भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 840

४८० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]

अब मैं सन्निपात ज्वर की चिकित्सा.का वर्णन करूंगा। हे प्रिय ! सम्पूर्ण लक्षणों वाला सन्निपात ज्वर असाध्य होता है तथा अल्प लक्षणों वाला कृच्छ्रसाध्य होता है। तथा जिसका शारीरिक बल एवं अग्नि नष्ट हो गई है तथा जिन प्रसूता स्त्रियों का धातु, बल एवं ओज क्षीण हो चुका हो उनमें सन्निपात ज्वर सर्वथा (बिलकुल) ठीक नहीं होता। अथवा सर्वथा ठीक नहीं होता का अभिप्राय यह है कि पूर्णरूप से ठीक नहीं हो पाता है—(अन्त में कुछ न कुछ कसर अवश्य रह ही जाती है)। तथापि चिकित्सक को रोगी की मृत्युपर्यन्त चिकित्सा का प्रयत्न अवश्य करते रहना चाहिये ॥

सन्निपातेषु दोषेषु यो दोषो बलवान् भवेत्। तमेवादौ प्रशमयेच्छेषदोषमतः परम् ।।१४२।।
अल्पान्तरबलेष्वेषु दोषेषु (मति)मान् भिषक् । श्लेष्माणमादौ शमयेत् स ह्येषामनुबन्धकृत् ।।१४३।।
गुरुत्वात् कृच्छ्रपाकत्वादूर्ध्वकायाश्रयात्तथा। तस्माज्ज्वरेण दुर्दिष्टं वातपित्तकफात्मके ।।१४४।।

सन्निपात ज्वर में जो दोष सबसे अधिक बलवान् हो सबसे पहले उसी की चिकित्सा करनी चाहिये। उसके बाद शेष (बचे हुए) दोषों की चिकित्सा करनी चाहिये। यदि वात, पित्त, कफ रूप सन्निपात ज्वर से आक्रान्त व्यक्ति में तीनों दोषों के बलों में विशेष अन्तर न हो अर्थात् तीनों दोष लगभग समान बल वाले हों तो बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि वह पहले श्लेष्मा की चिकित्सा करे क्योंकि गुरु, कृच्छ्रपाकी तथा शरीर के ऊर्ध्वभाग में स्थित होने के कारण श्लेष्मा ही इनमें अनुबन्ध कारक होता है। चरक चि. अ. ३ में भी सन्निपात ज्वर में पहले कफ की चिकित्सा का ही विधान किया गया है। उसके बाद पित्त तथा वात की चिकित्सा करनी चाहिये ॥

तस्यां तस्यामवस्थायां तत्तत् कार्यं चिकित्सितम् । सामान्येन तु वक्ष्यामि तद्विशेषं भिषग्जितम् ।।१४५।।

इसलिये सन्निपात ज्वर की उस २ अवस्था में वह २ चिकित्सा करनी चाहिये अर्थात् ज्वर में जैसी अवस्था हो उसके अनुसार चिकित्सा करनी चाहिये। फिर भी सामान्यरूप से उनमें जो विशेषता है उसका मैं वर्णन करता हूँ ।। १४५ ।।

कुशकाशश्वदंष्ट्रार्कसुधैरण्डपरू(षकैः) । ...... त्रयवद्रोणं चर्मण्यास्तीर्य युक्तितः ।।१४६।।
स्वेदयेत् सूतिकां तत्र गुरुप्रावरणावृताम् ।

सन्निपात ज्वर में स्वेदन—कुश, काश, गोखुरू, आक, थूहर, एरण्ड, परूषक (फालसा) तथा ....जौ—इन सबको एक द्रोण परिमाण में लेकर चमड़े पर फैलाकर प्रसूता स्त्री को भारी वस्त्रों से ढककर तदनन्तर उसे युक्तिपूर्वक स्वेदन देना चाहिये ।। १४६ ।।

नागरं दशमूलं च कट्वङ्गं दारुकद्वयम् ।।१४७।।
पिप्पलीस्त्रिफला भार्गी कर्कटाख्या दुरालभा । ससैन्धवः कषायोऽयं ज्वरे पूर्वापराह्निके ।।१४८।।
मधुहिङ्गुसमायुक्तो देयः सायाह्निके ज्वरे ।

पूर्वाह्न (दिन के पूर्व भाग १२ बजे से पूर्व) तथा अपराह्न (दिन के पिछले पहर ३ बजे के बाद) काल में होने वाले सान्निपातिक ज्वर में सोंठ, दशमूल, कट्वङ्ग (श्योनाक), हरिद्रा, दारुहरिद्रा, पिप्पली, त्रिफला, भारंगी, कर्कट (काकड़ाशृङ्गी अथवा बिल्वशलाटु) तथा दुरालभा के क्वाथ में लवण मिलाकर देना चाहिये। तथा सायंकाल होने वाले ज्वर में उपर्युक्त कषाय में मधु एवं हींग मिलाकर देना चाहिये ॥

पटोलमुस्तामधुकरोहि ........................... ।।१४९।।
सर्पिषा सह पातव्यं सन्निपातेऽनिलोत्तरे ।

यदि सन्निपात ज्वर में वायु की प्रधानता हो तो पटोल (परवल), नागरमोथा, मधुक (मुलहठी) तथा रोहिणी ..... आदि द्रव्यों के क्वाथ को घृत के साथ सेवन कराना चाहिये ॥