काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजातकर्मोत्तराध्यायः १२] खिलस्थानम् ४८५
के द्वारा वहां उपस्थित पदार्थों में से जिस पदार्थ का सर्वप्रथम ग्रहण, स्पर्श या कर्षण (खींचना) करेगा वह उसी का भागी होगा-ऐसा मनमें सोच ले । उसके बाद उस बालक को उठाकर प्रमाद रहित धात्री अथवा दूसरे बालक के साथ उपर्युक्त अथवा अन्य तेजयुक्त, हल्के, जो खर (कठोर) न हों, जो बहुत तेज न हों, जो बहुत वक्र (टेड़े मेड़े) न हों, जो बिलकुल नवीन न हों, जो खींचकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाये जा सकते हों तथा रुचिकारक एवं शब्दयुक्त (नाना प्रकार के शब्द करने वाले) खिलौनों से विनोद करता हुआ प्रतिदिन किसी के सहारे तथा बिछौने से युक्त भूमि पर अपने खेल आदि के अभ्यास के लिये प्रवेश करे । बालकों के खिलौनों के विषय में चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—क्रीडनकानि खल्वस्य विचित्राणि घोषवन्त्यभिरामाण्यगुरूरायतीक्ष्णाग्राण्यनास्यप्रवेशीन्यप्राणहराण्यवित्रासनानि च स्युः ॥८॥
तत्र श्लोकाः— उपलिप्ते शुचौ देशे शस्त्रतोयाग्निवर्जिते । उपविष्टं सकृच्चैनं न चिरात् स्थापयेद् बुधः ॥९॥
गोबर, मिट्टी आदि से लिपी हुई, पवित्र तथा शस्त्र, जल एवं अग्नि आदि से रहित भूमि में एक बार बैठ हुए शिशुको लगातार बहुत देर तक बुद्धिमान् व्यक्ति न बैठा रहने दे । अर्थात् निरन्तर बहुत देर तक उस अवस्था में न बैठा रहने दे ॥९॥
स्तैमित्यं कटिदौर्बल्यं पृष्ठभङ्गः श्रमो ज्वरः । विण्मूत्रानिलसंरोधाध्मानं चात्युपवेशनात् ॥१०॥
लगातार बहुत अधिक देर तक बैठे रहने से शिशु के शरीर में स्तिमितता, कटि में दुर्बलता, पृष्ठभङ्ग (सीधा न बैठ सकना), श्रम, ज्वर, मल, मूत्र एवं वायु का अवरोध तथा आध्मान हो जाते हैं ॥१०॥
आसीनस्यातिबालस्य सततं भूमिसेवनात् । आसन्नान्येव दुःखानि निर्घातं गात्रभेदनम् ॥११॥ निर्घाताज्जर्जराङ्गत्वं वेदना ज्वर संभवः । ततो न वृद्धर्बालस्य कठोराङ्गत्वमेव च ॥१२॥
अत्यन्त छोटे बालक के निरन्तर बहुत देर तक भूमि पर बैठे रहने से उसे दुःख (रोग) बहुत शीघ्र हो जाते हैं । इससे उसे निर्घात (शरीर का बहुत अधिक हिलना) तथा अङ्गभेद (शरीर का भेदन) हो जाता है । निर्घात के कारण उसके सम्पूर्ण अङ्ग जर्जर हो जाते हैं और शरीर में वेदना तथा ज्वर हो जाता है । इस प्रकार बालक के शरीर की वृद्धि नहीं हो पाती है तथा उसके अङ्ग भी कठोर (दृढ़) नहीं हो पाते हैं ॥११-१२॥
मक्षिकाकृमिकीटानां वेलाझञ्झानिलस्य च । सर्पाखुनकुलादीनां गम्यो भवति नित्यशः ॥१३॥
तथा बहुत देर तक लगातार भूमि पर बैठने से बालक मक्खी, कृमि तथा कीड़े आदियों से उत्पन्न होने वाले रोगों, झञ्झावात (तेज वायु) तथा सांप, चूहे एवं नेवले आदि प्राणियों से आक्रान्त हो जाता है । अर्थात् लगातार बैठे रहने से बालक को उपर्युक्त प्राणियों का भय रहता है । मक्खी, मच्छर, कीड़े आदि उसे तंग कर सकते हैं । तेज हवा लग सकती है अथवा सांप, विच्छू आदि उसे काट सकते हैं ॥१३॥
तस्मान्नातिचिरं नैको न बालो न च रोगितः । उपवेश्यो भवेद्बालो नापुण्याहकृतादिकः ॥१४॥ इति ॥
इसलिये छोटे बालक रो रोगो अवस्था में तथा अशुभ दिन आदि के समय अकेले बहुत देर तक न बैठे रहने दे ॥१४॥
तस्मिन्नेव मासि विविधानां फलानां प्राशनं, भिषगनुतिष्ठेत् । तद्धिं दन्तजातस्यान प्राशनं दशमे वा मासि प्रशस्तेऽहनि प्राजापत्ये नक्षत्रेऽऽभ्यर्च्य देवतां ब्राह्मणांश्च समासेनान्नेन दक्षिणावता स्वस्ति वाच्य गोमयोपलिप्ते स्थण्डिले दर्भानास्तीर्य सुमनसोऽवकीर्य चतुर्षु स्थानेषु गन्धमाल्यालङ्कृतान् पूर्णकलशान्