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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४५५

वक्तव्य—इसमें दूध बकरी का लिया जाय तो विशेष गुणकारी होता है। चरक ने रक्तातिसार में बकरी के दूध का प्रयोग दिया है ॥९८॥

मौचो रसस्तिला लोध्रमुत्पलं कमलं तथा। पिबेत् क्षीरेण संयुक्तं रक्तातीसारनाशनम् ॥९९॥

मोचरस, तिल, लोध्र, नीलकमल, कमल-इनके चूर्ण का दूध के साथ सेवन करने से रक्तातिसार नष्ट होता है ॥९९॥

पयस्या चन्दनं लोध्रं पद्मकेंसरमेव च। पयसा मधुसंयुक्तं पिबेद्रक्तातिसारिणी ॥१००॥

रक्तातिसार के रोगिणी को पयस्या (क्षीरकाकोली), रक्तचन्दन, लोध्र तथा कमलकेसर-के चूर्ण को मधु में मिलाकर दूध के साथ सेवन करना चाहिये ॥१००॥

रक्तं निर्वा(र्वे)हते यावत् कृच्छ्रात् सगुदवेदनम्। कुप्यपाषाणतप्तेन पयसा भोजितां ततः ॥१०१॥ मधुकं घृतमण्डेन त्वथैनामनुवासयेत्।

जब तक गुदा में वेदना होती है तथा कष्टपूर्वक गुदा से रक्त आता है तब तक कुप्पी अथवा पत्थर के बर्तन में गरम किये हुए दूध के साथ मुलहठी का सेवन करना चाहिये। तदनन्तर घृतमण्ड के द्वारा उसे अनुवासन देना चाहिये। जमे हुए घी के ऊपर के स्वच्छ पतले भाग को घृतमण्ड कहते हैं ॥१०१॥

गर्भिण्या वातिकी यस्या जायते परिकी(क)र्तिका ॥१०२॥ बृहतीबिल्वमानन्तैर्यूषं कृत्वा तु भोजयेत्।

जिस गर्भवती स्त्री को वातिक परिकर्तिका (परिकर्तनवत् गुदा में पीडा) होती हो उसे बृहती, बिल्व तथा अनन्तमूल का यूष बनाकर खिलाना चाहिये ॥१०२॥

परिकी(क)र्तिकायां गर्भिण्याः पैत्तिकायामिदं हितम् ॥१०३॥ मधुकं हंसपदी च वितुन्नकमथापि च। पाययेन्मधुसंयुक्तं सुपिष्टं तण्डुलाम्बुना ॥१०४॥

गर्भवती स्त्री की पैत्तिक परिकर्तिका में मुलहठी, हंसपदी, तथा धनिये को अच्छी प्रकार पीसकर मधु में मिलाकर तण्डुलोदक के साथ पिलाना चाहिये ॥१०३-१०४॥

श्लैष्मिकायां तु कर्तव्यं यथावत्तन्निबोधत। कण्टकारी श्वदंष्ट्रा च अश्वत्थं चेति तत् समम् ॥१०५॥ संपन्नलवणं कृत्वा भोजयेत् पाययेदपि।

श्लैष्मिक परिकर्तिका में जो चिकित्सा करनी चाहिये उसे तू यथावत् सुन, कटेरी, गोखुरू तथा पीपल-इन तीनों को समान मात्रा में लेकर पीसकर तथा उसमें नमक मिलाकर भोजन तथा पान के रूप में प्रयोग करना चाहिये ॥१०५॥

अथ चेदत्र गर्भिण्याः पार्श्वस्योपग्रहो भवेत् ॥१०६॥ शालपर्णी पृश्निपर्णी बृहतीं कण्टकारिकम्। बिल्वाग्निमन्थश्योनाकं काश्मर्यमथ पाटलिम् ॥१०७॥

(इति ताडपत्रपुस्तके २२४ तमं पत्रम्)

यूषं कृत्वा तु संपन्नं भोजयेत् पाययेदपि।

४५६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

यदि गर्भिणी को पार्श्वग्रह (पार्श्व का जकड़ जाना) हो जाय तो उसे शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, कटेरी, बिल्व, अग्निमन्थ (अरणी), श्योनाक (अरलु), गंभारी तथा पाटला–इनका अच्छी प्रकार से यूष बनाकर गर्भिणी को भोजन तथा पान के रूप में प्रयोग कराये ।।१०६-१०७।।

अथ चेदत्र गर्भिण्या मुखपाको भवेदिह ।।१०८।।
हरिद्रदारुनिष्क्वाथं ग्राहयेत् कवलं ततः । ततः स्नेहेन कृत्वा तु ततः स्याच्छर्करोदकम् ।।१०९।।
लोध्रोदकेन कृत्वा तु कुर्यात्तत्प्रतिसारणम् । अनन्तां च समङ्गां च घृषी मोचरसं तथा ।।११०।।
मधुना सह(म)मश्नीयात्ततः संपद्यते सुखी ।

यदि गर्भिणी स्त्री को मुखपाक (Stomatitis) हो जाय तो पहले हल्दी तथा दारुहल्दी के क्वाथ के कवलधारण करे। तदनन्तर स्नेह के तथा फिर चीनी मिले पानी के तथा अन्त में लोध्र क्वाथ के कवलधारण करे उसके बाद लोध्र के चूर्ण का ही मुख में प्रतिसारण (Dusting) करे। अन्त में सारिवा, मंजीठ, घृषी तथा मोचरस के चूर्ण को मधु में मिलाकर सेवन (अन्तःप्रयोग) करना चाहिये। इससे वह रोगिणी स्वस्थ हो जाती है ।।१०८-११०।।

आक्षेपके समुत्पन्ने तथैवाप्यपतानके ।।१११।।
मातुलुङ्गरसः पेयो बिडसैन्धवसंयुतः । अग्निमन्थस्य निर्यूहः क्वथितो वरुणस्य वा ।।११२।।
लावो वा तैत्तिरो वाऽपि रसः स्निग्धः प्रशस्यते ।
पानार्थं वातशमनो ^१वादूलो रस एव च ।।११३।।
असंसृष्टे तु कर्तव्यो विधिरेष सुखावहः ।

यदि गर्भिणी को आक्षेपक अथवा अपतानक रोग हो जावे तो बिजौरे नींबू के रस में विडनमक (बिरिया) तथा सैन्धव नमक डालकर पिलाना चाहिये। अथवा अग्निमन्थ क्वाथ या वरुण क्वाथ देना चाहिये। अथवा बटेर या तीतर के स्निग्ध (स्नेहयुक्त) मांंसरस देने चाहिये। तथा पीने के लिये चर्मचटी का रस देना चाहिये। यदि उपर्युक्त (आक्षेपक तथा अपतानक) रोगों में किसी दोष का विशेष रूप से प्राबल्य न हो तब यह विधि लाभप्रद होती है। आक्षेपक रोग—शरीर की मांसपेशियों में अकस्मात् तथा प्रबल जो संकोच होता है उसे आक्षेपक या (Convulsions) कहते हैं। यह कई रोगों में मुख्य लक्षण होता है जिनमें मस्तिष्क विकार-युक्त हो जाता है। अपतानक रोग—जिस रोग में शरीर की मांसपेशियों में तनाव उत्पन्न हो जाता है उसे अपतानक (Tetanus) कहते हैं। सुश्रुत नि. अ. १ में कहा है—सोऽपतानकसंज्ञो यः पातयत्यन्तराऽन्तरा ।।१११-११३।।

पित्तोपसृष्टे तु 'हितो जाङ्गलो मधुरो रसः ।।११४।।
शृतो मधुरकैः सर्वैर्दाडिमाम्लसमायुतः ।

यदि उपर्युक्त रोगों (आक्षेपक तथा अपनातक) में पित्त का संयोग हो तो उसमें मधुर जांगल मांंसरस का सेवन कराना चाहिये। अथवा मधुर वर्ग की सम्पूर्ण ओषधियों का क्वाथ बनाकर उसमें अनारदाने की खटाई डालकर देना चाहिये ।।११४।।

वातश्लेष्मसमुत्थे तु व्यम्लस्तु कटुको रसः ।।११५।।
यवक्षारेण संयुक्तो जाङ्गलः सततं हितः । मृदवः पाणितापाश्च पित्तवर्ज्ये हितास्तथा ।।११६।।


१. चर्मचट्या रस इत्यर्थः ।

अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४५७

यदि इनमें वायु तथा कफ का संयोग हो तो अम्ल और कटु रसों का सेवन कराना चाहिये अथवा जांगल मांसरस में यवक्षार मिलाकर देना चाहिये। तथा हाथों को गरम करके रोगी को मृदु ताप पहुँचाना लाभदायक होता है। परन्तु इसमें पित्त का प्रकोप नहीं होना चाहिये। अर्थात् यदि इसमें साथ में पित्त का भी प्रकोप सम्मिलित हो तो रोगी को ताप नहीं पहुंचाना चाहिये ॥११५-११६॥

घृतसेकोऽथवा कार्यो जीर्णे गर्भे विशेषतः ।
उष्णो वा यदि वा शीतो व्याधिमासाद्य तत्त्वतः ॥११९७॥

अथवा जीर्ण गर्भ में विशेषकर घृत का सेक करना चाहिये। यह सेक व्याधि के अनुसार उष्ण या शीत भी हो सकता है ॥११९७॥

अथ छर्दिचिकित्सां तु प्रोच्यमानां निबोधत । मातुलुङ्गरसो लाजाः कोलमज्जा तथाऽञ्जनम् ॥११९८॥
तथा दाडिमसारश्च शर्करा क्षौद्रमेव च । एष वातातिकां छर्दिं हन्ति लेहो विशेषतः ॥११९९॥

अब तू मेरे से छर्दि (वमन) की चिकित्सा को सुन, वातिक छर्दि—बिजौरे का रस, लाजा (धान की खील), कोल (बेर) की मींगी, अञ्जन (रसाञ्जन), अनारदाना, चीनी—इन सबका मधु के साथ बनाया हुआ यह अवलेह विशेषरूप से वातिक छर्दि को नष्ट करता है ॥११९८-११९९॥

दाडिमाम्लो रसः पक्वो हृद्यो लवणवर्जितः । वातच्छदिहरो राजन्! माहिषो वा सुसंस्कृतः ॥१२००॥

हे राजन् ! हृदय को अच्छा लगने वाला तथा लवणरहित खट्टेअनार का रस तथा पका हुआ मांसरस अथवा अच्छी प्रकार संस्कार किया हुआ भैंस का मांसरस खिलाने से वातिक छर्दि नष्ट होती है ॥१२००॥

शर्करामधुसंयुक्तं लाजचूर्णसमायुतम् । चातुर्जातककल्केन हृद्यं पुष्पैः सुवासितम् ॥१२०१॥
पित्तच्छर्दिप्रशमनं हितं तण्डुलधावने । हिता लाजमयी पेया सिताक्षौद्रेण संयुता ॥१२०२॥
जाङ्गलो वा रसः पथ्यः शर्करामधुरीकृतः ।

पैत्तिक छर्दि—इसमें चातुर्जातक (दालचीनी, छोटी इलायची, तेजपत्र, नागकेसर) के कल्क में लाजा का चूर्ण, शर्करा तथा मधु मिलाकर तथा उसे फूलों के द्वारा हृद्य एवं सुगन्धित करके तण्डुलोदक के साथ देना चाहिये। अथवा शर्करा एवं मधु मिश्रित लाजा (धान की खील) की पेया देनी चाहिये। अथवा जांगल पशुपक्षियों का मांसरस शर्करा के द्वारा मधुर करके पथ्य माना गया है ॥१२०१-१२०२॥

आम्रजम्बूप्रवालानि सितानि सुशृतानि तु ॥१२०३॥
क्षौद्रयुक्तानि पेयानि श्लेष्मच्छर्द्यां विशेषतः । भोजनार्थे हितं यूषं मुद्गैर्दाडिमसारि(धि)तम् ॥१२०४॥
व्यपेतस्नेहलवणं हृद्यं छर्दिविनाशनम् ।

श्लैष्मिक छर्दि—(श्लैष्मिकवमन) में विशेषकर आम एवं जामुन के शुभ्र कोमल पत्तों को पकाकर उसमें मधु मिलाकर पिलाना चाहिये। तथा भोजन में उसके लिये अनारदाने से सिद्ध किया हुआ तथा स्नेह और लवणयुक्त मूंगों का यूष हितकर है। यह हृदय को अच्छा लगता है तथा वमन को नष्ट करता है ॥१२०३-१२०४॥

सन्निपातसमुत्थायां संसृष्टान्यवचारयेत् ॥१२०५॥

सन्निपातज (त्रिदोषज) वमन में संसृष्ट योग देने चाहिये अर्थात् यदि वमन त्रिदोषजन्य हो तो उसकी चिकित्सा भी ऐसी होनी चाहिये जो तीनों दोषों को शान्त करे ॥१२०५॥

४५८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

कृमिजायां तु कर्तव्यं यत् पुरस्तात् प्रवक्ष्यते। वर्षाभूमूलनिष्क्वाथं योजयेद्भद्रदारुणा ।।१२६।।
तत् पिबेन्मधुसंयुक्तं शोफं स्त्री पूर्वया सह ।

यदि गर्भिणी स्त्री को कृमिजन्य वमन हो तो निम्नलिखित चिकित्सा करनी चाहिये—पुनर्नवा की मूल तथा देवदारु के क्वाथ में मधु मिलाकर उसे पिलाना चाहिये। यदि उस स्त्री को शोफ (शोथ) हो तो केवल ओषधि अर्थात् केवल पुनर्नवा का क्वाथ देना चाहिये ।।१२६।।

पिप्पल्यङ्कोठमूलानि वाजिलिण्डरसस्तथा ।।१२७।।
दधि माहिषमित्येतत् कामलायाश्चिकित्सितम् ।

गर्भिणी स्त्री के कामला रोग (Jaundice) पिप्पली, अङ्कोठमूल, घोड़े की लीद का रस और भैंस के दूध की दही सब मिलाकर सेवन कराना चाहिये ।।१२७।।

मातुलुङ्गरसः पेयः सैन्धवेन सुयोजितः ।।१२८।।
वातिके हृदि शूले तु प्रधान इति निश्चयः ।

गर्भिणी के वातिक हृदयशूल में मुख्यरूप से बिजौरै नींबू के रस में अच्छी प्रकार नमक मिलाकर पिलाना चाहिये। यह निश्चय से इसकी प्रधान ओषधि है ।।१२८।।

प्रियङ्गवोऽथ पिप्पल्यो भद्रमुस्ता हरेणवः ।।१२९।।
क्षौद्रं बदरचूर्णं च पिबेत् पित्तार्दिते हृदि ।

पैत्तिक हृदयशूल में प्रियङ्गु, पिप्पली, भद्रमुस्ता, हरेणु, मधु तथा बेर का चूर्ण—इनका प्रयोग करना चाहिये ।।१२९।।

पिप्पली चूर्णकल्कस्तु पत्रं चोचं प्रियङ्गवः ।।१३०।।
मातुलुङ्गरसश्चैव लेहः श्लेष्मार्दिते हृदि ।

श्लैष्मिक हृदयशूल में पिप्पली का चूर्ण, तेजपत्र, चोच (दालचीनी का एक भेद जिसे बहलत्वक् कहते हैं) तथा प्रियङ्गु को बिजौरे नीम्बू के रस में मिलाकर अवलेह बनाकर देना चाहिये ।।१३०।।

कुलीरशृङ्गी शरटं भार्गी पिप्पल्य एव च ।।१३१।।
वातकासहरो लेहो मातुलुङ्गरसप्लुतः ।

कुलीरशृङ्गी (काकड़ाशृङ्गी), शरट, भार्ङ्गी तथा पिप्पली-इनके चूर्ण को बिजौरे नीम्बू के रस में मिलाकर बनाया हुआ अवलेह वातिक कास रोग को नष्ट करता है ।।१३१।।

मधूलिका तु गोक्षीरी पिप्पली शर्करा तथा ।।१३२।।
द्राक्षाक्षौद्रसमायुक्तो लेहो वै पित्तकासहा ।

मुलहठी, गोक्षीरी, पिप्पली तथा शर्करा इन सबके चूर्ण को मुनक्के तथा मधु के साथ पीसकर बनाया हुआ अवलेह पैत्तिक कास को दूर करता है ।।१३२।।

पिप्पल्यस्त्रिफला रास्ना भद्रदारु समाक्षिकम् ।।१३३।।
श्लेष्मकासहरो लेहः कुशलैः परिकीर्तितः ।

पिप्पली, त्रिफला, रास्ना तथा भद्रदारु के चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर बनाया हुआ अवलेह चिकित्साकुशल व्यक्तियों द्वारा श्लैष्मिक कास को नष्ट करनेवाला कहा गया है ।।१३३।।

अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४५९

मधुकं शङ्खचूर्णं च जीवलाक्षाऽथ माक्षिकम् ।। १३४ ।।
लेहः शर्करया युक्तः क्षतकासविनाशनः ।

मुलहठी, शंखपुष्पी, पीपल की लाख तथा मधु और चीनी इनका अवलेह क्षतज कास को नष्ट करता है ।। १३४ ।।

मयूरस्य तु रोमाणि श्वाविच्छल्यकयोरपि ।। १३५ ।।
पिप्पलीतण्डुलांश्चैव कोलमूलं च तत्समम् । चूर्णितं मधुसर्पिर्भ्यां लिहेच्छ्वासकफापहम् ।। १३६ ।।

मोर के रोंये (चंदोए) तथा सेही और शल्यक (छोटी सेही ) के बाल, पिप्पली, चावल तथा कोल (बेर) की जड़— समान मात्रा में लेकर चूर्ण करके उनका मधु और घृत (असमान मात्रा) के साथ अवलेह बना कर सेवन करने से श्वास तथा कफरोग नष्ट होते हैं ।। १३५-१३६ ।।

गुडो रास्नाऽथ पिप्पल्यो द्राक्षा समरिचा तथा । हरिद्रा च समङ्गानि चूर्णान्येतानि लेहयेत् ।। १३७ ।।
तैलेन श्वासकासेषु तमके चैव पूजितः ।

गुड, रास्ना, पिप्पली, द्राक्षा (मुनक्का), मरिच, हल्दी, मजीठ, इनका चूर्ण तैल के साथ मिलाकर श्वास, कास तथा तमक श्वास (Asthama) में चटाना चाहिये ।। १३७ ।।

अभयाऽऽमलकं वाऽपि शल्यकस्य त्वचा युतम् ।। १३८ ।।
अन्तर्गृहं सहोष्ट्रास्थि दधितैलेन लेहयेत् । पिप्पल्यामलकी मुस्ता तथा फाणितशर्करा ।। १३९ ।।
हरीतकीति चूर्णानि मधुतैलेन लेहयेत् । शमनं सर्वकासानां श्वासानां च प्रशस्यते ।। १४० ।।

सम्पूर्ण श्वास तथा कास रोगों में हरड़, आंवला, शल्यक (छोटी सेही) की त्वचा गृहधूम तथा ऊंट की हड्डियां इन सबको पीसकर दही तथा तेल के साथ चटाये । तथा पिप्पली, आंवला, नागरमोथा, राब, शर्करा तथा हरड़ का चूर्ण तैल और मधु में मिलाकर चटाना चाहिये ।। १३८-१४० ।।

भद्रदारुहरीतक्यौ सैन्धवं कुष्ठमेव च । घृतं च फाणितं चैव लेह ऊर्ध्वानिलापहः ।। १४१ ।।

भद्रदारु, हरड़, सैन्धव नमक, कुष्ठ, घृत तथा फाणित (राब) को मिलाकर बनाया हुआ अवलेह ऊर्ध्ववात (डकार) को नष्ट करता है ।। १४१ ।।

पिप्पली गैरिकं भार्गी हिङ्गु कर्कटकी तथा ।
समानि च भवेल्लेहो हिक्काप्रशमनः स्त्रियाः ।। १४२ ।।

पिप्पली, गेरु, भारंगी, हींग तथा काकड़ाशृङ्गी को समान मात्रा में लेकर बनाया हुआ अवलेह गर्भिणी स्त्री की हिक्का को शान्त करता है ।। १४२ ।।

(पिप्पली) पिप्पलीमूलं मुस्ता तगरमेव च । दीपनीयं भवेदेतत् क्षीरेण तु समाक्षिकम् ।। १४३ ।।

पिप्पली, पिप्पलीमूल, नागरमोथा तथा तगर के चूर्ण को मधु में मिलाकर दूध के साथ सेवन करने से अग्निदीप्त होती है अर्थात् यह (Stomachic) है ।। १४३ ।।

शतावरी दर्भमूलं मधुकं क्षीरमोरटः । पाषाणभेदकोशीरं कतकस्य फलानि च ।। १४४ ।।
एषां क्वाथरसं कल्कं क्षीरं वा पाययेद्भिषक् । मूत्रग्रहेषु सर्वेषु सिद्धमित्याह कश्यपः ।। १४५ ।।

४६०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

सम्पूर्ण मूत्रग्रह रोगों में—शतावरी, दर्भमूल, मुलहठी, क्षीरमोरट (मूर्वाभेद-क्षीरचूरीनि या क्षीरमोरबेल), पाषाणभेद, खस तथा निर्मली बीजों का क्वाथ, कल्क अथवा इनसे सिद्ध दूध पिलाना चाहिये—ऐसा महर्षि कश्यप का मत है ॥१४५॥

वातगुल्मस्य भैषज्यं योनिगुल्मस्य चाप्यथ । यथावत् पूर्वमुद्दिष्टं समासेन चिकित्सितम् ॥१४६॥

वातगुल्म तथा योनिगुल्म (रक्तगुल्म) की चिकित्सा पहले संक्षेप में यथावत् कह दी गई है ॥१४६॥

वातिके पैत्तिके चैव श्लैष्मिके च विशेषतः ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २२५ तमं पत्रम्।)

चतुर्थे मासि नारीणामिदं कुर्याच्चिकित्सितम् ॥१४७॥

चतुर्थ मास में गर्भिणी स्त्री के वातिक, पैत्तिक तथा श्लैष्मिक गुल्म की निम्न चिकित्सा करनी चाहिये ।

वक्तव्य—पहले भी कहा गया है कि गर्भवती स्त्रियों में चतुर्थ मास से पूर्व ओषधि नहीं देनी चाहिये क्योंकि तब तक गर्भ स्थिर नहीं होता है । चतुर्थ मास में गर्भ स्थिर हो जाता है । इसीलिये चतुर्थ मास से पूर्व इसकी चिकित्सा का विधान न देकर उसके बाद के मासों में क्रमशः चिकित्सा का क्रम दिया गया है ॥१४७॥

सर्पिर्भरन्नपानैर्वा क्षीरेणेक्षुरसेन वा । वामयेत् फलयुक्तेन यथावदिति कश्यपः ॥१४८॥

मदनफल से युक्त घृत, अन्नपान, दूध अथवा इक्षुरस के द्वारा यथावत् वमन कराना चाहिये । ऐसा महर्षि कश्यप का मत है ॥१४८॥

चतुर¹ङ्गुलसिद्धेन रसेन पयसाऽपि वा । विरेचयेत्तु मतिमान् य इच्छेत् सुखमात्मनः ॥१४९॥

अथवा स्वास्थ्य की इच्छा करनेवाले बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि अमलतास के रस से सिद्ध किये हुए मांसरस अथवा दूध के द्वारा गर्भिणी स्त्री को विरेचन कराये ॥१४९॥

पूतीकपत्रैर्भृष्टैर्वा पुष्पैर्वाऽट्यालकस्य वा । अम्लां यवागूं प्रपिबेन्नातिवेगा यथा भवेत् ॥१५०॥

अथवा पूतिकरञ्ज के तले हुए पत्तों अथवा पीली बला के फूलों से बनी हुई यवागू को अनारदाने से खट्टी करके पीनी चाहिये जिससे विरेचन के बहुत अधिक योग न हों । अर्थात् इस प्रयोग से विरेचन के थोड़े ही वेग होते हैं ॥१५०॥

एरण्ड(पत्रं)क्षीरेण वातरोगाम्विता पिबेत् । वातमूत्रनिरोधे तु शूले वाऽपि समुत्थिते ॥१५१॥

यदि गर्भिणी स्त्री को कोई वातिक रोग हो, वातिक मूत्रग्रह हो अथवा शूल हो तो दूध के साथ एरण्ड पत्र का चूर्ण दें अथवा दूध में एरण्ड के पत्तों को पकाकर दें ॥१५१॥

पञ्चमे मासि गर्भिण्या व्यक्ताम्ललवणं ततः । आस्थापनं हितं नार्या मधुरं चानुवासनम् ॥१५२॥

पांचवें मास में गर्भिणी स्त्री को अम्ल एवं लवण द्रव्ययुक्त आस्थापन तथा मधुर द्रव्यों की अनुवासन (स्नेह) बस्ति देनी चाहिये ॥१५२॥

ग्रन्थीनां पिडकानां च शोथे चैव विशाम्यते ! ।
रोहिण्यां विद्रधौ वाऽपि षष्ठमासे विशेषतः । यथास्वं भेषजं कुर्याद्दारुणं शास्त्रपारगः ॥१५३॥


१. आरग्वधरसेनेत्यर्थः ।

सप्तमे मासि नारीणां सर्वमेतत् प्रयोजयेत्।

अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४६१

हे राजन् ! शास्त्रकुशल चिकित्सा को छठे मास में गर्भिणी स्त्री की ग्रन्थिरोग, पिडका, शोथ तथा विशेषकर रोहिणी नामक विद्रधि की अपने २ रोग के अनुसार दारुण चिकित्सा करनी चाहिये।

वक्तव्य—रोहिणी रोग गला का एक संक्रामक रोग है जिसे हम आधुनिक परिभाषा के अनुसार (Diphtheria) कह सकते हैं। जिसमें गले में एक झिल्ली बन जाती है जिससे श्वासावरोध हो जाता है। यह रोग प्रायः बच्चों को होता है॥५३॥

पीनमांसोपशमनं क्षारकर्माग्निकर्म च। भग्नास्थिश्लेषणं चैव शस्त्रकर्म तथैव च ।। १५४ ।।
सप्तमे मासि नारीणां सर्वमेतत् प्रयोजयेत्।

सातवें मास में गर्भिणी स्त्री के उभरे हुए मांस की शान्ति (व्रण के भरने के बाद यदि मांसतन्तु की अधिक वृद्धि हो जाय तो उसे (Canterize) करके अथवा नीला थोथा आदि तीक्ष्ण द्रव्यों के द्वारा स्वस्थ मांस के समान स्तर में लाना होता है), क्षारकर्म, अग्निकर्म, टूटी हुई हड्डी का जोड़ना इत्यादि सब शस्त्रकर्म किये जा सकते हैं। अर्थात् सातवें मास में उपर्युक्त सब कर्म किये जा सकते हैं ॥१५४॥

दष्टा सर्पेण पीता वा या विषं गर्भिणी नृप ! ।। १५५ ।।
वमनादिर्विषघ्नैस्तु संसृष्टः स्यादुपक्रमः।

जिस गर्भवती स्त्री को सांप ने काट लिया हो अथवा उसने कोई विषपान कर लिया हो उसकी विषनाशक वामक ओषधियों के द्वारा संसर्जन क्रम से चिकित्सा करनी चाहिये ॥१५५॥

पाठाऽमृता सोमवल्कं द्वे सहे कुटजं तथा ।। १५६ ।।
क्षीरक्वथितमेतत्तु पेयं नार्या विषापहम्।

पाठा, गिलोय, सोमवल्क (श्वेत खदिर), दोनों सहा (सहा तथा अतिसहा) तथा कुटज—इसमें दूध डालकर उसका क्षीरपाक करके क्वाथ बनाकर पिलाये। यह क्वाथ विष को नष्ट करता है ॥१५६॥

शिरीषं पाटलीमूलं तण्डुलीयकमैव च ।। १५७ ।।
सिन्दुवारितमूलं च मूलं सहचरस्य च। निष्क्वाथ्य साधयेत् पेयां प्रक्षुद्रां विषनाशिनीम् ।। १५८ ।।

शिरीष, पाटलामूल, चौलाई तथा निर्गुण्डी तथा सहचर (नीलझिण्टी काला बांसा) की जड़-इनका क्वाथ बनाकर पतली पेया बनाये-यह विष को नष्ट करती है ॥१५७-१५८॥

खडयूषाधिकं चापि युक्त्याऽन्नमशितं हितम्। द्वितीये वक्ष्यते यच्च स्थाने तच्चापि कारयेत् ।। १५९ ।।

इसमें खडयूष तथा युक्तिपूर्वक सेवन किया गया अन्न हितकर होता है। तथा इस विषय में अन्य स्थानों पर भी जो कुछ कहा जायगा उन सबों का प्रयोग करना चाहिये ॥१५९॥

गर्भिणी दुर्बलाकारा या भवत्यासिता सती। ज्वरश्चाभिद्रवत्येनां तस्या गर्भो विपद्यते ।। १६० ।।

जो गर्भवती स्त्री दुर्बल तथा एकदम सफेद (पाण्डु वर्ण वाली) हो जाती है तथा उसे ज्वर होने लगे। उसका गर्भ नष्ट हो जाता है ॥१६०॥

बहु भुङ्क्ते तु याऽत्यर्थं बहुशो बहुमूर्च्छिता। भवेत्तस्याः पतेद्गर्भो गर्भिण्यास्तु न संशयः ।। १६१ ।।

जो गर्भिणी स्त्री बहुत खाती हो, बार २ खाती हो तथा इतना खाती हो कि खाते २ बार २ मूर्च्छित हो जाती हो उस स्त्री का निःसन्देह गर्भपात हो जाता है ॥१६१॥

४६२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

नेत्रे मुस्तोत्थिताकारे कर्णौ पादौ च शीतलौ। केशाश्च जटिला यस्यास्तस्या गर्भो विपद्यते ।।१६२।।

जिस गर्भिणी स्त्री के नेत्र मोथे के समान उभरे हुए हों, कान तथा पैर ठण्डे पड़े हुए हों तथा बाल जटिल (वक्र) हों उसका गर्भ नष्ट हो जाता है ॥१६२॥

उपरिष्टात्तु यो नाभ्या उभे पार्श्वे निषेवते। मध्ये वा तिष्ठते नार्याः सोऽपि गर्भो विपद्यते ।।१६३।।

जो गर्भ स्त्री के पेट में नाभि के ऊपर दोनों पार्श्वों में अथवा मध्य में स्थित होता है वह गर्भ भी नष्ट हो जाता है ॥

रुक् सन्धिमोक्षे यस्याः स्यान्मृष्टान्ने चारुचिस्तथा। निश्चेष्टस्वप्रकामायास्तस्या गर्भो विपद्यते ।।१६४।।

जिस स्त्री के सन्धिबन्धनों में पीडा होती हो तथा अन्न में अरुचि हो एवं चेष्टा से शून्य तथा अधिक होने की इच्छा वाली उस स्त्री का गर्भ नष्ट हो जाता है ॥१६४॥

सन्धिशोथोऽङ्गपाकश्च विक्रामश्च¹ गुरुर्भवेत्। यस्यास्तस्याः सुतो जातो म्रियते नात्र संशयः ।।१६५।।

जिस स्त्री के सन्धियों में शोथ हो जाये, अङ्गों में पाक हो जाये तथा पदन्यास भारी हो जाये अर्थात् वह कष्ट पूर्वक चल सके-उसका उत्पन्न हुआ पुत्र निःसन्देह मर जाता है ।।

शोचन्त्याः परिदेविन्याः प्रध्यायिन्यास्तथैव च। अङ्गुलीस्फोटशीलाया जातः पुत्रो न जीवति ।।१६६।।

जो स्त्री गर्भावस्था में बहुत शोक, दुःख तथा चिन्ता करती हो और जो अङ्गुलियों को चटकावती रहती हो—उसका उत्पन्न हुआ पुत्र जीवित नहीं रहता है ॥१६६॥

दुर्गन्धि च पयो यस्या जटिलाश्च शिरोरुहाः । मलिनाश्च ततस्तस्या जातः पुत्रो न जीवति ।।१६७।।

जिसका दूध दुर्गन्धियुक्त हो तथा जिसके बाल जटिल तथा मैले हों उसका उत्पन्न हुआ पुत्र जीवित नहीं रहता है ॥

पूतिगन्धि मुखं यस्याः शूलं चैवोपजायते। निद्रा वाऽभिद्रवत्येनां मूढगर्भा न जीवति ।।१६८।।

जिसके मुख में से दुर्गन्धि आती हो, पेट में शूल (वेदना) होती हो तथा सदा नींद आती रहती हो-वह मूढ गर्भ वाली स्त्री जीवित नहीं रहती है।

वक्तव्य—मूढ गर्भ उस गर्भ को कहते हैं जो सम्पूर्ण अवयवों से युक्त होता हुआ भी अपत्य मार्ग में अयोग्य (अस्वाभाविक) रीति से उपस्थित हो जाये। अर्थात् Mal-Presentation of foetus को मूढगर्भ कहते हैं। कहा भी है—सर्वावयवसंपूर्णो मनोबुद्ध्यादिसंयुतः। विगुणापानसंमूढो मूढगर्भोऽभिधीयते ।। गर्भावस्था में गर्भ की स्वाभाविक स्थिति का चरक शा. अ. ६ में बड़ा सुन्दर वर्णन किया है—गर्भस्तु खलु मातुः पृष्ठाभिमुख ऊर्ध्वशिराः सङ्कुच्याङ्गान्यस्ते जरायुवृतः कुक्षौ। स चोपस्थितकाले जन्मनि प्रसूतिमारुतयोगात् परिवृत्त्यावाक्शिरा निष्क्रामत्यपत्यपथेन। एषा प्रकृतिः, विकृतिः पुनरतोऽन्यथा। अर्थात् प्रसवावस्थां में गर्भ (Vertex Presentation) से गर्भाशय से बाहर आता है। अर्थात् उसका शिर नीचे होता है तथा चूतड़ ऊपर को होते हैं। तथा क्रमशः सिर, ग्रीवा, कन्धे, ऊर्ध्वशाखायें, उदर, चूतड़ तथा अधोशाखायें क्रमशः बाहर निकलती हैं। यह उसका स्वाभाविक मार्ग है। प्रसव के समय इस उपर्युक्त अवस्था के अतिरिक्त शेष सब अवस्थायें मूढगर्भ समझी जाती हैं ॥१६८॥

मयूरग्रीवसंकाशं या पश्यति हुताशनम्। शूनपादमुखी चैव मूढगर्भा न जीवति ।।१६९।।


१. पादन्यास इत्यर्थः । दुःखेन मादन्यास इति यावत् ।

अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४६३

जो गर्भिणी स्त्री अग्नि को मोर की गरदन के समान नीली देखती है तथा उसके पैर और मुख सूजे हुए हों-वह मूढगर्भ वाली स्त्री जीवित नहीं रहती है ॥१६९॥

पार्श्वशूलं च तृष्णा च संज्ञानाशस्तथैव च।
श्वासश्च वर्त्मरोधश्च यस्याः साऽपि न जीवति ॥१७०॥

जिस गर्भिणी स्त्री को पार्श्वशूल, तृष्णा, संज्ञानाश, श्वास तथा मार्गों (रसवाही अथवा अन्नमार्ग) का अवरोध हो जाय वह स्त्री भी जीवित नहीं रहती है ॥१७०॥

कटिग्रहो योनिशूलं पूतिगन्धि मुखं तथा।
संज्ञानाशः प्रलापो वा गर्भिण्याः सा न जीवति ॥१७१॥

जिस गर्भिणी स्त्री को कटिग्रह, योनिशूल, मुख से दुर्गन्धि आना, संज्ञानाश तथा प्रलाप (Delirium) हो जाय वह स्त्री जीवित नहीं रहती है ॥१७१॥

नासा तु काकवद्यस्याः स्त्रस्तनेत्रा च या भवेत्।
तथा शकुन्तगन्धा च गर्भः शस्त्रेण मुच्यते ॥१७२॥

जिस गर्भवती स्त्री की नाक कौए की तरह हो, जिसके नेत्र कांपते हों तथा जिसमें से पक्षी की गन्ध आती हो उस स्त्री का गर्भ शस्त्रों के द्वारा बाहर निकालना पड़ता है। अर्थात् उसके गर्भ को बाहर निकालने के लिये उसका आपरेशन करना पड़ता है ॥१७२॥

अजाश्वगन्धा श्वेता या मायूरं मांसमिच्छति । गर्भस्तस्यापि शस्त्रेण नार्या निर्ह्रियते नृप ! ॥१७३॥

हे राजन् ! जिस गर्भवती स्त्री में से बकरी अथवा घोड़े की गन्ध आती हो, जो सफेद (पाण्डु) हो गई हो, जो मोर का मांस खाना चाहती हो-उस स्त्री का गर्भ भी शस्त्रों के द्वारा बाहर निकालना पड़ता है ॥१७३॥

रक्तवस्त्रपरीधाना रक्तमाल्यानुलेपना । स्मयते सा शयाना वा श्मशानं याऽधिरोहति ॥१७४॥
मूढगर्भा सगर्भा वा गर्भिणी सा विनश्यति ।

जो गर्भिणी स्त्री लाल वस्त्रों को धारण करती है, लाल मालायें पहनती है, सोते हुए जो मुस्कराती है अथवा श्मशान की ओर जाती है—वह मूढगर्भ वाली स्त्री. गर्भासहित नष्ट हो जाती है ॥१७४॥

खरं वराहं महिषं श्वानमुष्ट्रं तथैव च ॥१७५॥
स्वप्नेऽधिरोहते या तु सगर्भा सा विनश्यति ।

जो गर्भवती स्त्री स्वप्न में गदहे, सूअर, भैंस, कुत्ते अथवा ऊंट की सवारी करती है-वह स्त्री गर्भासहित नष्ट हो जाती है ॥

नित्यस्नाता च मृष्टा च शुक्लवस्त्रधरा शुचिः ॥१७६॥
देवविप्रपरा सौम्या गर्भिणी तु सदा भवेत् ।

गर्भिणी स्त्री नित्य स्नान करके, शरीर पोंछकर, श्वेत वस्त्रों को धारण करके तथा पवित्र और सौम्य होकर सदा देवताओं तथा ब्राह्मणों की पूजा करे ॥१७६॥

बहुपुत्रामनन्तां च ईश्वरीं मुदितां तथा ॥१७७॥

५२ का.सं.

४६४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]

ब्राह्मीं च सहदेवां च तथा चैवेन्द्रवारुणीम् । जीवकर्षभकौ भार्गी समङ्गां च तथैव च ॥१७८॥ रोहपादान् वटशुङ्गानात्मगुप्तां तथैव च । अरिष्टं पूतनां केशीं शतवीर्यां च पार्थिव ! ॥१७९॥ सहस्रवीर्यां चैतानि प्राजापत्येन संहरेत् । संदधेतथ पुष्येण धारयेदुत्तरेषु च ॥१८०॥

हे राजन् ! गर्भिणी स्त्री की चाहिये कि वह कण्टकारी, अनन्तमूल, शिवलिङ्गी, ब्राह्मी, सहदेवी, इन्द्रवारुणी, जीवक, ऋषभक, भारंगी, मजीठ, रोहपाद, वटाङ्कुर, कौंच, नीम, पूतना (हरड़), केशी (सुगन्ध जटामांसी-कुछ लोक शतावरी का ग्रहण करते हैं), शतवीर्या (शतावरी) तथा सहस्रवीर्या (श्वेत दूर्वा) आदि ओषधियों को प्रजापत्य विधि से उखाड़े तथा उसके बाद पुष्य नक्षत्र में उनको धारण करे ॥१७७-१८०॥

त्रैवृत्तं तु मणिं कृत्वा तं श्रोण्यां गर्भिणी सदा । प्रजाता शिरसा राजन् ! धारयेत् कारयेत्तथा ॥१८१॥ सूतिकाया विशेषेण रक्षोघ्नानि हितानि च ।

हे राजन् ! गर्भिणी स्त्री को चाहिये कि त्रिवृत् की मणि बनाकर वह श्रोणि में धारण करे । प्रसव के बाद फिर वह उसे सिर पर धारण करे । तथा प्रसूता स्त्री के लिये विशेषरूप से हितकर एवं रक्षोघ्न विधान का पालन करना चाहिये ॥१८१॥

ज्वराद्यानां विंकाराणां यत्र यत्रेह लक्षणम् ॥१८२॥ अन्नादानां प्रवक्ष्यामि तज्ज्ञेयं गर्भिणीष्वपि । इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥१८३॥

(इति) खिलेष्वन्तर्वत्नीचिकित्सितं नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥


ज्वर आदि विकारों के जो २ लक्षण अन्नाद (अन्न का सेवन करने वाले-दो वर्ष से बड़े) बालकों के कहे जायेंगे गर्भिणी के भी वे ही लक्षण समझने चाहिये ।

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१८२-१८३॥

(इति) खिलेस्त्वन्तर्वत्नीचिकित्सितं नाम दशमोऽध्यायः ॥


सूतिकोपक्रमणीयाध्याय एकादशः ।

अथातः सूतिकोपक्रमणीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम सूतिकोपक्रमणीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

उपक्रमं तु सूतानां सविशेषमतः परम् । संप्रवक्ष्यामि कात्स्न्र्येन तन्निबोध यथाक्रमम् ॥३॥

अब मैं विस्तार से प्रसूता स्त्रियों की विशेष चिकित्सा का वर्णन करूंगा । उसे तू क्रमशः सुन ॥३॥

सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४६५

गर्भात् प्रभृति सूतायां भिषग्भवति कार्यवान् । कथं नु काले संपूर्णे सूयेदित्यपरापर^१म् ॥४॥ प्राप्ते प्रसवकाले च भयमुत्पद्यते यतः । अस्मिन्नेकः स्थितः पादो भवेदन्यो यमक्ष^२ये ॥५॥

प्रसूता स्त्रियों में चिकित्सक गर्भ धारण काल से लेकर प्रसव पर्यन्त इसी कार्य (चिन्ता) में लगा रहता है कि कब उसे पूर्ण समय (९ मास) व्यतीत होने पर उत्तरोत्तर प्रसव हो जाये तथा प्रसव काल के उपस्थित होने पर और भी भय रहता है । उस समय उस स्त्री का एक पैर इस लोक में तथा दूसरा यमलोक में होता है । अर्थात् गर्भधारण काल से प्रारंभ करके जब तक उसे प्रसव नहीं हो जाता तब तक वैद्य को सदा यही चिन्ता लगी रहती है कि किसी प्रकार विना विघ्न के कुशलपूर्वक यह कार्य सम्पन्न हो जाय । क्योंकि तबतक सदा किसी न किसी उपद्रव का भय बना ही रहती है । तथा प्रसव की अवस्था और भी भयंकर होती है । यह समय बड़ा ही (Critical) होता है । इस समय स्त्री के लिये जीवन तथा मृत्यु का प्रश्न होता है । बहुत सी स्त्रियों को प्रसव अत्यन्त कष्टपूर्वक होता है तथा कितने को तो इस समय प्राणों तक से भी हाथ धोना पड़ता है । यह अवस्था विशेषकर प्रथम प्रसव (Primipara) में होती है । अगले प्रसवों में इतना भय नहीं रहता है ॥४-५॥

सूतायाश्चापि तत्र स्यादपरा चेन्न निर्गता । प्रसूताऽपि न सूता स्त्री भवत्येवं गते सति ॥६॥

प्रसूता स्त्री की भी यदि अपरा (Placenta) न गिरे तो उस अवस्था में प्रसूता स्त्री भी अप्रसूता के ही समान होती है । अर्थात् यदि सुखपूर्वक प्रसव होने के बाद भी किसी कारण से अपरा नहीं गिर पाती है तो सब व्यर्थ है । उसे उस अवस्था में और भी अधिक कष्ट होता है ॥६॥

दुष्प्रजातामयाः सन्ति चतुःषष्टिरिति स्थितिः । योनिर्भ्रष्टा क्षता चैव विभिन्ना मूत्रसङ्गिनी ॥७॥ सशोफस्त्राविणी चैव प्रसुप्ता वेदनावती । पार्श्वपृष्ठकटीशूलं हृदि शूलं विषूचिका ॥८॥ प्लीहा महोदरत्वं च शाखावातोऽङ्गमर्दकः । भ्रूक्षेपको हनुस्तम्भो मन्यास्तम्भोऽपतानकः । (इति ताडपत्रपुस्तके २२६ तमं पत्रम् ।) मक्कल्लो विद्रधिः शोफः प्रलापोन्मादकामलाः ॥९॥ दौर्बल्यं भ्रमली कार्श्यं भक्तद्वेषोऽविपाचकः । ज्वरातिसारौ वैसर्पश्छर्दिस्तृष्णा प्रवाहिका ॥१०॥ हिक्का श्वासश्च कासश्च पाण्डुर्गुल्यश्च रक्तजः । आनाहाध्मापने चोभे वर्चोमूत्रग्रहावपि ॥११॥ मुखरोगोऽक्षिरोगश्च प्रतिश्यायगलग्रहौ । राजयक्ष्माऽर्दितं कम्पः कर्णस्त्रावः प्रजागरः ॥१२॥ उष्णवातो ग्रहावाधस्तनरोगोऽथ रोहिणी । वाताष्ठीला वातगुल्मरक्तपित्तविचर्चिकाः ॥१३॥

दुष्प्रजाता (यदि सम्यक् प्रकार से प्रसव न हो तो उस) स्त्री को ६४ रोग होते हैं । ६४ रोगों की संख्या केवल उपलक्षण मात्र है । इससे अतिरिक्त रोग भी हो सकते हैं । वे रोग निम्नहैं— १. योनिभ्रष्ट, २. योनिक्षत, ३. योनिभेदन, ४. मूत्रसङ्ग (मूत्र की रुकावट), ५. शोथ, ६. योनि से स्राव, ७. प्रसुप्ता, (शरीर का सोया हुआ सा-सुन्न सा रहना), ८. वेदना, ९. पार्श्वशूल, १०. पृष्ठशूल, ११. कटिशूल, १२. हृच्छूल, १३. विषूचिका, १४. प्लीहा, १५. महोदर (पेट का बड़ा होना), १६. शाखावात, १७. अङ्गमर्द, १८. भ्रूक्षेप, १९. हनुस्तम्भ, २०. मन्यास्तम्भ, २१. अपतानक, २२. मक्कल्ल (After pains), २३. विद्रधि, २४. शोफ, २५. प्रलाप, २६. उन्माद, २७. कामला, २८. दुर्बलता, २९. भ्रम (शिरोभ्रम आदि), ३०. कृशता, ३१. भक्तद्वेष (भोजन में अरुचि), ३२. अविपाक (भोजन का न पचना), ३३.


१. उत्तरोत्तरमित्यर्थः ।
२. यमलोके इत्यर्थः ।

४६६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]

ज्वर, ३४. अतिसार, ३५. विसर्प, ३६ छर्दि (वमन), ३७. तृष्णा, ३८. प्रवाहिका, ३९. हिक्का, ४०. श्वास, ४१. कास, ४२. पाण्डु ४३. रक्तगुल्म, ४४. आनाह, ४५. आध्मान, ४६. वर्चोग्रह (मलबन्ध), ४७. मूत्रग्रह, ४८. मुखरोग, ४९. अक्षिरोग, ५०. प्रतिश्याय, ५१. गलग्रह, ५२. राजयक्ष्मा, ५३. अर्दित, ५४. कम्पन, ५५. कर्णस्राव, ५६. प्रजागर (Insomnia), ५७. उष्णवात, ५८. ग्रहाबाध (ग्रहरोगों का भय), ५९. स्तनरोग, ६०. रोहिणी, ६१. वाताष्ठीला, ६२. वातगुल्म, ६३. रक्तपित्त, ६४. विचर्चिका ॥७-१३॥

इत्येते सूतिकारोगाश्चतुःषष्टिरुदाहृताः । तेभ्यः सर्वेभ्य एवासौ रक्षितव्या कथं त्विति ॥१४॥

इस प्रकार ये ६४ रोग कहे गये हैं । उन सब रोगों से उस प्रसूता स्त्री की किस प्रकार रक्षा की जाय यह एक विचारणीय प्रश्न होता है ॥१४॥

तद्विदामपि संमोहो भिषजामुपजायते । किं पुनर्य्येऽल्पमतयः परतन्त्रोपशिक्षिताः ॥१५॥

इस विषय में ज्ञानी वैद्यों को भी मतिभ्रम हो जाता है, तब जो कम बुद्धि वाले हैं तथा जिन्होंने दूसरे सम्प्रदायों के ग्रन्थों से शिक्षा ग्रहण की है उनका तो फिर कहना ही क्या है ।

तस्मात् सुनिश्चितार्थेन तद्विद्येनाऽनुदर्शिना । अप्रमत्तेन संभाव्यं सूतिकानामुपक्रमे ॥१६॥

इसलिये प्रसूता स्त्रियों में वैद्य को निश्चित अर्थ (विषय) को जानने वाला, तद्विद्य, अनुदर्शी (सब कुछ देखने वाला) होना चाहिये तथा सावधान हो कर चिकित्सा करनी चाहिये ।

तदुपक्रमसामान्यं विशेषापक्रमं तथा । वक्ष्यामि व्यासतो देशविदेशकुलसात्म्यतः ॥१७॥

अब मैं देश, विदेश तथा कुल सात्म्य के अनुसार उनकी सामान्य तथा विशेष चिकित्सा को कहूंगा ॥१७॥

प्रजातमात्रामाश्वास्यसूतां शक्ला¹ विजा(प्रसा)विका(?) । न्युब्जां शयानां संवाह्य पृष्ठे संश्लिष्य कुक्षिणा ॥१८॥ पीडयेद्धृष्टमुदरं गर्भदोषप्रवृत्तये । महताऽदुष्टपट्टेन कुक्षिपाश्र्वें च वेष्टयेत् ॥१९॥ तेनोदरं स्वसंस्थानं याति वायुश्च शाम्यति ।

प्रसव कराने वाली स्त्री को चाहिये कि वह मधुर भाषण करने वाली हो तथा वह प्रसव होते ही प्रसूता को आश्वासन देकर अधोमुख लेटी हुई उस प्रसूता की पीठ में संवाहन (मुट्ठी या चापी मारना-धीरे २ दबाना) करके फिर गर्भ के बाद बचे हुए दोषों को निकालने के लिये कुक्षि पर मालिश करके ढीले हुए पेट का पीडन करे-उसे दबाये । फिर एक साफ सुथरा कपड़ा कुक्षि के चारों ओर लपेट दे । इससे ढीला हुआ पेट अपने स्थान पर चला जाता है तथा वायु की शान्ति हो जाती है । अर्थात् पेट को बांध देने से वह ढीला नहीं रहता जिससे वायु का प्रवेश नहीं हो सकता है । तथा इससे ढीली हुई उदर की मांसपेशियों को बहुत आराम मिलता है । इसी प्रकार चरक शा. अ. ८ में भी कहा है ॥१८-१९॥

चर्मावनद्धामासन्दीं बलातैलोष्णपूरिताम् ॥२०॥ अप्यासीत सदा सूता तथा योनिः प्रसीदति । प्रियङ्गुकानां कृसरैः स्वभ्यक्तां स्वेदयेत्ततः ॥२१॥

प्रसूता स्त्री को चाहिये कि वह एक गरम २ बला तैल से भरी हुई तथा चमड़े से मढ़ी हुई आसन्दी (लघु खट्टिका) में बैठे । इससे उसकी योनि निर्मल हो जाती है । उसके बाद तैल की मालिश करके प्रियङ्गु आदि की गरम २ कृशरा (खिचड़ी) बनाकर उससे उसका स्वेदन करे ।


१. 'शल्कः प्रियंवदे' इत्यमरः, प्रियवदा प्रसाविका इति स्यात् ।

सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४६७

वक्तव्य—कृशरा की परिभाषा भावप्रकाश में निम्न दी है—तण्डुला दालिसंमिश्रा लवणार्द्रकहिंंगुभिः । संयुक्ताः सलिले सिद्धाः कृशरा कथिता बुधैः ॥ यवागू की विधि से ही इसे पकाना चाहिये ॥२०-२१॥

स्विन्नामुष्णाम्बुना स्नातां विश्रान्तां विगतक्लमाम् । कुष्ठगुग्गुल्वल्वगुरुभिर्धूपयेद्घृतसंयुतैः ॥२२॥

तदुपरान्त स्वेदन हो जाने के बाद उसे उष्ण जल से स्नान कराके विश्राम देकर थकावट दूर हो जाने के बाद कुष्ठ, गूगल तथा अगर को घृत में मिलाकर उससे शरीर का धूपन करना चाहिये ॥२२॥

ततोऽग्निबलव(वि)द्वीक्ष्य त्र्यहं पञ्चाहमेव वा । मण्डानुपानमन्वक्षं पिबेत् स्नेहं हिताशिनी ॥२३॥

तब अग्निबल को जानने वाली स्त्री को अपनी अवस्था देख कर तीन या पांच दिन तक मण्ड का सेवन करना चाहिये । इसके बाद हितकर भोजन करने वाली स्त्री को स्नेह का पान करना चाहिये । यवादि से सिद्ध किये हुए सिक्थ (ठोस भाग) से रहित द्रव को मण्ड कहते हैं । सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है—सिक्थकैर्विरहितो मण्डः ....... मदनपालनिघण्टु में कहा है—"मण्डश्र्चतुर्दशगुणे सिद्धस्तोये त्वसिक्थकः । उसे Barm of Barley or Rice कह सकते हैं ॥२३॥

स्नेहव्युपरमेऽश्रीयादल्पस्नेहामसैन्धवाम् । यवागूं त्र्यहमेवात्र पिप्पलीनागराश्रिताम् ॥२४॥ स्याद्व्यपेतौषधा पश्चात् सस्नेहलवणोत्तरा ।

स्नेह के जीर्ण हो जाने पर तीन दिन तक पिप्पली और सोंठ से बनी हुई यवागू का सेवन करना चाहिये जिसमें थोड़ा स्नेह डला हुआ हो तथा लवण बिलकुल न हो । तथा उसके बाद ओषधियों से बनी हुई तथा जिसमें स्नेह और लवण पर्याप्त मात्रा में डला हो—यवागू का सेवन करना चाहिये । चरक शा. अ. ८ में कहा है—जीर्णे तु स्नेह पिप्पल्यादिभिरेव सिद्धां यवागूं सुस्निग्धां द्रवां मात्रशः पाययेत् ॥२४॥

कुलत्थयूषः सस्नेहलवणाम्लस्ततः परम् ॥२५॥ तथैव जाङ्गलरसः शाकानीमानि चाप्यतः । घृतभृष्टानि कूष्माण्डमूलकैर्वारुकाणि च ॥२६॥

फिर स्नेह, लवण और अम्ल (खटाई) डला हुआ कुलत्थ का यूष तथा जांगल मांसरस का सेवन करे । उसके बाद फिर घी में तले हुए कूष्माण्ड, मूली तथा ककड़ी Cucumber के शाक खाये ॥२५-२६॥

स्नेहस्वेदौ च सेवेत मासमेकममन्दि्रता । उष्णोदकोपचारं च स्वस्थवृत्तमतः परम् ॥२७॥

प्रसव के बाद उस स्त्री को एक मास तक प्रमाद रहित हो कर स्नेहन, स्वेदन तथा उष्णजल का सेवन करना चाहिये । इसके बाद स्वस्थ व्यक्ति के आहार-विहार का सेवन करे । अर्थात् प्रसव के बाद एक मास तक उपर्युक्त विशेष आहार-विहार आदि का सेवन करना चाहिये । तदुपरान्त वह एक स्वस्थ व्यक्ति के समान सामान्य आहार-विहार का ग्रहण कर सकती है । इस एक मास तक वह प्रसूता कहलाती है ॥२७॥

त्रिविधं देशमाश्रित्य वक्ष्यामि त्रिविधं विधिम् । आनूपदेशे भूयिष्ठं वातश्लेष्मात्मका गदाः ॥२८॥ तत्राभिष्यन्दभूयस्त्वादादौ स्नेहो विगर्हितः । मण्डादिरत्र कर्तव्यः संसर्गोऽग्निबलावहः ॥२९॥ स्वेदो निवातशयनं सर्वमुष्णं च शस्यते ।

तीन प्रकार के देश के अनुसार मैं तीन प्रकार के स्वस्थवृत्त का वर्णन करूंगा । देश तीन प्रकार का होता है—१. आनूप, २. जांगल, ३. साधारण सुश्रुत सू. अ. ३५ में कहा है—'देशस्त्वानूपो जाङ्गलः साधारण इति' । आनूपदेश—आनूपदेश में मुख्यरूप से वात तथा कफ के रोग होते हैं । वहां पर क्लेद की प्रधानता से प्रारम्भ में स्नेह निन्दित माना

४६८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]

गया है। इस अवस्था में अग्नि-बल को बढ़ाने वाला मण्ड आदि का संसर्जन क्रम कराना चाहिये। वहां पर स्वेद, निवात (जहां सीधी हवा न आती हो) स्थान में शयन तथा आहार-विहार आदि सम्पूर्ण उष्ण विधि करनी चाहिये। आनूप देश से अभिप्राय जल प्रधान स्थान से है। सुश्रुत सू. अ. ३५ में कहा है—'तत्र बहूदकनिम्नोन्नतनदीवर्षगहनो मृदुशीतानिलो बहुमहापर्वतवृक्षो मृदुसुकुमारोपचितशरीरमनुष्यप्रायः कफवातरोगभूयिष्ठश्चानूपः'।'

नियतं जाङ्गले देशे वातपित्तात्मका गदाः ।।३०।।
तदत्र स्नेहसात्म्यत्वात् स्नेहादिः स्यादुपक्रमः। कार्यः प्रजातमात्राया विशेषश्चात्र बुध्यते ।।३१।।

जांगल देश—जांगल देश में वात और पित्त के रोग होते हैं। यहां पर स्नेह शरीर के लिये सात्म्य होने के कारण सद्यः प्रसूता स्त्री की स्नेह आदि के द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये। उसका विशेष विवरण आगे दिया जायगा। जांगल देश उसे कहते हैं जहां जलीय अंश की कमी हो तथा जंगल भूयिष्ठ हो। सुश्रुत सू. अ. ३५ में कहा है—'आकाशसमः प्रविरलाल्पकण्टकिवृक्षप्रायोऽल्पवर्षप्रस्रवणोदपानोदकप्राय उष्णदारुणवातः प्रविरलाल्पशैलः स्थिरकृशशरीरमनुष्यप्रायो वातपित्तरोगभूयिष्ठश्च जाङ्गलः'।।

कुमारप्रसवे तैलं कुमारीप्रसवे घृतम्। पिबेज्जीर्णे यवागूं च दीपनीयोपसंस्कृताम् ।।३२।।
पञ्चाहं सप्तरात्रं वा ततो मण्डाद्युपक्रमः।

प्रसूता स्त्री को पुत्र उत्पन्न होने पर तैल तथा पुत्री उत्पन्न होने पर घृत का पान करना चाहिये तथा घृत के जीर्ण होने पर पांच या सात दिन तक दीपनीय द्रव्यों से सिद्ध की हुई यवागू पीनी चाहिये। उसके बाद मण्ड आदि का क्रम होना चाहिये ।।३२।।

देशे साधारणे चास्या हितः साधारणो विधिः ।।३३।।

साधारण देश—साधारण देश में प्रसूता स्त्री के लिये साधारण विधि हितकर होती है। साधारण देश का लक्षण सुश्रुत में कहा है—'उभयदेशलक्षणः साधारण इति'। अर्थात् आनूप और जांगल दोनों के लक्षण जिसमें विद्यमान हों उसे साधारण समझा जाता है ।।३३।।

वैदेश्याश्च प्रयच्छन्ति विविधा म्लेच्छजातयः। रक्तं मांसस्य निर्यूहं कन्दमूलफलानि च ।।३४।।

अनेक विदेशी म्लेच्छ जाति के लोग इस अवस्था में रक्त, मांसनिर्यूह तथा कन्द मूल-फल आदि का व्यवहार कराते हैं।

कुलसात्म्यं च बुध्येत यस्मिन् यस्मिन् यथा यथा। औचित्यात् कुलसात्म्यस्य तत्तथैवानुवर्तते ।।३५।।

जिस २ देश में जैसा २ कुलसात्म्य हो उसके औचित्य को देखकर उसके अनुसार वैसा २ आचरण किया जाता है। अर्थात् जिस कुल या देश में जो व्यवहार उचित समझा जाता है अथवा जिसका प्रचलन हो–उसके अनुसार ही आचरण करना चाहिये ।।३५।।

अतो नैकान्तिकत्वाच्च सूतिकोपक्रमस्य च। देशं च जातिसात्म्यं च संप्रधार्य प्रयोजयेत् ।।३६।।

इसलिये सूतिका (प्रसूता स्त्री) की चिकित्सा को एकान्तिक (एकदेशीय) न समझे तथा देश और जाति सात्म्य को दृष्टि में रखते हुए उनका प्रयोग करे ।।३६।।

उक्तं तद्व्याधिभैषज्यं दुष्प्रजातोपचारिके। केषांचिदिह वक्ष्यामि व्याधीनामत उत्तरम् ।।३७।।

सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४६९

दुष्प्रजाता स्त्री के उपचारों में उन २ रोगों की चिकित्सा दी गई है। यहां मैं कुछ थोड़े से रोगों की चिकित्सा का वर्णन करूंगा ॥३७॥

सर्वेषामेव रोगाणां ज्वरः कष्टतमो मतः । तदस्यादौ विधिं वक्ष्ये निदानाकृतिभेषजैः ।।३८।।

सम्पूर्ण रोगों में ज्वर सबसे अधिक कष्टदायी रोग माना जाता है। इसलिये सबसे पहले मैं निदान, आकृति तथा ओषधि के द्वारा उस ज्वर की चिकित्सा का वर्णन करूंगा ॥३८॥

षड्विधस्तु प्रसूतानां नारीणां जायते ज्वरः । निजागन्तुविभागेन निदानं तस्य मे शृणु ।।३९।।

निज तथा आगन्तु भेद से प्रसूता स्त्रियों को ६ प्रकार का ज्वर हुआ करता है। उस ज्वर का तू कारण सुन।

वक्तव्य—इसी अध्याय में आगे निम्न ६ ज्वर दिये हैं—१. वातिक, २. पैत्तिक, ३ श्लैष्मिक, ४. सान्निपातिक, ५. स्तन्योत्थ, ६. ग्रहोत्थ ॥३९॥

वेगसंधारणाद्रौक्ष्याद्व्यायामादत्यसृक्क्षयात् । शोकादत्यग्निसंतापात् कट्वम्लोष्णातिसेवनात् ।।४०।।
दिवास्वप्नात् पुरोवाताद्गुर्विष्यन्दिभोजनात् । स्तन्यागमाद्ग्रहाबाधादजीर्णाद्दुष्प्रजायनात् ।।४१।।
ज्वरः संजायते नार्याः षड्विधो हेतुभेदतः ।

ज्वर का निदान—उपस्थित वेगों को रोकने, रूक्षता, व्यायाम, रक्त के अत्यधिक क्षय, शोक, अधिक अग्नि की गर्मी, अधिक कटु एवं अम्ल रस युक्त तथा उष्ण द्रव्यों के सेवन, दिवा स्वप्न, पुरोवात (पूर्व दिशा की वायु), गुरु और अभिष्यन्दि भोजन, दुग्ध की उत्पत्ति, ग्रहाबाधा (ग्रह रोगों का भय), अजीर्ण, तथा सम्यक् प्रकार से प्रसव न होने इत्यादि कारणों से प्रसूता स्त्रियों को कारण के भेद के अनुसार ६ प्रकार का ज्वर हो जाता है ॥४०-४१॥

स एव पूर्वरूपेषु व्यभिचीर्णो विरोधिभिः ।।४२।।
संसृष्टैः स्नेहशीताम्बुस्नानपानाशनादिभिः । सन्निपातज्वरो घोरो जायते दुरुपक्रमः ।।४३।।

इन्हीं छओं प्रकार के ज्वरों के पूर्वरूप—इन ज्वरों के पूर्वरूप—स्नेह, शीतल जल, स्नान पान तथा अशन (भोजन) आदि परस्पर मिले हुए विरोधी कारणों से परस्पर एकदम मिले हुए होते हैं। अर्थात् उन ६ प्रकार के ज्वरों के पूर्वरूप परस्पर इतने अधिक मिले हुए होते हैं कि केवल पूर्वरूपों को देखकर उन्हें पृथक् करना अत्यन्त कठिन होता है। इनमें से सन्निपात ज्वर अत्यन्त भयंकर होता है तथा उसकी चिकित्सा भी अत्यन्त कठिनता से हो सकती है ॥४२-४३॥

तस्य तीव्राभिरावीभिः प्रततं वाहनश्रमैः । शैथिल्यं चागते देहे संक्षुब्धेष्वनिलादिषु ।।४४।।
क्लान्तेष्विन्द्रियमार्गेषु सारशून्येषु धातुषु । एकोऽपि दोषः कुपितः कृच्छ्रतो वहते महत् ।।४५।।

उस प्रसूता स्त्री की तीव्र आवियों (प्रसवकालीन वेदनाओं-Labour-Pains) से, नौ मास तक निरन्तर गर्भ को धारण किये रहने के श्रम से, (प्रसव के बाद) देह के शिथिल हो जाने के कारण, वातादि दोषों के प्रकुपित हो जाने से, सम्पूर्ण इन्द्रियों के मार्गों के (प्रसव के कारण) थक जाने से तथा सम्पूर्ण शरीर की धातुओं के प्रसव के बाद रहित हो जाने से (चरक में कहा है—विशेषतो हि शून्यशरीराः स्त्रियः प्रजाता भवन्ति) यदि एक भी दोष प्रकुपित हो जाय तो वह इस शरीर को बड़े कष्टपूर्वक धारण करती है ॥४४-४५॥

परिजीर्णं यथा वस्त्रं मलदिग्धं समन्ततः । क्लेशेन शोध्यते तज्ज्ञैः प्रदृश्य तत्तदाश्रयम् ।।४६।।
तथा शरीरं सूतायाः परिक्लिष्टं परिस्रुतम् । भृशं दोषबलैर्दिग्धं क्लेशेन परिशोध्यते ।।४७।।

४७० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]

जिस प्रकार अत्यन्त जीर्ण वस्त्र चारों ओर से मैला होने पर उस वस्त्र के आश्रय को दृष्टि में रखते हुए धोने वाले अत्यन्त कठिनता से साफ कर पाते हैं उसी प्रकार प्रसूता स्त्री के शरीर का थके हुए एवं परिस्रुत (प्रसव के समय शरीर में से बहुत से स्त्राव निकल जाते हैं) होने के कारण तथा वातादि दोषों के बल से क्षीण होने के कारण अत्यन्त कठिनता से शोधन किया जा सकता है ॥४६-४७॥

यथा च जीर्णं भवनं सर्वतः श्लथबन्धनम्।
(इति ताडपत्रपुस्तके २२७ तमं पत्रम्।)
वर्षवातविकम्प्यानामसहं स्यात्तथाविधम् ॥४८॥
तथा शरीरं सूतायाः खिन्नं प्रस्त्रवणश्रमैः । वातपित्तकफोत्यानां व्याधीनामसहं भवेत् ॥४९॥

अथवा जिस प्रकार प्राचीन मकान सम्पूर्ण बन्धन ढीले हो जाने के कारण वर्षा, वायु तथा भूकम्प आदि को सहन नहीं कर सकते हैं अर्थात् तीव्र वर्षा, वायु आदि में ढह जाते हैं उसी प्रकार प्रसूता स्त्री का शरीर भी प्रसव के श्रम से खिन्न होने के कारण वात, पित्त तथा कफ से उत्पन्न होनेवाले रोगों को सहन नहीं कर सकता है अर्थात् उनसे आक्रान्त हो जाता है ॥४८-४९॥

दोषैरेव शरीराणि धार्यन्ते सर्वदेहिनाम् । तेषु क्षीणेषु सूताया ज्वरः संतापलक्षणः ॥५०॥
देहं सन्तापयत्याशु शुष्केन्धनमिवानलः ।

वातादि दोषों के द्वारा ही सम्पूर्ण प्राणियों के शरीर धारण किये जाते हैं। प्रसूता में इन दोषों के अपने योग्य परिमाण से क्षीण हो जाने पर ताप (उष्णता-Heat) लक्षणवाला ज्वर हो जाता है। जिस प्रकार अग्नि शुष्क ईन्धन को जला देती है उसी प्रकार यह ज्वर भी सारे शरीर में सन्ताप उत्पन्न कर देता है। वात, पित्त, कफ तीनों दोष मिलकर शरीर का धारण करते हैं-इसीलिये इन्हें धातु भी कहते हैं। इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. २१ में भी कहा है ॥५०॥

तद्धेतुमात्रवृद्धानां दोषाणां तु यथोच्छ्रयम् ॥५१॥
कुर्यादुपशमं धीमान् धातूनां च प्रसादनम् ।

बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि साधारण कारणों से भी बढ़े हुए दोषों की शान्ति करे तथा शरीर की धातुओं का प्रसादन करे ॥५१॥

षड्भिर्मासैः प्रसूताया धातवो रुधिरादयः ॥५२॥
प्रत्यागच्छन्त्यरोगाया यथास्वं परिसंस्थितिम् । एतच्चान्यच्च संचिन्त्य चिकित्सां संप्रयोजयेत् ॥५३॥

रोग रहित होने पर प्रसूता स्त्री की रक्त आदि धातुएं ६ मास के अन्दर पुनः अपनी पूर्व स्वाभाविक अवस्था में लौट आती हैं। इन सब बातों को दृष्टि में रखते हुए प्रसूता स्त्री की चिकित्सा करनी चाहिये। अर्थात् प्रसव के बाद ६ मास तक प्रसूता स्त्री के दोष तथा शारीरिक धातुयें अपनी २ पूर्व अवस्था में नहीं पहुंच पाती हैं। धीरे २ करके लगभग ६ मास में वे अपनी पूर्वस्वाभाविक अवस्था में पहुंच पाती हैं ॥५२-५३॥

अतः परं ज्वराणां तु लक्षणं संप्रवक्ष्यते । विषमोष्माऽङ्गमर्दश्च जृम्भथू रोमहर्षणम् ॥५४॥
कषायविरसास्यत्वं शीतद्वेषोष्णाकामते । दन्तहर्षः प्रलापश्च शुष्कोद्गारः प्रजागरः ॥५५॥
आध्मानमङ्गसंकोचो वातज्वरनिदर्शनम् ।

सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४७१

इसके बाद अब ज्वरों के लक्षण कहे जायेंगे—वातज्वर के लक्षण—शरीर में विषमरूप से ऊष्मा (उष्णतातापांश) का होना अर्थात् कभी तापांश अधिक होता है कभी कम अथवा शरीर के किसी अवयव में तापांश कम होता है किसी में अधिक, अङ्गमर्द (अङ्गों का टूटना), जंभाई, रोमहर्ष, मुख का स्वाद कषाय अथवा विरस (फीका) होना, शीत का अच्छा न लगना, उष्णता को चाहना, दन्तहर्ष, प्रलाप (Delirium), सूखी डकार, निद्रा न आना, आध्मान तथा अङ्गसंकोच (अङ्गों का सुकड़ जाना)—ये वातज्वर के लक्षण होते हैं ॥५४-५५॥

तृष्णा दाहः प्रलापश्च वमथुः कटुकास्यता ॥५६॥
पीतास्यनखदन्ताक्षिविण्मूत्रत्वं च लक्ष्यते । कण्ठस्य शोषः सर्वं च प्रदीप्तमिव मन्यते ॥५७॥
भ्रमः शीताभिलाषश्च पित्तज्वरनिदर्शनम् ।

पित्तज्वर के लक्षण—प्यास, शरीर में दाह, प्रलाप, वमन, मुख का स्वाद कड़वा होना, मुख, नख, दांत, आंखें, मल तथा मूत्र का रंग पीला होना (पित्त के कारण), कण्ठशोष (गले का सूखना), ऐसा प्रतीत होना मानों सम्पूर्ण शरीर जल रहा है, भ्रम (चक्कर) तथा शीत पदार्थों की इच्छा करना—ये सब पित्त ज्वर के लक्षण हैं ॥५६-५७॥

उष्णाभिकामता कासः शिरोरुग्गात्रगौरवम् ॥५८॥
मन्दोष्मता प्रतिश्यायः शुक्लमूत्रपुरीषता । निद्रा तन्द्रीर्हिमद्वेषः ष्ठीवनं मधुरास्यता ॥५९॥
गात्रसादोऽन्नविद्वेषः कफज्वरनिदर्शनम् ।

श्लेष्म ज्वर के लक्षण—उष्ण पदार्थों की इच्छा करना, कास, शिर में वेदना, शरीर का भारी होना, शरीर में तापांश (Temperature) की कमी, प्रतिश्याय, मूत्र तथा मल का रंग सफेद होना, अधिक नींद आना, तन्द्रा (आलस्य), शीतपदार्थों से द्वेष अर्थात् उनकी इच्छा न करना, बार २ थूकना, मुख का स्वाद मीठा होना, शरीर का अवसाद अर्थात् शरीर का भारी होना तथा अन्न में रुचि न होना—ये सब श्लेष्म ज्वर के लक्षण हैं ॥५८-५९॥

मुहुः शीतं मुहुर्दाहो मुहुरूष्मा समोऽसमः ॥६०॥
कृच्छ्रविण्मूत्रवातत्वं वाताङ्गान्‍त्रा¹भिसंजनम् । दाहस्तृष्णा प्रलापश्च पित्ताद्विक्षिप्तचित्तता ॥६१॥
गुरुत्वं कण्ठसंरोधः कफाच्च प्रतिशीत²ता । सन्निपातज्वरस्यैतल्लक्षणं समुदाहृतम् ॥६२॥

सन्निपात ज्वर के लक्षण—कभी शीत लगता है, कभी दाह होती है, तापांश भी कभी सम तथा कभी विषम हो जाता है, मल, मूत्र तथा वायु कष्ट से सरंते हैं तथा वायु के कारण अङ्गों तथा आंतों में कष्ट का अनुभव होता है। पित्त के कारण इसमें दाह, तृष्णा, प्रलाप होते हैं तथा चित्त (मन) विक्षिप्त रहता है। तथा कफ के कारण शरीर भारी रहता है, गला रुक जाता है तथा सर्दी पर पुनः सर्दी लगती है। ये सन्निपात ज्वर के लक्षण कहे गये हैं ॥६०-६२॥

तृतीयेऽह्नि चतुर्थे वा नार्याः स्तन्यं प्रवर्तते । पयोवहानि स्रोतांसि संवृतान्यभिघट्टयेत् ॥६३॥
करोति स्तनयोः स्तम्भं पिपासां हृदयद्रवम् । कुक्षिपार्श्वकटीशूलमङ्गमर्दं शिरोरुजाम् ॥६४॥
एतत् स्तन्यागमोत्थस्य ज्वरस्योक्तं स्वलक्षणम् । स हि पीयूषसंशुद्धौ क्रममात्रेण तिष्ठति ॥६५॥

स्तन्योत्पत्ति के कारण होने वाले ज्वर के लक्षण (Milkfever or fever of Lactation)—प्रसूता स्त्री के तीसरे या चौथे दिन स्तनों में दूध आता है (प्रथम तीन दिन तक स्तनों से शुद्ध दूध नहीं निकलता अपितु खीस या Collustrum नामक गाढ़ा द्रव्य निकलता है जो गुरु होने के कारण रेचक होता है)। इससे दुग्धवाही स्रोतों के मार्ग


१. वातेन अङ्गानामन्त्राणां चाऽभिधर्षणमित्यर्थः ।
२. शैत्योपरि शैत्यमित्यर्थः ।

४७२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]

बन्द हो जाते हैं जिससे स्तनों में स्तम्भ (अकड़ाहट), पिपासा, हृदयद्रव (Palpitation of the Heart), कुक्षिशूल, पार्श्वशूल, कटिशूल, अङ्गमर्द तथा शिरोवेदना हो जाती है। ये स्तन्योत्पत्ति के कारण उत्पन्न ज्वर के अपने लक्षण कहे गये हैं। तथा दूध का शोधन होने पर क्रमशः ज्वर शान्त हो जाता है ॥६३-६५॥

ग्रहावलोकितत्रासवाताघातावधूननैः । ज्वर्यते चेत् प्रसूता स्त्री तस्य वक्ष्यामि लक्षणम् ॥६६॥ उद्वेपको निष्ठननं चक्षुषो विभ्रमः श्रमः । कम्पनं हस्तनेत्राणां हारिद्रमुखनेत्रता ॥६७॥ क्षणेन श्यावताऽज्ञानं क्षणेन च सवर्णता । सुप्रबोधः सह .... क्रोशः केशलुञ्चनम् ॥६८॥ पवनज्वररूपाणि भूयिष्ठानि करोति च । विधिर्ग्रहघ्नोऽस्य हितः क्रमो यश्चानिलज्वरे ॥६९॥

ग्रहोत्थ ज्वर के लक्षण—ग्रहों के देखने से, भय से, वायु के कारण और आघात तथा कम्पन के कारण यदि प्रसूता स्त्री को ज्वर हो जाय तो उसके लक्षण मैं कहूंगा। वे निम्न होते हैं—शरीर में वेपथु, अङ्गों में पीडा, नेत्रविभ्रम, थकावट तथा हाथों और नेत्रों में कम्पन होता है, मुख तथा नेत्रों का वर्ण हारिद्र (पीला-हल्दी के समान) हो जाता है। क्षण भर में अङ्ग कृष्णवर्ण के हो जाते हैं तथा अगले क्षण ही वर्ण ठीक हो जाता है, उस समय उसे अच्छी प्रकार ज्ञान होता है, वह चिल्लाती है, बालों को नोचती है तथा विशेषरूप से वातज्वर के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। इस अवस्था में ग्रहनाशक उपचार तथा वातज्वर की चिकित्सा करनी चाहिये ॥६६-६९॥

श्लेष्माभिष्यन्दिनीं स्थूलामक्लिन्नामल्पनिःस्रुताम् । विदग्धभक्तां स्निग्धां च लङ्घनेनोपपादयेत् ॥७०॥

यदि उस स्त्री का शरीर कफ एवं अभिष्यन्द से युक्त हो, स्थूल हो, क्लेदरहित तथा स्राव कम हुआ हो, उसका खाया हुआ भोजन विदग्ध हो जाता हो अर्थात् पूरा पाक न होता हो तो उसे स्नेहन कराकर लङ्घन का प्रयोग कराये ॥७०॥

रूक्षां निःस्रुतरक्तां च कृशां वातज्वरार्दिताम् । क्षुत्तृष्णाभिहतां क्लान्तां शमनेनोपपादयेत् ॥७१॥ तस्यास्तदहरेवेह पेयादिः क्रम इष्यते । लङ्घितायाश्च मण्डादिरित्येष द्विविधः क्रमः ॥७२॥

जो स्त्री रूक्ष हो, जिसका रक्त न निकला हो, जो कृश एवं वातज्वर से पीडित हो, जो भूख और प्यास से व्याकुल हो तथा शरीर क्लान्त हो—उसकी संशमन ओषधियों के द्वारा चिकित्सा करे। तथा उसे उसी दिन पेयादि क्रम से भोजन कराये। और जिसे लङ्घन कराया गया है उसे मण्ड आदि का भोजन कराना चाहिये। इस प्रकार यह दो प्रकार का भोजन का क्रम होता है।

वक्तव्य—पेया तथा मण्ड यवागू के भेद होते हैं। सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है—सिक्थकै रहितो मण्डः पेया सिक्थसमन्विता। अर्थात् पके हुए चावलों में से सिक्थ (ठोस भाग) को छोड़कर केवल ऊपर का द्रवभाग छान कर निकाल लिया जाय तो उस द्रवभाग को मण्ड कहते हैं। तन्त्रान्तर में कहा है—'नीरे चतुर्दशगुणे सिद्धो मण्डस्त्वसिक्थकः'। सिक्थ (ठोस भाग) से युक्त यवागू को पेया कहते हैं। यहां पर उसीप्रकार १४ गुने जल में चावलों को पकाया जाता है परन्तु पकाने के बाद उसे मण्ड की भांति छानना नहीं चाहिये। उस सिक्थ (ठोस भाग) से युक्त यवागू को पेया कहते हैं। इसमें सिक्थ (ठोस) भाग थोड़ा ही होना चाहिये अन्यथा सिक्थभाग के अधिक होने पर वह यवागू का अगला भेद विलेपी बन जाता है। कहा है—विलेपी बहुसिक्था स्याद् यवागूर्विरलद्रवा ॥७१-७२॥

पेया हि दीपयत्यग्निं धातून् संशमयत्यपि । गर्भदोषावशेषघ्नो मण्डो दोषविपाचनः ॥७३॥

पेया अग्नि को प्रदीप्त करती है तथा धातुओं का संशमन करती है। मण्ड गर्भ के अवशिष्ट दोषों को नष्ट करता है तथा दोषों का पाचन करता है ॥७३॥

तस्मात् पेया च मण्डश्च क्रमादौ विहितौ हितौ । अकृतश्च कृतश्चैव द्वित्रियूषरसौ तथा ॥७४॥

सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४७३

इसलिये चिकित्सा क्रम के प्रारम्भ में पेया और मण्ड का प्रयोग हितकर माना गया है। तथा दो-तीन दिन तक अकृत और कृत यूष तथा मांसरस का सेवन करना चाहिये।

वक्तव्य—मूंग आदि को १८ गुने पानी में पकाने से यूष बनता है। जो यूष स्नेह लवण आदि के द्वारा संस्कृत कर लिया जाता है उसे 'कृत' तथा स्नेह लवण आदि के द्वारा असंस्कृत यूष को 'अकृत' कहते हैं ॥७४॥

स्वेदोऽपतर्पणं युक्त्या पाचनौषधसेवनम्। कषायोऽभ्यञ्जनं सर्पिर्ज्वरघ्नः परमो विधिः ।।७५।।

ज्वर नाशक उपाय—स्वेद, युक्तिपूर्वक अपतर्पण, पाचन ओषधियों का सेवन, कषाय, अभ्यङ्ग एवं घृत-ये श्रेष्ठ ज्वरनाशक उपाय हैं ॥७५॥

शीतोपवासे व्यायाममायासमहिताशनम्। तद्धेतुसेवनं चैव क्षिप्रं ज्वरबलावहम् ।।७६।।

ज्वर को बढ़ाने वाले उपाय—शीत (ठण्ड लग जाना अथवा शीतल वस्तुओं का प्रयोग), उपवास, व्यायाम, परिश्रम, अहितकर भोजन तथा ज्वर को उत्पन्न करने वाले पदार्थों का सेवन करने से शीघ्र ही ज्वर के बल में वृद्धि हो जाती है अर्थात् उपर्युक्त कारणों से ज्वर की वृद्धि हो जाती है ॥७६॥

गर्भाशये च्युते नार्या दोषास्तदनुगामिनः। च्यवन्ति तस्माद्वमनं नस्यं बस्तिर्विरेचनम् ।।७७।। न कार्यमल्पदोषायाः शरीरे परिसंस्थिते। तदेव युक्तितः कार्यं वीक्ष्य दोषबलाबलम् ।।७८।।

प्रसूता स्त्री के गर्भाशय के अपने स्थान से च्युत हो जाने (नीचे आजाने) के कारण शरीरस्थित दोष भी उस गर्भाशय का अनुगमन करके नीचे की ओर आजाते हैं इसलिये उसे वमन, नस्य, बस्ति तथा विरेचन आदि नहीं कराने चाहिये। परन्तु यदि उसके शरीर में दोष अल्प मात्रा में ही विद्यमान हों तथा शरीर स्थित हो तो शरीर में दोषों के बलाबल को देखकर युक्तिपूर्वक उन सब का सेवन किया जा सकता है ॥

वमन वा विरेकं वा तीक्ष्ण तीक्ष्णौषधान्वितम्। न ह्यतिच्युतदोषायां ज्वरितायाः प्रशस्यते ।।७९।।

जिस ज्वरयुक्त प्रसूता स्त्री के शरीर में दोष बहुत अधिक मात्रा में अपने स्थान से च्युत हो गये हों-नीचे की ओर आ गये हों उसे तीक्ष्ण ओषधियों से युक्त तीक्ष्ण वमन एवं विरेचन नहीं देना चाहिये ॥७९॥

संतप्ते तूष्मणा देहे धातवः परिपाचिताः। भूयस्तीक्ष्णौषधं प्राप्य गच्छेयुरमितां गतिम् ।।८०।।

ज्वर की ऊष्मा (गरमी) के कारण संतप्त हुए शरीर में धातुओं का परिपाक हो जाता है। शरीर में पुनः तीक्ष्ण ओषधियों के पहुंचने से उन धातुओं का और अधिक पाक हो जाता है ॥८०॥

उत्क्लिश्यमाने हृदये कफे चाप्युरसि स्थिते। कफज्वरे क्षमे देहे विदध्याद्वमनं मृदु ।।८१।।

वमन का प्रयोग—कफ ज्वर में हृदय का उत्क्लेश होने पर, कफ के वक्षःस्थल में स्थित होने पर तथा शरीर के सहनशील होने पर मृदु वमन देना चाहिये ॥८१॥

अरुचौ कण्ठसंरोधे कफे चैव शिरोगते। अशक्यमाने कवले नस्यं तत्र विधापयेत् ।।८२।।

नस्य का प्रयोग—अरुचि और कण्ठरोध होने पर तथा कफ के सिर में स्थित होने पर यदि कवल का प्रयोग नहीं किया जा सकता हो तो नस्य का प्रयोग कराना चाहिये ॥८२॥

संसर्गपाचिते दोषे ज्वरे च मृदुतां गते। पञ्चाहात् सप्तरात्राद्वा कषायमवचारयेत् ।।८३।। पाचनीयं तु पञ्चाहात् सप्ताहादानुलोमिकम्।

४७४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]

संसर्ग के कारण दोषों के पच जाने पर तथा ज्वर के मृदु हो जाने पर पांच या सात दिन में कषाय का प्रयोग करना चाहिये। इनमें से पाचन कषाय का पांच दिन बाद तथा अनुलोमन कषाय का प्रयोग सात दिन बाद करना चाहिये।

अनुलोम कषाय से अभिप्राय उस कषाय से है जो मल, मूत्र, वायु आदि का अनुलोमन करे ॥८३॥

कफपित्तज्वरे दद्यात् पञ्चाहे शमनौषधम् ॥८४॥
स्वभावतैक्ष्ण्यादल्पेन कालेन परिपच्यते । दुर्बलत्वाच्च धातूनां च्युतत्वाद्दामयस्य च ॥८५॥

कफ तथा पित्तज्वर में पांचवें दिन संशमन औषध का प्रयोग कराना चाहिये। क्योंकि इस रोग में पित्त की स्वाभाविक तीक्ष्णता के कारण, धातुओं के दुर्बल होने से तथा रोग के बहुत कुछ निकल जाने के कारण दोषों का पाचन शीघ्र ही हो जाता है ॥८४-८५॥

वातज्वरे जितेऽभ्यङ्गैस्तथैव रसभोजनैः । पक्वाशयस्थे विमले विदध्यादानुलोमिकम् ॥८६॥
भोजयेल्लघु चाप्यन्नं तनुभिर्जाङ्गलै रसैः ।

वातज्वर के अभ्यङ्ग (तैल मर्दन) तथा मांसरस के भोजन आदि द्वारा शान्त हो जाने पर तथा पक्वाशय स्थित दोष अर्थात् वायु के निर्मल (शान्त) हो जाने पर अनुलोमन का प्रयोग करना चाहिये। तथा उसके बाद उसे पतले जांगल मांसरसों के साथ लघु अन्न का भोजन कराना चाहिये ॥८६॥

यश्च नैवं शमं याति वातपित्तात्मको ज्वरः ॥८७॥
सर्पिस्तं शमयेदाशु दावाग्निमिव तोयदः ।

इन उपर्युक्त उपचारों के द्वारा जो ज्वर शान्त नहीं होता है उसे वातपित्तात्मक ज्वर समझना चाहिये। उस वातपित्तात्मक ज्वर को घृत शीघ्र ही शान्त कर देता है जिस प्रकार बादल दावाग्नि (जंगल की अग्नि) को शान्त कर देता है ॥८७॥

विमलेऽग्नौ मृदौ (व्याधौ) सपि रेव परायणम् ॥८८॥
स्नेहवध्यास्तु भूयिष्ठं व्याधयो दुष्प्रजातयः ।

जाठराग्नि के निर्मल अर्थात् तीव्र हो जाने पर तथा रोग के हल्का पड़ जाने पर घृत ही मुख्य ओषधि है। दुष्प्रजाता (ठीक प्रकार से प्रसव न होने से उत्पन्न हुई) व्याधियां प्रधानरूप से स्नेह के द्वारा ही शान्त होती हैं ॥८८॥

सन्निपातज्वरे नार्या मारुते च बलीयसि ॥८९॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २२८ तमं पत्रम्।)
संस्कृतं रसयूषाभ्यां पुराणं सर्पिरिष्यते ।

सन्निपात ज्वर में तथा वायु के बलवान् होने पर प्रसूता स्त्री को मांसरस तथा यूष के द्वारा संस्कृत किये हुए पुराने घी का प्रयोग कराना चाहिये ॥८९॥

तत्र वातज्वरे तावत् प्रवक्ष्यामि चिकित्सितम् ॥९०॥
क्रव्यादानां च मांसानि धान्यमाषतिला यवाः । दशमूलमपामार्गभण्ट्येरण्डाटरूषकाः ॥९१॥
अश्वगन्धां श्वदंष्ट्रां च वंशपत्रं च संहरेत् । इत्येष संकरस्वेदः सकरीषोऽम्लसंयुतः ॥९२॥
वातज्वरेऽवचार्यः स्यात् संसर्गादौ सुखावहः ।