काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४८२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]
सन्तप्यमाने शिरसि दधिसर्ज्जरसाक्षतैः ।। १६० ।।
साश्वगन्धैर्मधुयुतैर्ललाटमुपलेहयेत् ।
यदि सिर में बहुत सन्ताप हो तो दही, राल, अक्षत (चावल) तथा असगन्ध (अश्वगन्धा) को मधु में मिला कर मस्तिष्क पर लेप करना चाहिये ॥१६०॥
लघ्वन्नकृतसंसर्गे निरष्टाह¹परे ज्वरे ।। १६१ ।।
संसर्गे सन्निपाते वा सप्रलापेऽनिलोत्तरे । सशूलबद्धविण्मूत्रे सश्वासे च विशेषतः ।। १६२ ।।
पुराणसर्पिः संस्कारो विधेयो जाङ्गलो रसः । दशमूलकुलत्थानां यवानां कुवलस्य च ।। १६३ ।।
कुलीरशृङ्ग्या रास्नायाः शटीपुष्करमूलयोः । भार्ग्या दुरालभायाश्च निर्यूहे साधु साधितः ।। १६४ ।।
तेनास्य विगुणो वायुर्ज्वरश्चास्य प्रशाम्यति ।
ज्वर में आठ दिन व्यतीत हो जाने पर लघु अन्न का प्रयोग करने पर यदि प्रलाप (Delirium) युक्त द्वन्द्वज या सन्निपात ज्वर में वायु की प्रधानता हो तथा यदि उसमें विशेष रूप से शूल, मलमूत्र की रुकावट तथा श्वास की कठिनता हो तो उसे पुराण सर्पि से संस्कृत जांगल मांसरस देना चाहिये । तथा दशमूल, कुलत्थ, यव, कुबल (बेर या पद्म), कुलीरशृंगी (काकड़ाशृङ्गी), रास्ना, शटी (कपूर कचरी), पुष्करमूल, भारंगी तथा दुरालभा को अच्छी प्रकार सिद्धकर निर्यूह बनाना चाहिये । इससे रोगी का विगुण (प्रकुपित) हुआ वायु तथा ज्वर नष्ट हो जाते हैं ।। १६१-१६४।।
पाचनीयैरुपक्रान्ते भग्नवेगे सति ज्वरे ।। १६५ ।।
पक्वावशेषे च मले बले मन्दत्वमागते । पेयं सुशीतं सक्षौद्रमिदं संशमनद्वयम् ।। १६६ ।।
पिप्पली सदुरालम्भा मृद्वीका वा सपिप्पली ।
पाचन द्रव्यों का प्रयोग करने से ज्वर का वेग शान्त हो जाने पर, मल के पचने से कुछ शेष रहने पर तथा बल के कुछ कम हो जाने पर निम्न दो शीतल संशमन योगों में मधु मिलाकर पिलाना चाहिये— १. पिप्पली तथा दुरालभा तथा २. मुनक्का और पिप्पली ।। १६५-१६६।।
गुडूच्यामलकानां च स्वरसे साधितं घृतम् ।। १६७ ।।
कल्केन सारिवाशुण्ठीलोध्रदाडिमचन्दनै । तद्धि मङ्गल्यकं नाम विषमज्वरनाशनम् ।। १६८ ।।
ज्वराणां चापि सर्वेषामेतदेवामृतोपमम् ।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। अचूष्के (१७४)
(इति) खिलेषु सूतिकोपक्रमणीयो (नामैकादशोऽध्यायः) ।।
गिलोय और आंवले के रस में सारिवा, सोंठ, लोध्र, अनार और चन्दन का कल्क डालकर घृत सिद्ध किया जाय । यह मङ्गल्यक नाम का घृत है । इसके सेवन से विषमज्वर नष्ट हो जाता है तथा अन्य ज्वरों में भी यह अमृत के समान है ॥
१. अष्टौ दिनान्यतिक्रान्त इत्यर्थः ।