भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 770, कुल 942 में से

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पृष्ठ 770

४१० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७]

सू. अ. ३० में कहा भी है—“प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणमातुरस्य विकारप्रशमनं च”। अर्थात् प्रयत्न यह किया जाता है कि मनुष्य रुग्ण ही न होने पावे। इसलिये रुग्ण होने से पूर्व ही अमुक २ ऋतु में अमुक २ दोष का शोधन कर लेना चाहिये। स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना अधिक सरल है। रोग होने के बाद उन्हें दूर करना अपेक्षाकृत कठिन है ॥१५॥

स्थौल्यामपाण्डुताकर्णकोठारुःपिडकोद्भवः। निद्रानाशोऽरतिस्तन्द्रीरुत्क्लेशः कफपित्तयोः ॥१६॥
श्रमदौर्बल्यदौर्गन्ध्यमालस्यं सीदनं क्लमः। भक्तद्वेषोऽविपाकश्च क्लैब्यं बुद्धेरुपप्लवः ॥१७॥
बृंहणैस्तृप्यतोऽपि(स्या)द्वलवर्णपरिक्षयः। दुःस्वप्रदर्शनं चेति बहुदोषस्य लक्षणम् ॥१८॥

बहुदोष व्यक्ति के लक्षण—स्थूलता, आमदोष, पाण्डु, कर्णरोग, कोठ (चर्मरोग-Ringwarm), अरु (क्षतव्रण) तथा पिडकाओं का उत्पन्न होना, निद्रा का नष्ट होना, अरति (ग्लानि), तन्द्रा, कफ और पित्त का उत्क्लेश (बाहर आने की प्रवृत्ति), परिश्रम, दुर्बलता, दुर्गन्धि, आलस्य, अङ्गसीदन, थकावट, भोजन में अरुचि, खाये हुए अन्न का ठीक प्रकार से पाक न होना, क्लीबता (नपुंसकता), बुद्धिविभ्रम, बृंहण आहार मिलने पर भी लगातार बल और वर्ण (कान्ति) का क्षीण होना तथा बुरे स्वप्नों का दिखाई देना-ये शरीर में दोषों की अधिक मात्रा में उपस्थिति के लक्षण हैं। अर्थात् यदि शरीर में दोष बहुत अधिक मात्रा में विद्यमान हों तो उपर्युक्त लक्षण होते हैं ॥१६-१८॥

बलिनः स्थिरदेहस्य तस्य संशोधनं भिषक्।
कुर्यात्, संशमनं चैव मध्यदोषबलस्य तु ॥१९॥
अल्पदोषबलस्यापि यथाकालं विशोषणम्।

यदि रोगी बलवान् है तथा उसका शरीर भी स्थिर है तो चिकित्सक को चाहिये कि उसका संशोधन तथा यदि रोगी का दोष और बल दोनों मध्यम हैं तो दोषों का संशमन करना चाहिये। अर्थात् यदि न तो दोष ही बहुत अधिक या बहुत कम हों और न रोगी का बल भी बहुत कम या बहुत अधिक हो तो उस अवस्था में संशोधन की अपेक्षा संशमन चिकित्सा अधिक श्रेष्ठ मानी गई है। यदि रोगी के दोष और बल अल्प मात्रा में हों तो उनका यथासमय शोषण करना चाहिये। अर्थात् यदि रोगी का दोष एवं बल अधिक हो तो संशोधन चिकित्सा, यदि दोष एवं बल मध्य मात्रा में हों तो संशमन चिकित्सा और यदि दोष एवं बल अल्प मात्रा में हों तो रूक्ष या शोषण चिकित्सा करनी चाहिये। जो शरीरस्थ दोषों को बाहर निकाल देता है उन्हें संशोधन कहते हैं। संशोधन बाह्य एवं आभ्यन्तर भेद से दो प्रकार का होता है। वमन, विरेचन, शिरोविरेचन और बस्ति चार प्रकार का अन्तः शोधन है तथा यन्त्र, शस्त्र, क्षार, अग्नि प्रयोग आदि द्वारा बाह्य शोधन किया जाता है। यहां निरूह से अभिप्राय आस्थापान (रूक्ष) बस्ति से है। संशोधन में अनुवासन बस्ति का ग्रहण नहीं किया जाता है। क्योंकि अनुवासन बृंहण है अतः संशोधन से अभिप्राय अनुवासन को छोड़कर शेष चार संशोधन—अन्तः (वमन, विरेचन, आस्थापान, शिरोविरेचन) तथा पांचवां रक्तमोक्षण है। संशोधन के द्वारा बलवान् मनुष्यों के दोषों का निर्हरण करना चाहिये। संशमन-जो शरीरस्थ दोषों को बाहर नहीं निकालता है, समावस्था में स्थित दोषों में विषमता उत्पन्न नहीं करता है तथा विषम दोषों को शान्त करता है-उसे संशमन कहते हैं। संशमन तीन प्रकार का होता है—१. दैवव्यपाश्रय मन्त्र ओषधि, बलि आदि के द्वारा दोषों को शान्त करना, २. बाह्यप्लस्तर आदि लेप के द्वारा दोषों को शान्त करना, ३. आभ्यन्तर (Internally) पाचन आदि के द्वारा दोषों का शमन करना। संशमन के द्वारा मध्य बल एवं रोग वाले मनुष्यों के दोषों का शमन करना चाहिये। शोषण—लङ्घन आदि के द्वारा दोषों को अन्दर ही सुखा देने को शोषण कहते हैं। अल्प दोष एवं अल्प बल वाले व्यक्तियों के लिये यह उपक्रम श्रेष्ठ माना गया है ॥१९॥

अथ संशोधनाहें तु स्नेहस्वेदोपपादिते ॥२०॥
वमनं स्त्रंसनं वाऽपि यथावदुपकल्पयेत्।

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