फणिज्झक (तुलसीभेद) तथा तुलसी के पत्तों का पीडन करके रस निकाल ले । उसमें जाति (चमेली के पत्तों का रस, प्रसन्ना (मद्य विशेष), मण्ड तथा मधुयष्टि मिलाकर उससे अथवा शीतल जल से तीन या दो दिन तक उसकी आंख का आश्च्योतन (नेत्र सेचन) करे ।

वक्तव्य—भिन्न २ ओषधियों के क्वाथ, मधु, स्नेह आदि के द्वारा नेत्रों के तर्पण करने को आश्च्योतन कहते हैं ॥१७-१८॥

ने(भे)कराजस्य पत्राणि बिल्वस्याच्छवनां तथा । सुराग्रमण्डसंपिष्टं श्रेष्ठमाश्चोतनं मतम् ॥१९॥

भृङ्गराज के पत्ते तथा बिल्व की अच्छ (गोंद) और पत्र स्वरस (अथवा अच्छवन को एक सम्मिलित शब्द मानने से बिल्व के पत्तों का निर्मल स्वरस—यह अर्थ होगा) को सुरामण्ड में पीसने से उत्तम आश्च्योतन बनता है ॥१९॥

कोलायुत्क्वाथ्य कल्कं वा यष्टीमधुकसंयुतम् । नेत्रामये मुखालेपः कश्यपस्तत्प्रशंसति ॥२०॥

कोल (बेर) के क्वाथ अथवा उसके कल्क को मुलहठी के साथ मिलाकर नेत्ररोगों में मुख पर लेप किया जाता है । इस लेप की महर्षि कश्यप प्रशंसा करते हैं ॥२०॥

ने(भे)कराजीं च नीलीं च सुरसं गौरसर्षपाः ।
हरिद्रां चैव तत् सर्वं कल्कं कुर्वीत भागशः ॥२१॥
एतदालेपनं कुर्याद्रोगघ्नं नयनामये । वेदनामक्षिरोगं च क्षिप्रमवापकर्षति ॥२२॥

भृङ्गराज, नील, तुलसी, श्वेत सरसों तथा हल्दी को यथायोग्य परिमाण में लेकर इनका कल्क बनाये । नेत्ररोगों में उपर्युक्त रोगनाशक लेप का प्रयोग करना चाहिये । यह नेत्रों में वेदना (पीड़ा) तथा अन्य नेत्ररोगों को नष्ट करता है ॥

हरिद्रात्वचमाहृत्य पिप्पलीं चाथ भागशः । वरप्रसन्नया मण्डं कुर्यादञ्जनवर्तिकाम् ॥२३॥
पिल्लिका चोपलेपश्च नेत्रयोस्तेन शाम्यति । अथास्याश्च्योतनं कुर्यात् सौवीर¹कमनुत्तमम् ।

हल्दी के छिलके तथा पिप्पली को योग्य परिमाण में लेकर उत्तम प्रसन्ना (मद्यविशेष) के मण्ड (उपरितन स्वच्छभाग) के साथ मिलाकर अञ्जनवर्ती बनाये । इस अञ्जन के प्रयोग से नेत्रगत पिल्लिका (क्लिन्न नेत्ररोग) तथा उपलेप (नेत्रों का लिप्त सा रहना) रोग शान्त होते हैं । तदनन्तर श्रेष्ठ सौवीरक (कांजी) से उसकी आंख का आश्च्योतन करे ।

वक्तव्य—अष्टाङ्गहृदय उ. अ. १६ में उत्क्लिष्ट आदि १८ नेत्ररोगों को पिल्ल नाम से कहा है ॥२३॥


१. सौवीरकमत्र संधानविशेषः ।

४९० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३]

प्रपौण्डरीकं लोध्रं च हरिद्रां शर्करां मधु ।।२४।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २३२ तमं पत्रम् ।)

परिषेको भवेच्छ्रेष्ठो जलेनोष्णेन योजयेत् । अक्षिरोगेषु सर्वेषु योग एष प्रशस्यते ।। २५ ।।
आचार्यानुमतं श्रेष्ठं रात्रौ चैनं प्रयोजयेत् ।

पुण्डरीक, लोध्र, हल्दी, शर्करा तथा मधु—इनमें उष्णजल मिलाकर उसके द्वारा आंखों का परिषेक करना चाहिये । सम्पूर्ण अक्षिरोगों में आचार्य ने इसे श्रेष्ठ योग माना है तथा इसका रात्रि में प्रयोग करना चाहिये ।

वक्तव्य—आश्च्योतन का प्रयोग रात्रि में ही करना चाहिये । क्योंकि आश्च्योतन के द्वारा नेत्रों का विरेचन हो जाने के बाद नेत्र दुर्बल हो जाते हैं । यदि यह दिन के समय प्रयुक्त किया जायगा तो दुर्बल हुई दृष्टि सूर्य के प्रकाश में कष्ट को अनुभव करती है अतः दिन में आश्च्योतन आदि तीव्र प्रयोगों का व्यवहार नहीं करना चाहिये । ऐसा चरक सू. अ. ५ में भी कहा है ।।२४-२५।।

आटरूषकपत्राणि मधूकं सैन्धवं तथा ।।२६।।
पुण्डरीकस्य पत्राणि तथा नीलोत्पलानि च । सुखोदकेन संयुक्तः परिषेको हितो भवेत् ।।२७।।
कफात्मके त्वभिष्यन्दे सिद्धमेतं नराधिपः ।

हे राजन् ! बांसे के पत्ते, मुलहठी, सैन्धव, पुण्डरीक (कमल) तथा नील कमल के पत्ते—इन सबको ईषदुष्ण जल में मिलाकर सिद्ध करें । यह परिषेक कफाभिष्यन्द में हितकर माना गया है ।।२६-२७।।

अमृतायास्तु निष्क्वाथे कुष्ठं च गुडमेव च ।।२८।।
विनीय पिष्टं तोयेन परिषेकोऽक्षिरोगिणाम् ।

गिलोय के क्वाथ में कुष्ठ तथा गुड को पीसकर उस जल के द्वारा नेत्ररोगों में परिषेक करना चाहिये ।।२८।।

परिषेकास्तु बलानां दन्तजन्मनि ये मया ।। २९ ।।
कीर्तितास्ते प्रयोक्तव्याः परिभूताक्षिरोगिषु ।

बालकों के दांतों की उत्पत्ति के समय मैंने पहले जिन परिषेकों का वर्णन किया है उनका इन सम्पूर्ण अक्षिरोगों में प्रयोग करना चाहिये ।।२९।।

गव्येन मधुना पिष्ट्वा शङ्खेन सह सैन्धवम् ।। ३० ।।
सप्तरात्रं प्रलेप्यं तु तेन स्त्रौतसमञ्जनम् । तं पिष्ट्वा गुडिकां कृत्वा छायायां परिशोषयेत् ।। ३१ ।।
पुष्ये सर्वासु सिद्धास्ता गुडिकाः पत्रसन्निभाः ।
पृश्निपर्ण्यास्तु भागौ द्वावंशुमत्यास्तथा भवेत् ।। ३२ ।।
त्रयश्चैवोरुपूगस्य बृहत्या भागमेव तु । रजसश्चायसश्चाथ तथा ताम्रायसस्य च ।। ३३ ।।
अजाक्षीरेण पिष्ट्वा तु शोषयेद् गुटिकां कृताम् ।
अजानां लिण्डिकाभिस्ताः शमीपत्रैश्च धूपयेत् ।। ३४ ।।


१. प्रसन्ना सुराग्रं च सुराया उपरितनो मण्डभागः ।

कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३] खिलस्थानम् ४९१

तथैवार्द्राश्च शुष्काश्च बालानामक्षिरोगके । रसाञ्जनं च यन्मुख्यं हरिद्रात्वचमेव च ।। ३५ ।। प्रसन्नयाऽञ्जनं त्वेतत् कुर्यादञ्जनवतिकाम् ।

गोधृत (अथवा गोमूत्र या गो दुग्ध), मधु और शंख के साथ सैन्धव नमक को पीसकर सात दिन तक उसका स्रोतोञ्जन पर लेप करना चाहिये । तदनन्तर उस स्रोतोञ्जन को पीसकर जल के साथ गोलियां बनाकर छाया में सुखा दे । पुष्य नक्षत्र में वे सब सिद्ध की हुई गोलियां, पृश्निपर्णी तथा अंशुमती (शालिपर्णी) दो भाग, श्वेत एरण्ड तथा बृहती ३ भाग इसी प्रकार लोहचूर्ण तथा ताम्रचूर्ण भी ३-३ भाग । इन सबको बकरी के दूध में पीसकर गोलियां बनाकर उन्हें सुखा ले । उन गोलियों का बकरी की मेंगनी तथा शमी के पत्तों से धूपन करे । इस प्रकार उन आर्द्र (गीली) तथा शुष्क गोलियों को रसौंत तथा हल्दी की त्वचा के साथ सुरामण्ड से पीसकर अञ्जनवर्तिका बनाये ।।३०-३५।।

पिप्पलीं शृङ्गबेरं च समभागानि पेषयेत् ।। ३६ ।। सुराग्रेण ततः कुर्यात् पिल्लिकाञ्जनवतिकाम् ।

इसी प्रकार पिप्पली तथा आर्द्रक को समभाग में लेकर सुराग्र (सुरामण्ड) के साथ पीसकर पिल्लिका रोग के लिये अञ्जनवर्ती बनाये ।। ३६ ।।

अथवाऽतिभवेन्नेत्रशूलं बालस्य लक्षयेत् ।। ३७ ।। स्तब्धनेत्रश्च दृश्येत तत्रेमं विधिमाचरेत् । पिप्पलीं शृङ्गबेरं च पर्णानि सुरसस्य च ।। ३८ ।। कालमालकपर्णानि तथैव च कुठेरकम् । तं प्रपिष्य सुराग्रेण कुर्यादञ्जनवतिकाम् ।। ३९ ।। पिल्लिकामुपदेहं च न चिरादेव नाशयेत् ।

अथवा यदि बालक के नेत्रशूल बहुत अधिक हो या नेत्र स्तब्ध दिखाई दें तो निम्न विधि का प्रयोग करना चाहिये— पिप्पली, आर्द्रक, तुलसी, काली तुलसी तथा कुठेरक (कुलसी भेद)—इन सबको सुरामण्ड से पीसकर अञ्जनवर्ती बनाये । यह पिल्लिका तथा उपदेह रोग (उपलेह) को शीघ्र ही नष्ट कर देता है ।।३७-३९।।

कपित्थस्याथ बिल्वस्य खदिरस्य च पेषयेत् ।। ४० ।। अजाक्षीरस्य पात्रं च ततः श्च्योतनमुत्तमम् ।

कपित्थ (कैथ), बिल्व तथा खदिर को बकरी के दूध में पीस ले । यह उत्तम आश्च्योतन है ।।४०।।

कपित्थस्याऽटजीनां च पत्राणि सुरसस्य च ।। ४१ ।। अजाक्षीरेण पिष्टानि कुर्यादाश्च्योतनं भिषक् ।

कपित्थ, अटजी तथा तुलसी के पत्तों को बकरी के दूध में पीसकर उससे आश्च्योतन करे ।।४१।।

मधुकं १पर्वतीयां च हरिद्रां पेषयेत् समाम् ।। ४२ ।। अजाक्षीरेण तत् कुर्यादाश्च्योतनमनुत्तमम् ।

मुलहठी तथा दारुहल्दी को समान मात्रा में लेकर बकरी के दूध में पीस ले । यह उत्तम आश्च्योतन है ।।४२।।

सपिर्मण्डं सुराग्रं च ऐन्द्रीं चन्दनमेव च ।। ४३ ।। सलिलेन प्रपिष्टानि कुर्यादञ्जनवतिकाम् ।


१. पर्वतीयां हरिद्रां दारुहरिद्रामित्यर्थः ।

४९२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३]

घृतमण्ड, सुराग्र (सुरा का ऊपर का स्वच्छभाग), ऐन्द्री (इन्द्रवारुणी अथवा गोरक्षकर्कटी) तथा चन्दन की पानी से पीसकर अञ्जनवर्ती बनाये ॥४३॥

पद्मकं चोत्पलं चैव मधुकं च प्रपेषयेत् ।।४४।।
अक्षिरोगे मुखालेपमजाक्षीरेण शर्कराम् ।

पद्माख (पद्मकाष्ठ), कमल, मुलहठी तथा शर्करा को बकरी के दूध में पीसकर अक्षिरोग के लिये मुखालेप तैयार करे ॥

शृङ्गबेरोऽथ मञ्जिष्ठा कार्पासकुलकानि च ।।४५।।
सलिलेन प्रपिष्टानि मुखालेपनमुत्तमम् ।

आर्द्रक, मञ्जीठ, कपास तथा कुलक (पटोल) को पानी से पीसकर उत्तम मुखालेपन बनाया जाता है ॥४५॥

त्रिफलामञ्जनं चैव तथैव च रसाञ्जनम् ।।४६।।
मधुना समभागानि कुर्यादाशु रसक्रियाम् ।

त्रिफला, अञ्जन (सुरमा-Lead) तथा रसाञ्जन समभाग लेकर मधु से पीसकर रसक्रिया बनाई जाती है ॥४६॥

पिप्पलीं शृङ्गबेरं च मरिचानि तथाऽञ्जनम् ।।४७।।
त्रिफलां शङ्खनाभिं च सैन्धवं ताम्रजं रजः ।
एते भागाः समाः पिष्टाश्छायायां गुडिकाः कृताः ।।४८।।
शोषयित्वा विकारेषु नैकजेषु प्रदापयेत् । तिमिरे तोयसंसृष्टा कोथके मार्कवेन तु ।।४९।।

पिप्पली, आर्द्रक, मरिच, अञ्जन, त्रिफला, शङ्खनाभि, सैन्धव, ताम्रचूर्ण-समभाग लेकर, पीसकर और गोलियां बना कर छाया में सुखा ले । ये गोलियां अनेक रोगों में प्रयुक्त की जाती हैं । उदाहरण के लिये तिमिररोग में पानी तथा कोथरोग (नेत्ररोग भेद) में मकोय के रस के साथ इनका प्रयोग किया जाता है ।

**वक्तव्य—**लिङ्गनाश नामक नेत्ररोग को तिमिर कहते हैं यह नेत्र के चतुर्थ पटल में होता है । इसमें दिखाई देना बन्द हो जाता है । तथा अन्त में Perception of light भी समाप्त हो जाती है ॥४७-४९॥

रसेन पिष्ट्वा सिद्धस्य द्राक्षाक्षुद्रोदकेन तु । गुडिका कोकिला नाम चक्षुर्व्याधिषु संमता ।।५०।।
हितभोजिषु योक्तव्या बालेषु भिषगुत्तमैः ।

**कोकिला गुटिका—**अथवा सिद्ध (काला धतूरा या काली निर्गुण्डी) के रस या मुनक्का और क्षुद्रा (कैंटर्य अथवा रक्त पुनर्नवा) के रस से कोकिला नाम की गोलयां बनाई जाती हैं । ये नेत्र रोगों में उत्तम मानी गई हैं । श्रेष्ठ चिकित्सक को चाहिये कि पथ्य भोजन करने वाले बालकों में इसका प्रयोग कराये ॥५०॥

निर्यासो नक्तमालस्य घृतमण्डेन साधितः ।।५१।।
स्तन्यक्षीरेण तिमिरे कण्डौ चैव हितो भवेत् ।

करञ्ज के निर्यास (गोंद) को घृतमण्ड से सिद्ध करके उसे स्त्री के दूध के साथ देने से तिमिर तथा नेत्रकण्डू रोम में हितकारी होता है ॥५१॥

सुवर्णगैरिकं लाक्षा सैन्धवं मरिचानि च ।।५२।।

कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३] खिलस्थानम् ४९३

सशर्करं त्रिकटुकं गुटिकां ह्युपकल्पयेत्। एषा लोहितिका नाम गुडिका तु स्मृता बुधैः ॥५३॥
प्रयोक्तव्याऽक्षिसंरम्भे क्षिप्रं निर्वाणमिच्छता।

लोहितिका गुटिका—स्वर्णगैरिक, लाख, सैन्धव नमक, मरिच, शर्करा, त्रिकटु—इन सबको मिलाकर गुटिकाएं बनाये। विद्वानों द्वारा ये लोहितिका नामक गुटिका कहलाती हैं। शीघ्र आरोग्य चाहने वालों को अक्षिरोगों में इनका प्रयोग करना चाहिये ॥५२-५३॥

पिप्पल्यास्त्रिफला चैव वचा कटुकरोहिणी ॥५४॥
षडेताः समभागाः स्युः सप्तमं ताम्रजं रजः। जलपिष्टा भवेदेताः सूर्यतप्ताः पुनः पुनः ॥५५॥
गुडिकाः कारयेत्ता हि छायायां परिशोषयेत् ॥५६॥
रूक्षां घृतेन पिष्टां दुग्धेनाजेन कोथके दद्यात्।
पाषावरसेन तिमिरे राजिषु मधुकेन देया तु ॥५७॥
कोथके मर्मजे सर्वा सर्वाभिष्यन्द एव च। सैन्धवेन समायुक्ता हन्यात् कण्डूं जलान्विता ॥५८॥

पिप्पली, त्रिफला, (हरड़, बहेड़ा, आंवला), बच तथा कुटकी-ये छओं समभाग तथा सातवां ताम्रचूर्ण-इन सबको जल में पीसकर तथा बार २ धूप में रखकर गोलियां बनाकर छाया में सुखा ले। फिर उन रूक्ष गोलियों को घी में पीसकर कोथरोग (नेत्ररोग विशेष) में बकरी के दूध से देवे। तिमिर रोग में इसे घास के रस से तथा राजिरोग में मुलहठी के साथ देना चाहिये। कोथरोग, मर्म तथा सम्पूर्ण नेत्राभिष्यन्द रोगों में सैन्धव के साथ एवं नेत्रकण्डू में जल के साथ देना चाहिये ॥५३-५८॥

द्वीपिशत्रोश्च पत्राणि निष्क्वाथमुपहारयेत्। एतेन चाक्षिरोगं तु कोष्णेन परिषेचयेत् ॥५९॥
द्वीपी (चित्रक) तथा शत्रु (अम्लवेतस) के पत्तों का क्वाथ बनाये। इस उष्ण क्वाथ से नेत्र रोगों में परिषेचन करे ॥

सरलं मधुकं चैव देवदारुं च पेषयेत्। कल्केनैतेन वदनं वेदनासु प्रलेपयेत् ॥६०॥
सरल (चीड़), मुलहठी तथा देवदारु को पीसकर कल्क बनाये। वेदना (पीडा) में इस कल्क का मुख पर लेप करे ॥

रसाञ्जनं तार्क्ष्यशिलां क्षौद्रेण सह संयुताम्। आश्च्योतनं प्रयुञ्जीत नेत्रव्याधिविनाशनम् ॥६१॥
नेत्ररोगों को नष्ट करने के लिये तार्क्ष्य पर्वत पर उत्पन्न होने वाली रसाञ्जन (रसौंत) को मधु में मिलाकर उसका आश्च्योतन करना चाहिये ॥६१॥

शर्करां शृङ्गबेरं च स्तन्यं गोपित्तमेव च। रसाञ्जनं समधुकं कुर्यादाश्च्योतनं भिषक् ॥६२॥
शर्करा, आर्द्रक, दूध, गोपित्त (गोरोचन) तथा रसाञ्जन आदि का मधु में मिलाकर आश्च्योतन करना चाहिये ॥६२॥

हरिद्रां शङ्खनाभिं च सलिलेन प्रपेषयेत्।
(इति ताडपत्रपुस्तके २३३ तमं पत्रम्)
क्षीरस्य मात्रया चैव कुर्यादाश्च्योतनं हितम् ॥६३॥
हल्दी तथा शंखनाभि को पानी से पीसकर उसमें थोड़ा दूध मिलादे। इसका आश्च्योतन करना चाहिये ॥६३॥

हरिद्रां पर्वतीयां तु सूर्यतेजसि पाचयेत्। ताम्रपट्टेषु पिष्टां च सारसेनावसेचयेत् ॥६४॥
शीतं च परिपूतं च स्तन्येन सह संयुतम्। आश्च्योतनं प्रयुञ्जीत नेत्रव्याधिविनाशनम् ॥६५॥

४९४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३]

दारुहरिद्रा को सूर्य के ताप में खूब पकाकर ताम्बे की शिलाओं पर उसे पीसले। फिर उसमें तालाब का जल मिलाले। ठण्डा होने पर उसे छानकर उसमें दूध मिलाकर आश्च्योतन का प्रयोग करे। यह नेत्ररोगों को नष्ट करता है॥

सर्पिषश्च भवेद्भागः क्षौद्रेण द्विगुणं भवेत्। तत्काले प्रलिपेद्धालो नेत्रव्याधौ प्रमुच्यते ॥६६॥

नेत्ररोग में एक भाग घी तथा दो भाग मधु मिलाकर लेप करने से बालक तत्काल रोग से मुक्त हो जाता है ॥६६॥

हरिद्रां शङ्खनाभिं च भद्रमुस्तं च काठकम्। पिष्ट्वा व्याघ्रनखं चैव मधुकं चैव भागशः ॥६७॥
शिरीषबीजं प्रथमं ताभ्यां कुर्वीत पूपिकाम्। ताम्रपात्रे सतैलास्ताः सूर्यतेजसि पाचिताः ॥६८॥
द्वादशेऽह्नि निवाते च नीरजस्काः प्रयत्नतः। शिलामये ततो भाण्डे तैलं तां चैव पूपिकाम् ॥६९॥
आतुराण्युथ नेत्राणि तैलेनानेन पूरयेत्। व्याधिमाशु नृणां हन्ति प्रयोगश्चैत् प्रशस्यते ॥७०॥

हरिद्रा, शंखनाभि, नागरमोथा, व्याघ्रनखी, मुलहठी तथा सिरस के बीज—यथायोग्य परिमाण में लेकर पीसकर इनके अपूप (पूड़े) बनाये। ताम्र के बर्तन में तैल डालकर सूर्य के ताप में उन्हें पकाये। १२ वें दिन वायु एवं धूलि रहित स्थान में उन अपूप तथा तैल को एक पत्थर के बर्तन में रखे। ये अपूप रोगी को खिलाये तथा उस तैल के द्वारा रोगी के नेत्रों का पूरण (आश्च्योतन) करे। यदि यह योग प्रशस्त हो तो मनुष्यों के रोग को शीघ्र ही नष्ट कर देता है॥

हरीतकीमामलकीं हरिद्रां गिरिजामपि। मधुकं च समं सर्वं सलिलेन प्रपेषयेत् ॥७१॥
एतदाश्च्योतनं मुख्यं व्याधीनां शमनं हितम्।
स्थविराणां शिशूनां च एतदाश्च्योतनं हितम् ॥७२॥

हरड़, आंवला, दारुहरिद्रा तथा मुलहठी सब समभाग लेकर पानी से पीसले। यह मुख्य आश्च्योतन है। यह नेत्र रोगों को शान्त करता है। यह आश्च्योतन वृद्ध पुरुषों तथा शिशुओं के लिये हितकर होता है ॥७१-७२॥

हरिद्राशकलीकानामार्द्राणां कर्षमावपेत्। ताम्रपात्रे मितं दद्यात् सारमस्याढकं मितम् ॥७३॥
दशभागावशेषं तु मृद्वग्निमुपसाधितम्। शीतं च परिपूतं च मुख्यमाश्योतनं हितम् ॥७४॥

एक ताम्र पात्र में ताजी हल्दी तथा शकली (मृद्गिल नामक मछली) का एक १ कर्ष लेकर उसमें एक आढक उपर्युक्त वस्तुओं का रस डालदे। उसे मृदु अग्नि पर पकाकर दसवां हिस्सा शेष रखे। उसे ठण्डा करके छानने से मुख्य आश्च्योतन बन जाता है ॥७३-७४॥

शकलीकमथाक्षीणां धारयेन्नयनामये। ग्रीवायामुत्तमाङ्गे वा तथा रोगात् प्रमुच्यते ॥७५॥

नेत्ररोगों में नेत्र, ग्रीवा तथा उत्तमाङ्ग में मृद्गिल मछली को धारण करे। इससे नेत्ररोगों से मुक्ति हो जाती है ॥७५॥

आलङ्कतकमूलानि वास्तुकस्य यवस्य च।
आघृष्य नव (?) एषां तु मूर्ध्नि कुर्वीत कण्टकान् ॥७६॥
अक्षिरोगं शिरोरोगं सर्वमेतेन शाम्यति।

आल (हरिताल), कतक (निर्मली बीज), बथुआ और जौ के नवीन मूल लेकर तथा घिसकर उनके द्वारा सिर पर कण्टकाकार चिह्न बना दे। इस प्रयोग से सम्पूर्ण नेत्ररोग तथा शिरोरोग शान्त हो जाते हैं ॥७६॥

बलामतिबलां चैव त्रिवृतां चैव गर्भिणी ॥७७॥
सव्ये पाणिपुटे कृत्वा पीडयेत्तमपूर्वकः। तं रसं क्षौद्रसंसृष्टं कण्ठमस्याः प्रलेपयेत् ॥७८॥

कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३] खिलस्थानम् ४९५

कोई गर्भिणी स्त्री बला, अतिबला तथा त्रिवृत् को अपने बांये हाथ में लेकर दबाकर अच्छी तरह रस निकाले। इस रस में मधु मिलाकर उस गर्भिणी स्त्री के कण्ठ में लेप करदे॥

सपिप्पलीशृङ्गबेरां हरितालमनःशिलाम्। रसाञ्जन तार्क्ष्यशिलां सुमनाकोरकाणि च ।।७९।।
सप्तमोत्र गुडस्यांशो मधुना सह पेषितः । एषा कल्याणिका नाम सर्वरोगरसक्रिया ।।८०।।

पिप्पली, आर्द्रक, हरिताल, मनःशिला, तार्क्ष्यशैलोद्भव रसाञ्जन, चमेली की कलियां तथा सातवां गुड का अंश—इन सबको मधु के साथ पीसले। यह सब रोगों को नष्ट करने वाली कल्याणिका नामक रसक्रिया है ।।७९-८०।।

मरिचं शृङ्गबेरं च समभागानि कारयेत्। दधिनाऽम्लेन पिष्ट्वा तु ताम्रपट्टं प्रलेपयेत् ।।८१।।
सप्तरात्रं प्रलिप्त्यैव ततो दध्ना प्रपेषयेत्। वर्त्योऽथ तनुकाः कार्या दद्यात् कौतुकमञ्जनम् ।।८२।।

मरिच तथा आर्द्रक को समभाग में लेकर उन्हें दही तथा कांजी से पीसकर ताम्र के टुकड़ों पर लेप करदे। सात दिन तक उन पर इसी प्रकार लेप करके उन्हें दही के साथ पीसले। उनकी छोटी २ वर्तियां बनाये। इनसे नेत्रों में अञ्जन करना चाहिये। यह आश्चर्यजनक अञ्जन है ।।८१-८२।।

मृदुपूूर्वमदोषं तु मात्रायुक्तं च भेषजम्।
सादेश्यात्तत्कुलीनां (?) च कुर्याद्बाले भिषक क्रियाम् ।।८३।।

चिकित्सक को चाहिये कि वह बालक के लिये पहले मृदु, दोषरहित तथा योग्य मात्रा में औषध का प्रयोग करे ।।८३।।

कटुकीया हि केचित् स्यान्म(स्युर्म)धुरीयास्तथाऽपरे। मृदु तस्मै उपक्राम्यंस्तीक्ष्णमप्यल्पमाचरेत् ।।८४।।

कुछ लोग बालक के लिये कटु ओषधियों का तथा कुछ मधुर ओषधियों का प्रयोग करते हैं। बालकों की मृदु ओषधियों के द्वारा ही चिकित्सा करनी चाहिये। तीक्ष्ण ओषधियों का यथासंभव कम प्रयोग करे ।।८४।।

इति वार्योविदायेदं महीपाय महानृषिः। शशंस सर्वमखिलं बालानामथ भेषजम् ।।८५।।

इस प्रकार महर्षि कश्यप ने वार्योंविद नामक राजा को सम्पूर्ण बालकों की ओषधियों का उपदेश कर दिया ।।८५।।

लोध्रं सयष्टीमधुकं तु पिष्टं घृतेन भृष्टं तु निबध्य वस्त्रे।
क्वाथं गुडूच्याः परिमृज्य तप्ते निहन्ति सर्वाक्षिगतानिकारान् ।।८६।।

लोध्र तथा मधुयष्टि को पीसकर घी में भून लें। उसे वस्त्र में बांधकर गिलोय के गरम २ क्वाथ में लटकाकर शुद्ध करलें। इसके प्रयोग से सम्पूर्ण नेत्र रोग नष्ट होते हैं ।।८६।।

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। ष्फ (८४) ।

(इति) वृद्धकाश्यपीयायां संहितायां कुक्कुणकचिकित्साध्यायस्त्रयोदशः ।।१३।।


ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।८७।। ष्फ (८४) ।

(इति) वृद्धकाश्यपीयायां संहितायां कुक्कुणकचिकित्साध्यायस्त्रयोदशः ।।१३।।


५४ का.सं.

४९६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विसर्पचिकित्सिताध्यायः १४]

अथ विसर्पचिकित्सिताध्यायश्चतुर्दशः।

अथातो वैसर्पचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम विसर्प चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। विसर्प शब्द का अर्थ चारो ओर फैलना है अर्थात् जो रोग चारो ओर फैलता है उसेस विसर्प कहते हैं। यह व्याधि शरीर में विविध प्रकार से सर्पण (प्रसार या फैलाव) करती है इसलिये इसे विसर्प कहा है। अथवा चारो ओर से (सर्वतः) परिसर्पण (प्रसार) के कारण इसे परिसर्प नाम से भी कहा जाता है। अर्थात् इस रोग का प्रसार दो प्रकार से हो सकता है। या तो यह रोग दो ओर फैलता है अथवा कभी २ चारो ओर फैलने लगता है। यह एक सम्पूर्ण शरीर में फैलने वाला रोग है। जिसमें वातादि (वात, पित्त एवं कफ) दोषों के कारण त्वचा, रक्त, मांस एवं लसीका—ये चारो दूष्य दूषित हो जाते हैं। आयुर्वेद में इसे प्रधानरूप से निज या दोषज रोग माना गया है। एलोपैथी में इसे (Erysipelas) नाम दिया गया है। जो कि मुख्यरूप से आगन्तु रोग माना गया है। (Streptococcus Erysipelatis) नामक जीवाणु इस रोग को उत्पन्न करने का प्रधान कारण माना गया है। त्वचा में कोई क्षत होने पर यह जीवाणु शरीर में प्रवेश करता है। कभी २ क्षत के अतिसूक्ष्म होने से हमें क्षत का ज्ञान नहीं होता यद्यपि जीवाणु सूक्ष्म क्षत के द्वारा ही प्रविष्ट होते हैं। उस अवस्था में इस रोग को (Idio-pathic) या आयुर्वेद के अनुसार दोषज कहते हैं। जिसमें हमें क्षत का स्पष्टरूप से ज्ञान हो उसे क्षतज (Traumatic) कहते हैं। ये जीवाणु त्वचा में प्रविष्ट होकर शोथ, जलन, रक्तिमा आदि स्थानिक लक्षण उत्पन्न कर देते हैं तथा यदि रोग के जीवाणु अधिक बलवान् होते हैं तो वे रक्त में पहुँच कर ज्वर आदि सार्वदैहिक लक्षण भी उत्पन्न कर देते हैं। यद्यपि आयुर्वेद में इसे मुख्य रूप से दोषज व्याधि ही माना है इसीलिए इसके जो ७ भेद दिये हैं वे भी दोषों के अनुसार ही हैं। इसी अध्याय में आगे कहा जायगा—‘वातिकः पैत्तिकश्चैव.......समुदाहृताः ॥’ तथापि पृथक् नाम का निर्देश न करने पर भी इसके निदान में कहा है—‘क्षताद्ब्रागाद्यथोत्पिष्टादामच्छेदाद्विधारणात्।’ अर्थात् क्षत भग्न आदि का उल्लेख किया गया है। इसीप्रकार चरक चि. अ. २१ में भी कहा है। अर्थात् यहां भी दोषज कारणों से अतिरिक्त क्षत, वध (तीव्र आघात), बन्ध (कस कर पट्टी बांधना) तथा पतन (गिरकर चोट लगना) आदि का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इस प्रकार स्पष्टरूप से क्षतज भी माना गया है ॥१-२॥

कश्यपं भिषजां श्रेष्ठमादित्यसमतेजसम्। हुताग्निहोत्रमासीनमपृच्छद् वृद्धजीवकः ॥३॥

सूर्य के समान तेजस्वी, अग्निहोत्र करके बैठे हुए भिषक् श्रेष्ठ महर्षि कश्यप से वृद्धजीवक ने निम्न प्रश्न किया ॥३॥

भगवन् मण्डलीभूतं त्वग्रक्तं मांसमेव च। विदहन् दृश्यते व्याधिराशीविषविषोपमः ॥४॥
दुःसहः सुकुमाराणां कुमाराणां विशेषतः।

भगवन् सर्पविष के समान यह व्याधि मण्डलीभूत त्वचा (तथा त्वचाश्रित लसीका), रक्त और मांस को जलाती हुई सी दिखाई देती है। यह विशेषकर सुकुमार बालकों में होता है।

वक्तव्य— १. त्वचा—यहां त्वचा से त्वचाश्रित लसीका का भी ग्रहण किया जाना चाहिये क्योंकि विसर्प की उत्पत्ति में दोष तथा दूष्य सब मिलाकर ७ द्रव्य होते हैं। ये तभी पूरे हो सकते हैं जब दूष्यों में लसीका को भी गिना जाय। ऐसा चरक चि. अ. २१ में कहा है। २. यहां यह द्रष्टव्य है कि जिस प्रकार विसर्प के आरंभ कारण वातादि तीन

विसर्पचिकित्सिताध्यायः १४] खिलस्थानम् ४९७

दोष तथा त्वचा, रक्त, मांस एवं लसीका आदि ४ दूष्य अर्थात् ७ द्रव्य हैं उसी प्रकार कुष्ठों की उत्पत्ति में भी ये ही सात द्रव्य भाग लेते हैं। ऐसा माधवनिदान में भी कहा है। अब प्रश्न यह उठता है कि इन दोनों में फिर अन्तर क्या है ? इसका अन्तर भी माधवनिदान के कुष्ठ प्रकरण में मधुकोश व्याख्या में दिया गया है कि कुष्ठ—चिरक्रिया बाले, स्थिर, निर्बल रक्तपित्त वाले दोषों से होते हैं और विसर्प—अचिर विसर्पणशील, प्रबल रक्तपित्त वाले दोषों से होते हैं। एवं कुष्ठ में गुरु की अवज्ञा और चोरी आदि कारण हैं किन्तु विसर्प में नहीं। कुछ आचार्यों के मत में विसर्प वातादि एक २ दोष से होताहै तथा कुष्ठ त्रिदोषज ही होता है। यह इनमें परस्पर भेद है। ३. सुकुमाराणां कुमाराणाम्—विसर्प मुख्यरूप से छोटे बालकों को होता है। अथवा फिर ४० वर्ष के बाद की अवस्था में होता है। बालकों में भी मुख्यरूप से सद्यः प्रसूत बालक को प्रायः होता है। गर्भ के कारण उत्पन्न हुए क्षत के कारण इसके जीवाणु शिशु के शरीर में प्रविष्ट हो जाते हैं। G. E. Beaumont की Medicine में भी विसर्प के कारणों में लिखा है॥४॥

तस्य दारुणरूपस्य दीप्ताग्निसमतेजसः ।।५।।
समुत्पत्तिं च रूपं च चिकित्सां च महामुने ! । वक्तुमर्हसि तत्त्वेन बालानां हितकाम्यया ।।६।।

महामुने ! बालकों के हित की दृष्टि से आप अग्नि के समान तेज वाले तथा भयंकर रूप (लक्षणों) वाले-उस रोग की उत्पत्ति (Etiology and causes) रूप (लक्षण-Symptoms) तथा चिकित्सा का विस्तार से उपदेश कीजिये।

इति पृष्टः सा शिष्येण प्रोवाचेदं महामुनिः । दक्षक्रोधाद्भगवतो रुद्रस्यामिततेजसः ।।७।।
संदष्टौष्ठपुटस्यौष्ठाद्यद्रक्तं प्रापतद् भुवि । लोहिताङ्गोऽभवत्तस्माद्वैसर्पश्चाग्निसन्निभः ।।८।।
तस्याग्निर्दाहिनावेतौ भृशं पीडाकृतौ नृणाम्।

इस प्रकार शिष्य द्वारा प्रश्न किया जाने पर महामुनि कश्यप ने उत्तर दिया—असीम तेज वाले भगवान् रुद्र (महादेव) ने जब दक्ष पर क्रोध किया तब क्रोध से दांतों के द्वारा होठों के दबाये जाने से उनके होंठ से जो रक्त निकलकर भूमि पर गिरा वही लोहिताङ्ग (रक्त) तथा अग्नि के समान तेज वाले विसर्प रोग के रूप में उत्पन्न हुआ। इसलिये ये दोनों मनुष्यों का दाह करने वाले तथा अत्यन्त पीडा देने वाले हैं ।।७-८।।

विविधं सर्पणाद्देहे वैसर्पस्तु निरुच्यते ।।९।।

विसर्प की निरुक्ति—शरीर में नाना प्रकार से सर्पण (फैलना, विस्तार) करने के कारण यह विसर्प कहलाता है ।।९।।

क्षताद्भग्नादथोत्पिष्टादामच्छेदाद्विधारणात् । दध्यम्लमन्दकसुराशुक्तसौवीरकस्य च ।।१०।।
तिलमाषकुलत्थानां पलाण्डोर्लशुनस्य च । ग्राम्यानूपौदकानां च मांसानामतिसेवनात् ।।११।।
विरोधिगुर्वनिष्यन्दपूतिपर्युषिताशनात् । दिवास्वप्नाद जीर्णाच्च शाकपिष्टान्नसेवनात् ।।१२।।
विषोपहतवाय्वम्बुवस्त्रपानान्नसेवनात् । एवमादिभिरप्यन्यैर्दुष्टा वातादयः शिशोः ।।१३।।
वैसर्पं जनयन्त्याशु रक्तादीन् संप्रदूष्य तु । एवमेव प्रकुपितैर्दोषैर्दुष्टं यदा पयः ।।१४।।
सेवते तस्य तद्दोषाद्वैसर्पः संप्रजायते ।

विसप के कारण—क्षत, (चोट), अस्थिभग्न अथवा दब जाने (Laciration) से, शरीर के किसी अंश का कच्ची

४९८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विसर्पचिकित्सिताध्यायः १४]

अवस्था में कट जाने से, वेगों के धारण करने से तथा खट्टी दही, मन्दक (जो दही पूरी न जमी हो), सुरा, शुक्त (सिरका), सौवीर (निस्तुष जौ से बनाई हुई कांजी), तिल, उड़द, कुलत्थ, प्याज, लहसुन, ग्राम्य आनूप (जलीय भूमि में रहनेवाले) तथा औदक (जल में रहनेवाले-जलचर) पशुपक्षियों के मांस आदि के अधिक सेवन करने से, विरुद्ध भोजन, गुरु, अभिष्यन्दि (स्रोतों के मार्गों का रोध करनेवाले), पूति (दुर्गन्धियुक्त) तथा पर्युषित (बासी) भोजन करने से, दिन में सोने से, अजीर्ण से तथा शाकों और उड़द की पिट्ठी आदि से बने हुए पदार्थों के अधिक सेवन से, विष से दूषित हुए वायु, जल एवं वस्त्र से, जल तथा अन्न के सेवन करने से-उपर्युक्त तथा दूसरे कारणों से दूषित हुए वातादि (वात, पित्त, कफ) दोष बालक के शरीर में रक्त आदि (रक्त, मांस, त्वचा, लसीका आदि दूष्यों) को दूषित करके विसर्प रोग को उत्पन्न कर देते हैं। इसी प्रकार जब शिशु प्रकुपित हुए दोषों से दूषित दूध का सेवन करता है तब भी उस दूध के दोष के कारण विसर्प रोग हो जाता है ॥१०-१४॥

वातिकः पैत्तिकश्चैव श्लैष्मिको द्वन्द्वजास्त्रयः ।।१५।।
सन्निपाताच्च सप्तैते वैसर्पाः समुदाहृताः ।

विसर्प के भेद— १. वातिक, २. पैत्तिक, ३. श्लैष्मिक, ४. ५. ६ द्वन्द्वज तीन (वातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, पित्तश्लैष्मिक) ७. सान्निपातिक। इस प्रकार ये ७ विसर्प होते हैं। चरक में तीनों द्वन्द्वज विसर्पों के नाम क्रमशः आग्नेयविसर्प, ग्रन्थिविसर्प तथा कर्दमविसर्प दिये हैं ॥१५॥

न विना रक्तपित्ताभ्यां वैसर्पो जातु जायते ।।१६।।
रक्ताश्रयो रक्तभवः पित्तं रक्ते व्यवस्थितम्। तस्माद्रक्तावसेकोऽत्र भेषजं परमुच्यते ।।१७।।
बलकालवयोदोषदेशदेहव्यपेक्षया ।

रक्त तथा पित्त से बिना कभी विसर्प नहीं होता है। यह (विसर्प) रक्त के आश्रित होता है तथा रक्त से उत्पन्न होता है। और पित्त भी रक्त में स्थित होता है। इसलिये इसमें रोगी के बल, काल, अवस्था, दोष, देश तथा शरीर के अनुसार रक्तमोक्षण करना श्रेष्ठ चिकित्सा कही गई है। चरक चि. अ. २१ में कहा है— 'रक्तपित्तान्वये' अर्थात् प्रत्येक विसर्प में रक्त एवं पित्त का अनुबन्ध होता है। इसी से आगे कहा है— 'रुधिरस्यावसेकं च तंन्द्यस्याश्रयसंज्ञितम्' अर्थात् इसमें रुधिर का अवसेचन (रक्तमोक्षण) हितकर होता है क्योंकि रुधिर (रक्त) विसर्प का आश्रय कहा गया है। दूषित रक्तरूपी आश्रय के नष्ट हो जाने से विसर्प भी नष्ट हो जायेगा ॥

लक्षणान्यत ऊर्ध्वं तु प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ।।१८।।

अब मैं प्रत्येक विसर्प के क्रमशः पृथक् २ लक्षण कहूँगा।

हेतुभिः पूर्वमुद्दिष्टैर्यदा प्रकुपितोऽनिलः। रक्तादीन्यभिदूष्याशु वै ............. ।।१९।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २३४ तमं पत्रम्)

जब पूर्व निर्दिष्ट वातप्रकोपक हेतुओं के कारण वायु प्रकुपित होकर रक्त आदियों (रक्त, मांस, त्वचा तथा लसीका आदि दूष्यों) को दूषित करता है तब शीघ्र ही विसर्प रोग उत्पन्न हो जाता है।

वक्तव्य—यहां आचार्य ने विसर्प की त्रिदोषजता बतलाने के लिये ही रूक्ष, उष्ण तथा पूरण—ये तीन कारण दिये हैं। रूक्षता से वायु, उष्णता से पित्त तथा पूरण (पेट भर कर अन्न खाना) से कफ के संसर्ग की ओर संकेत किया गया है ॥१९॥

वातरक्तज्वर ..... स्फोटांश्चैष न .... येत्। वातिक विसर्प के लक्षण—उसके शरीर में वातरक्त, ज्वर......तथा स्फोट (फोड़े)....आदि हो जाते हैं। चरक चि. अ. २१ में निम्न लक्षण दिये हैं—भ्रमदवथुपिपासानिस्तोदशूलाङ्गमर्दोद्वेष्टनकम्प-