काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 841, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूतिकोपक्रमणीयाध्यायः १९] खिलस्थानम् ४८१
एतदेव त्रिफलया युक्तं च सुरदारुणा ।।१५०।।
पाययेन्मधुनाऽऽलोड्य सन्निपाते कफोत्तरे।
यदि सन्निपात ज्वर में कफ की प्रधानता हो तो उपर्युक्त क्वाथ में ही त्रिफला तथा देवदारु डालकर उसे मधु में मिलाकर पिलाना चाहिये ।।१५०।।
एलामधूकमधुकशीतपाकीपरूषकैः ।।१५१।।
त्रिफलासारिवापाठामञ्जिष्ठाचतुरङ्गुलैः। पित्तोत्तरे त्वभि(न्यासे) पिबेत् समधुशर्करम् ।।१५२।।
यदि सन्निपात ज्वर में पित्त की अधिकता हो तो छोटी इलायची, महुआ, मुलहठी, शीतपाकी (गुंजा), फालसा, त्रिफला, सारिवा, पाठा, मंजीठ तथा अमलतास के क्वाथ में मधु एवं शर्करा मिलाकर पिलाना चाहिये ।।१५१-१५२।।
भार्गी शृङ्गी त्रिवृद्दन्ती दशमूली दुरालभा।
कट्वङ्गं त्रिफला शुण्ठी पिप्पली चेति तैः शृतम् ।।१५३।।
क्वाथं ससैन्धवक्षारं पाययेच्चानुलोमिकम्। गोमूत्रयुक्तां त्रिवृतां केवलां वा वचां पिबेत् ।।१५४।।
अनुलोमन (Lexative) के लिये भारंगी, काकड़ाशृङ्गी, त्रिवृत् (निसोथ), दन्ती (जमालगोटा), दशमूल, दुरालभा, कट्वङ्ग (श्योनाक), त्रिफला, सोंठ तथा पिप्पली-इत्यादि ओषधियों द्वारा पकाकर बनाये हुए क्वाथ में सैन्धव तथा क्षार मिलाकर पिलाना चाहिये अथवा गोमूत्र में मिलाकर त्रिवृत् या अकेली घृच का सेवन कराये ।।१५३-१५४।।
अनुलोमं गते दोषे संजाते ग्रहणीबले। ........... ततः सर्पिर्वा साधु संस्कृतम् ।।१५५।।
दोषों के अनुलोम हो जाने पर अर्थात् उनकी गति अनुलोम (नीचे की ओर) हो जाने पर तथा ग्रहणी के बलवान् हो जाने पर .... अच्छी प्रकार संस्कृत किया हुआ घृत पिलाना चाहिये ।।
मधुकेनातिविषया रोहिण्या भद्रदारुणा। सिद्धं सर्पिः पिबेत् काले सन्निपातज्वरापहम् ।।१५६।।
कल्याणकं महान्तं वा पञ्चगव्यमथापि वा।
अथवा सन्निपात ज्वर को नष्ट करने के लिये उचित काल में मुलहठी, अतीस, रोहिणी तथा देवदारु से सिद्ध किया हुआ घृत पिलाना चाहिये। अथवा महान् कल्याण घृत या पञ्चगव्य घृत का सेवन कराना चाहिये ।।१५६।।
शीतोष्णैरौषधैस्तैलं सर्वैरिवोपसंस्कृतम् ।।१५७।।
अभ्यञ्जनं विधातव्यं यच्चान्यन्त्रि मलापहम्।
सम्पूर्ण शीत एवं उष्ण ओषधियों से सिद्ध किये हुए तैल का अभ्यङ्ग (मर्दन-मालिश) करना चाहिये। तथा अन्य जो भी त्रिदोषनाशक आहार-विहार आदि हैं, वे सब करने चाहिये ।।१५७।।
हरीतक्या प्रियंग्वा च मालत्याऽऽम(लकेन) च ।।१५८।।
मु(ख)प्रक्षालनं कार्यं वासया खदिरेण वा।
हरड़, प्रियङ्गु, मालती (चमेली), आंवला, बांसा और खदिर (के क्वाथ) से मुखप्रक्षालन करना चाहिये ।।१५८।।
श्लक्ष्णपिष्टं तथाऽऽम्रास्थि रसाञ्जनसमन्वितम् ।।१५९।।
दन्तमांसौष्ठजिह्वानां प्रधानं प्रतिसारणम्।
बारीक पिसी हुई आम की गुठली तथा रसौंत के चूर्ण का दन्तमांस (मसूड़े), होंठ तथा जिह्वा पर प्रतिसारण (Dust) करना चाहिये ।।१५९।।