भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 772

४१२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७]

से उत्क्लिष्ट करना चाहिये। वमन योग्य रोगी को यह आहार एक दिन तथा विरेच्य पुरुष को तीन दिन देना चाहिये। कफ को बढ़ाने वाले भोजनों के द्वारा कफ के उत्क्लिष्ट हो जाने से वमन सुखपूर्वक हो जाता है। यदि कफ उत्क्लिष्ट न हो अथवा मन्द हो तो वमन ओषधि वमन नहीं लायेगी प्रत्युत नीचे जाकर विरेचन करा देती है। इससे विपरीत यदि कफ बढ़ा हुआ होगा तो विरेचन ओषधि विरेचन नहीं लायेगी अपितु ऊपर की ओर जाकर वमन ले आयेगी ॥२५-२६॥

विषे विसर्पे श्वयथौ वातरक्ते हलीमके ॥२७॥
कामलापाण्डुरोगे च नातिस्निग्धं विरेचयेत् ।

विष (विष का प्रयोग), विसर्परोग, शोथ, वातरक्त, हलीमक, कामला तथा पाण्डुरोग में-जिन्हें अत्यन्त स्नेहन नहीं कराया गया है, विरेचन देना चाहिये। अर्थात् विष, विसर्प आदि रोगों में यदि विरेचन कराना हो तो उससे पूर्व स्नेहन तो कराना चाहिये परन्तु अधिक स्नेहक नहीं कराना चाहिये ॥२७॥

नातिस्निग्धशरीराय विदध्यात् स्नेहसयुतम् ॥२८॥
स्निग्धाय रूक्ष(क्षं,)रूक्षाय कामं स्नेहविरेचनम् ।
स्निग्धाभारं रथात् (?) को वा स्रंसनं सहते नरः ॥२९॥

जिस व्यक्ति का शरीर अधिक स्निग्ध हो उसे स्नेह विरेचन नहीं देना चाहिये। जिस व्यक्ति का शरीर स्निग्ध है उसे रूक्ष विरेचन दें तथा जिसका शरीर रूक्ष है उसे यथेच्छ स्निग्ध विरेचन देना चाहिये। अर्थात् अतिस्निग्ध पुरुष में दोषों के बहिः प्रवृत्त्युन्मुख होने पर यदि स्नेह विरेचन दिया जाय तो दोष बाहर नहीं निकलेंगे। अपितु पुनः स्रोतों में लीन हो जायेंगे। उस अवस्था में रूक्ष विरेचन ही देना चाहिये जिससे बहिः प्रवृत्त्युन्मुख दोष पुनः स्रोतों में लीन न हो सकें। परन्तु यदि शरीर रूक्ष है जैसा कि पूर्वोक्तानुसार विष, विसर्प आदि रोगों में होता है तो वहां स्निग्ध विरेचन ही देना चाहिये। अत्यन्त स्नेहन से युक्त विरेचन को कौन व्यक्ति सहन कर सकता है अर्थात् ऐसे व्यक्ति बहुत कम हैं जो स्निग्ध विरेचन को सहन कर सकते हों¹ ॥

घृतकुम्भाद्यथा तोयमयत्नेन निरस्यते । निरस्यते तथा दोषः स्निग्धाद्देहाद्विरेचनैः ॥३०॥

घृतयुक्त अर्थात् स्निग्ध (चिकने) घड़े से जिस प्रकार पानी को बिना यत्न के हटाया जा सकता है उसी प्रकार स्निग्ध देह से विरेचन के द्वारा दोष सुखपूर्वक हटाये जा सकते हैं। यहां ‘विरेचन’ शब्द उपलक्षणमात्र है इससे वमन आदि सम्पूर्ण संशोधनों का ग्रहण होता है। अर्थात् संशोधन से पूर्व स्नेहन के द्वारा दोष चलाय मान हो जाते हैं। तदुपरान्त वमन आदि के द्वारा उन दोषों को बिना कठिनाई के निकाला जा सकता है ॥३०॥

स्निग्धं विष्यन्दयत्यङ्गं स्वेदो(दः)स्निग्धार्द्रमि²न्धनम् (?) ।
ततः स्विन्नशरीरस्य दोषान् हरति भेषजम् ॥३१॥

जैसे स्निग्ध एवं गीली ईंधन (लकड़ी) को अग्नि विष्यन्दित (क्षरित) कर देती है उसी प्रकार स्निग्ध (स्नेहन युक्त) शरीर (शरीर के दोषों) को स्वेदन भी विष्यन्दित कर देता है-विचलित कर देता है। इस प्रकार स्वेदन किये गये शरीर


१. यहां 'स्निग्धाभारं रथात् को वा स्रंसनं सहते नरः' के स्थान पर 'स्निग्धाहारमृते को वा स्रंसनं सहते नरः' यह पाठ होता तो सम्यक् अर्थ हो सकता था। यहां पर इसी पाठ के अनुसार उपर्युक्त अर्थ किया गया है।
२. अत्र स्नेहार्द्रमिन्धनमिव स्वेदः स्निग्धमङ्गं विष्यन्दयतीति पदयोजने यथाऽऽर्दे इन्धने स्नेहनं विधाय ज्वालने स्वेदेन रसनिष्यन्दः, एवमेव शरीरेऽपि स्नेहनं कृत्वा स्वेदने दोषनिःसरणं भवतीति भावः प्रतीयते, परं यथेवादिपदमपेक्ष्यते । एतदादर्शपुस्तके पाठो भ्रष्टः किल ।