भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 846

४८६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | जातकर्मोत्तराध्यायः १२]

स्वस्तिकांश्च स्थाप्य क्रीडनकविहितानि पूर्ववदुपकरणानि सर्वाण्येवोपकल्प्य लावककपिञ्जल-तित्तिरचरणायुधानामन्यतमस्य मांसेनान्यैश्च विचित्रसुसंस्कृतकामिकैर्व्यञ्जनैः समुदितमन्नपानं मध्ये निधाय ततो भिषक् सुतमलङ्कृतमहतवस्त्रपरिहितमनुष्ठितरक्षाविधानं कुमारं प्राङ्मुखः प्रत्यङ्मुखमुपवेश्याग्निं प्रज्वाल्यान्नं सर्वव्यञ्जनोपेतं गृहीत्वाऽनेन मन्त्रेण जुहुयात्—।।१५।।

(इति ताडपत्रपुस्तके २३१ तमं पत्रम्)

फिर वैद्य को चाहिये कि उसी अर्थात् छठे मास में वह बालक को विविध प्रकार के फलों का सेवन कराये। उसके बाद दांत निकलने पर दसवें महीने में प्राजापत्य नक्षत्र के समय किसी शुभ दिन में देवताओं तथा ब्राह्मणों की अभ्यर्थना करके मांसयुक्त अन्न की दक्षिणा सहित स्वस्तिवाचन करके गोबर से लिपे हुए स्थण्डिल (वेदी) पर दर्भ डालकर तथा उस पर चमेली के फूल बिखेर कर चारों ओर गन्धद्रव्य एवं मालाओं से अलंकृत किये हुए जलपूर्ण घड़े तथा स्वस्तिक आदि के चिन्हों को स्थापित करके तथा खिलौनों की विधि के समय बनाये हुए सम्पूर्ण उपकरणों को पूर्ववत् तैयार करके लाव (बटेर), गौरय्या, तीतर, चरणायुध (कुक्कुट-मुर्गा) आदियों में से किसी एक का मांस तथा अन्य भी नाना प्रकार के सुसंस्कृत तथा मन को प्रसन्न करनेवाले व्यञ्जनों से सिद्ध किया हुआ अन्न-पान आदि मध्य में रख दे। तदनन्तर वैद्य को चाहिये कि वह पूर्व दिशा की ओर मुख करके आभूषणों से अलंकृत, नवीन वस्त्र पहने हुए तथा जिसका रक्षाविधान किया जा चुका हो ऐसे बालक को पश्चिम दिशा की ओर मुख करके बिठा दे। फिर अग्नि को प्रज्वलित करके उसमें सम्पूर्ण व्यञ्जनों से युक्त अन्न की निम्न मन्त्रों द्वारा आहुति देवे। (चरक शा. अ. ८ में भी शिशु की रक्षाविधान का वर्णन अच्छी प्रकार से किया गया है) ।।१५।।

यथा सुराणाममृतं नागेन्द्राणां यथा सुधा। तथाऽन्न प्राणिनां प्राणा अन्नं चाहुः प्रजापतिम् ।।१६।।
तदुद्भवस्त्रिवर्गश्च लोकाश्चैव यथा ह्यमी। जुहोमि तस्मात्त्वय्यन्नमग्नेऽमृतसुखोपगम् ।।१७।।
प्रजापतिरनुमन्यतां स्वाहा।

अर्थात् जिसस प्रकार देवताओं के लिये अमृत होता है तथा श्रेष्ठ हाथियों के लिये सुधा (मद) होती है उसी प्रकार प्राणियों के लिये अन्न प्राण होता है। अन्न को ही प्रजापति कहते हैं। जिस प्रकार इन त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) तथा लोक की उत्पत्ति होती है। उसी प्रकार अन्न की भी उत्पत्ति होती है। इसलिये हे अग्ने ! अमृत के समान सुख कोक देनेवाले इस अन्न की मैं तेरे अन्दर आहुति देता हूँ। प्रजापति इसस बात का अनुमोदन करते हैं। इसी प्रकार का मन्त्र सुश्रुत सू. अ. ४३ में वमनविधान में मिलता है। यहां पर भी ये मूल श्लोक ही पढ़ने चाहिये। अर्थ अभिप्रेत नहीं है ।।१६-१७।।

हुतशेषस्याङ्गुष्ठमात्रं सुमृदितं कृत्वाऽऽलभ्य बालं ततोऽस्य मुखे दद्यात्त्रीणि पञ्च वा वारान्, प्राश्योपस्पृशेच्चैनम्; उत्थाप्योर्ध्वं द्वादशमासिकस्यान्नमभिलषतोऽल्पशश्रूमानि दद्यादिति ।।१८।।

अग्नि में आहुति देने से बचे हुए (यज्ञशेष) अन्न में से थोड़ा सा अन्न लेकर उसे अच्छी प्रकार नरम करके बालक के मुख में तीन या पांच बार देवे। तथा अन्न खिलाने के बाद उसे जल का आचमन कराये। तदनन्तर १२ मास का होने के बाद अन्न की इच्छा करने पर उसे निम्न खाद्य पदार्थ थोड़े २ खाने को देवे। अर्थात् दसवें मास में अन्नप्राशन संस्कार किया जाता है तथा उसके बाद एक वर्ष का होने पर उसे धीरे २ अन्य (आगे वर्णित) शालि, षष्टिक आदि लघु खाद्य पदार्थ देने चाहिये। दस मास से पूर्व दूध तथा फल का सेवन ही कराया जाता है। सुश्रुत में छठे मास में ही अन्न देने का विधान दिया है ।।१८।।