काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजातकर्मोत्तराध्यायः १२] खिलस्थानम् ४८३
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अचूष्फ (१७४)
(इति) खिलेषु सूतिकोपक्रमणीयो (नामैकादशोऽध्यायः) ॥११॥
अथ जातकर्मोत्तराध्यायो द्वादशः।
अथातो जातकर्मोत्तरमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम जातकर्मोत्तर अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। इस अध्याय में उन क्रियाकर्मों का वर्णन किया जायेगा जो शिशु की उत्पत्ति के बाद किये जाते हैं ॥१-२॥
अथ खलु शिशोर्जातस्य तत्कर्मण्यभिनिवृत्ते प्रथम एव मासि कृतरक्षाहोममङ्गलस्वस्त्ययनस्य सूर्योदयदर्शनोपस्थानं, प्रदोषे चन्द्रमसः ॥३॥
अब शिशु की उत्पत्ति के बाद उस उत्पत्तिकर्म (प्रसव) के निवृत्त हो जाने पर प्रथम मास में ही उसकी रक्षा, होम, मङ्गल तथा स्वस्त्ययन (स्वस्तिवाचन) कराकर सूर्योदय का दर्शन एवं पूजा तथा रात्रि में चन्द्रमा का दर्शन कराना चाहिये। वेदों में भी सूर्यदर्शन का विधान दिया है। कहा है—आ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् पश्येम शरदः शतम् ॥३॥
चतुर्थे मासि स्नातालङ्कृतस्याहतवाससा संवीतस्य ससिद्धार्थकमधुसर्पिषा रोचनया चान्वालब्धस्य धात्र्या सहान्तर्गृहान्निष्क्रमणं देवतागारप्रवेशनं च। तत्राग्निं प्रज्वलन्तं घृताक्षतैरभ्यर्च्य ब्रह्माणमीश्वरं विष्णुं स्कन्दं मातृश्चान्यानि च कुलदेवतानि गन्धपुष्पधूपमाल्योपहारैर्भक्ष्यैश्च बहुभिर्बहुविधैः संपूज्य, ततो ब्राह्मणवाचनं कृत्वा, तेषामाशिषो गृहीत्वाऽभिवाद्य च गुरून् पुनः स्वमागारं प्रविशेत्। प्रविष्टं चैनमनेन मन्त्रेणाभ्युक्ष्य भिषग्वर्तेत ॥४॥
'शरच्छतं जीव शिशो! त्वं देवैरभिरक्षितः।
द्विजैरप्याशिषा पूतो गुरुभिश्चाभिनन्दितः' इति ॥५॥
चतुर्थ मास में उस शिशु को स्नान तथा अलंकार (आभूषणों) से युक्त करके नये वस्त्र पहना कर तथा सिद्धार्थक (श्वेत सरसों), मधु तथा घृत से अथवा गोरोचन से युक्त करके धात्री के साथ उसे प्रथम बार घर से बाहर निकाला जाता है तथा मन्दिर में प्रवेश कराया जाता है। वहां मन्दिर में प्रज्वलित हुई अग्नि की घृत तथा अक्षत (चावलों) के द्वारा अभ्यर्थना करके ब्राह्मण, भगवान् विष्णु, स्कन्द, मातृकाओं तथा अन्य भी कुलदेवताओं की गन्ध, पुष्प, धूप एवं माला आदि के उपहारों तथा नाना प्रकार के भक्ष्य पदार्थों द्वारा अनेकविध पूजा करके, ब्राह्मणों को नमस्कार करके तथा उनसे आशीर्वाद लेकर और गुरुओं को अभिवादन करके पुनः लौटकर अपने घर में प्रवेश करे। घर में प्रविष्ट होने पर वैद्य निम्न मन्त्र के द्वारा उसकी अभ्यर्थना करे—शरच्छतं जीव शिशो ! त्वं देवैरभिरक्षितः। द्विजैरप्याशिषा पूतो गुरुभिश्चाभिनन्दितः॥ (अर्थात् हे शिशु ! तुम देवताओं के द्वारा रक्षित, ब्राह्मणों के आशीर्वादों से पवित्र तथा गुरुओं के द्वारा प्रशंसित हुए सौ वर्ष तक जीओ) ॥४-५॥
षष्ठे मासि पुण्याहेऽभ्यर्च्य देवतां, द्विजांश्च भोजनेन सन्तर्प्य दक्षिणाभिः स्वस्ति वाच्य च, गृहमध्ये वास्तुमध्ये वा शुचौ देशे गोमयेनाद्भिश्च चतुर्हस्तमात्रं स्थण्डिलमुपलिप्य मण्डलं चतुरस्रं वा,