भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 771

संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] खिलस्थानम् ४१९

इसके बाद संशोधन के योग्य रोगी को पहले स्नेहन तथा स्वेदन देकर पुनः यथावत् वमन तथा विरेचन कराना चाहिये। अर्थात् जिस व्यक्ति का संशोधन करना है उसे पहले स्नेहन तथा स्वेदन कराना चाहिये ॥२०॥

स्नेहः पीतोऽनिलं हन्ति कुरुते देहमार्दवम् ।। २१ ।।
सङ्गं मलानां निघ्न(ह)न्ति, स्वेदः स्निग्धस्य देहिनः ।

सेवन किया गया स्नेह वायु को शान्त करता है, शरीर को मृदु करता है तथा मलों के सङ्ग-समूह को नष्ट करता है अर्थात् सामूहिक रूप में एकत्र हुए मलों को ढीला करता है ॥

स्रोतःसु लीनं सूक्ष्मेषु दोषं द्रवयति, द्रवम् ।। २२ ।।

स्निग्ध (जिसका स्वेहन किया गया है) मनुष्य को दिया गया स्वेदन सूक्ष्म स्रोतों में लीन हुए दोष को पिघला देता है। अर्थात् पहले स्नेहन के द्वारा दोषों का संघात ढीला पड़ जाता है। तदनन्तर स्वेदन के द्वारा दोष पतले हो जाते हैं। वे दोष पतले हो जाने से शरीर में रुके नहीं रह सकते, आराम से शरीर से बाहर निकल जाते हैं ॥२२॥

शोधनं हरति क्षिप्रं यथावत् संप्रयोजितम् । मन्त्र^१पूतमबीभत्सं हृद्यं कार्यं विरेचनम् ।। २३ ।।
सबीभत्सं तु वमनं तथा तद्योगमृच्छति ।

द्रव शोधन यथावत् प्रयुक्त किया गया शीघ्र ही दोषों को हर लेता है। इसलिये शोधन के लिये ऐसा विरेचन प्रयुक्त चाहिये जो मन्त्रों के द्वारा पवित्र किया गया हो, जो बीभत्स न हो अर्थात् जिसे देखकर शरीर में घृणा उत्पन्न न हो तथा जो हृदय के लिये रुचिकर हो। बीभत्स (घृणित) वमन के द्वारा वमन का अतियोग हो जाता है ॥२३॥

स्निग्धो वमेत्तृतीयेऽह्नि चतुर्थे स्रंसनं पिबेत् ।। २४ ।।
विकारजाते तद्युक्तं स्वस्थवृत्तौ तु कामतः ।

स्नेहन के बाद तीसरे दिन वमन औषध तथा चौथे दिन विरेचन औषध पीनी चाहिये। यह उपर्युक्त व्यवस्था विकारों के उत्पन्न होने की अवस्था में बताई गई है। स्वस्थ अवस्था में तो इसका यथेच्छ प्रयोग किया जा सकता है। अर्थात् रुग्णावस्था में स्नेह के बाद तीसरे दिन वमन और चौथे दिन विरेचन देना चाहिये। परन्तु यदि व्यक्ति स्वस्थ हो तो उपर्युक्त विधान आवश्यक नहीं है। उस समय आवश्यकतानुसार उसका यथेच्छ प्रयोग किया जा सकता है ॥२४॥

कफवृद्धिकरं भोज्यः श्वः पाता वमनं नरः ।। २५ ।।
विरेचनं द्रवप्रायं स्निग्धोष्णाविशदं लघु । तथोत्क्लिष्टकफत्वाच्च पुरीषस्य च लाघवात् ।। २६ ।।
ऊर्ध्वं चाधश्च दोषाणां प्रवृत्तिः स्यादयत्नतः ।

अगले दिन जिस व्यक्ति को वमन द्रव्य का पान करना है उसे पहले दिन कफ की वृद्धि करने वाला भोजन कराना चाहिये। तथा विरेचन औषध-द्रव (Liquid), स्निग्ध, उष्ण (गरम), विशद (जो पिच्छिल न हो) तथा लघु होना चाहिये। इस प्रकार उपर्युक्त आहार के द्वारा कफ के उत्क्लिष्ट (बहिः प्रवृत्त्युन्मुख) हो जाने पर तथा पुरीष के लघु हो जाने से दोषों की ऊर्ध्व (ऊपर) तथा अधः (नीचे) प्रवृत्ति बिना यत्न के हो जाती है अर्थात् वमन एवं विरेचन सुखपूर्वक जाते हैं। वमन एवं विरेचन कराने से पूर्व दोषों का उत्क्लेश कराना आवश्यक है। चरक-सि. अ. १ में भी कहा है कि ग्राम्य, औदक एवं आनूप मांसरसों से तथा दूध से कफ को उत्क्लिष्ट करना चाहिये-उसे बहिः प्रवृत्ति के लिये उन्मुख करना चाहिये। तथा जिस व्यक्ति को विरेचन देना है उसके दोष (पित्त) को स्निग्ध जांगल मांसरसों से तथा कफ को न बढ़ाने वाले यूषों


१. आशीर्भिरभिमन्त्रितमिति चरके सुश्रुते च श्लोकमन्त्रयोरप्युल्लेखस्य दर्शनेन अत्रापि मन्त्रशब्देन मन्त्र एव ग्राह्यः ।