काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 844, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें४८४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | जातकर्मोत्तराध्यायः १२]
हिरण्यसुवर्णरजतताम्रकांस्यसीसायसानि मणयो मुक्ताप्रवाला(दयः) सर्वे, सर्वाणि धान्यानि व्रीहयः सर्वसतालेष्टक(?) क्षीरदधिघृतमधुगोमयगोमूत्रकार्पासादीनि, बालक्रीडनकानि पिष्टमयानि, तद्यथा- गोगजोष्ट्राश्वगर्दभमहिषमेषच्छागमृगवराहवानररुरुशरभसिंहव्याघ्रकपिनरक्षुद्रककूर्ममीनशुकसारिकाकोकिलक-लविङ्कचक्रवाकहंसक्रौञ्चसारसम्यूरक्रकरचकोरकपिञ्जलचरणाधुधवर्तकाकाराणि, शैल^१कगृह(क)रथकयान-कस्यन्दनकशल्लिकाजिञ्झरिकाखैरिकेशीकातुम्बीकादुष्प्रवाहकभद्रकसंचोल्लकपीठप.......न्दिका-दुहितृकाकुमारकगोलगण्डुकादीन्यन्यानि च स्त्रीकौतुकानीति, भिषक् तस्य मण्डलं सन्निधाय वसुधायै अर्ध्यं दत्त्वाऽनेन मन्त्रेण- ।।६।।
त्वमग्रजा त्वं प्रभवाऽव्यया च लोकस्य धात्री सचराचरस्य ।
त्वमीज्यसे त्वं यजसे महीह मात्रेऽव नः (पा) हि कुमारमेनम् ।।७।।
तं ब्रह्मा अनुमन्यतां स्वाहा ।
छठे मास में किसी शुभ दिन देवता की पूजा करके और ब्राह्मणों को भोजन एवं दक्षिणा से सन्तुष्ट करके तथा स्वस्तिवाचन करके, घर या वास्तु (बड़े भवन) के मध्य में पवित्र स्थान पर गोबर तथा पानी के द्वारा चार हाथ प्रमाण की एक गोल या चौकोर वेदी लीप कर बनाये। उस वेदी के पास वैद्य सुन्दर तथा ऐश्वर्य युक्त, सोने, चांदी, तांबा, कांसी, सीसा तथा लोहे की सब प्रकार की मणियां और मुक्ता, प्रबाल आदि सम्पूर्ण व्रीहि (चावल) आदि धान्य, सर्वसतालेष्टक (?) दूध, दही, घृत, मधु, गोबर, गोमूत्र तथा कपास आदि तथा पिष्टयुक्त (खोये इत्यादि के बनाये हुए) निम्न आकृति वाले खिलौने यथा—गौ, हाथी, ऊंट, घोड़ा, गदहा, भैंस, मेंढा, बकरी, मृग, सूअर, बन्दर, रुरु तथा शरभ जाति के मृग, सिंह, व्याघ्र, कपि, चीता, भेड़िया, कछुआ, मछली, तोता, मैना, कोयल, कलविङ्क, चक्रवाक, हंस, क्रौञ्च, सारस, मोर, क्रकर (केंकड़ा), चकोर कपिञ्जल (गौरय्या), चरपायुध तथा बत्तख के आकार के तथा शिला, गृह, रथ, यान (सवारी), स्यन्दन, शल्लिका, झञ्झर, खैरिका, ईशीका (सरकण्डा), तुम्बी, दुष्प्रवाह, भद्र, संचोल्ल, पीठप... (नना) न्दिका (ननद), दुहिता (लड़की), कुमार, गोलगन्दुक (गेद) इत्यादि आकार वाले तथा अन्य भी स्त्रियों की पसन्द वाले खिलौने इत्यादि रखकर निम्न मन्त्र के द्वारा पृथ्वी को अर्ध्य देवे—त्वमग्रजा त्वं प्रभवाऽव्यया च लोकस्त धात्री सचराचरस्य। त्वमीज्यसे त्व यजसे महीह मात्रेऽव नः (पा) हि कुमारमेनम् ।। तं ब्रह्मा अनुमन्यतां स्वाहा । (अर्थात् हे पृथिवि ! तू सबसे प्रथम हुई है। तू प्रभवा—प्रकृष्ट उत्पत्तिवाली तथा अव्यया—क्षय न होने वाली है। और तू सम्पूर्ण जड़ एवं चेतन जगत् की धात्री धारण करने वाली-पोषक है। हम तेरी पूजा एवं यज्ञ करते हैं। तू हमारी माता के समान है। तू इस बालक की रक्षा कर। ब्रह्मा उसका अनुमोदन करे—इत्यादि) ।।
वक्तव्य—यद्यपि यहां उपर्युक्त मन्त्रों के अर्थ दे दिये गये हैं परन्तु यहां मूल मन्त्र ही अभिप्रेत है ।।६-७।।
ततस्तं मण्डलमध्ये तथैव स्नातमलङ्कृतमहतवाससं कुमारं प्राङ्मुखमुपवेशयेन्मुहूर्तं, मुहूर्तमुपविश्य यद्धस्ताभ्यां प्रथमं गृहीत परिमृशेद्वा कृष्याद्वा तद्भागी भविष्यतीति हृदि निमित्तं कृत्वोत्थाप्योत्तरकालमवहितया धात्र्याऽन्वितः कुमारेण वा एतैरेव क्रीडनकैस्तैजसैरितरैश्च लघुभिरखरैरतीक्ष्णैरवक्रङ्गमैरनवोपस्करैराकर्षण-हरणशक्तै रुचिरभिर्घोषवद्भिर्विनोद्यमानः सोपाश्रयास्तरणोपेतायां भूमौ प्रतिदिनमभ्यासार्थं सकृदुपविशेदिति ।।
इसके बाद उस बालक को उसी प्रकार स्नान, अलंकार (आभूषण) तथा नवीन वस्त्रों से भूषित करके उस मण्डल के मध्य में पूर्व दिशा की ओर मुख करके थोड़ी देर के लिये बिठा दें। थोड़ी देर बैठने के बाद वह बालक अपने हाथों
१. प्राचीनास्तत्तदाकाराः क्रीडनकविशेषा इमे। प्रतिकृत्यर्थे कप्रत्ययः।