काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 769, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] खिलस्थानम् ४०९
अब वर्षारृतु में सूर्य बादलों में छिपा रहता है इसलिये पहले (ग्रीष्म ऋतु) के समान गर्मी नहीं रहती अपितु मौसम ठण्डा हो जाता है। मौसम के शीतल हो जाने के कारण ‘वृद्धिः समानैः सर्वेषाम्’ के अनुसार वायु का प्रकोप हो जाता है। इसलिये इस ऋतु (वर्षा) में बस्तिकर्म द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये। वायु को शान्त करने के लिये बस्तिकर्म श्रेष्ठ उपक्रम माना गया है। चरक सू. अ. २० में भी इसका उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार बस्ति के विषय में सुश्रुत चि. अ. ३६ में भी कहा है ॥९-१०॥
अपां चैवौषधीनां च वर्षास्वम्लविपाकतः । चितमप्यत्र तत् पित्तं वर्षाशैत्यान्न कुप्यति ॥११॥
दिवाकरांशुसंतप्तं शरत्काले प्रकुप्यति । विरेचनोत्तरं चात्र विधातव्यं विशोधनम् ॥१२॥
वर्षा ऋतु में जल तथा ओषधियों के अम्लविपाकी अर्थात् सम्यक् प्रकार से पाक न होने से विदग्ध हो जाने के कारण शरीर में संचित हुआ भी पित्त वर्षा ऋतु की शीतलता के कारण प्रकुपित नहीं होता है। अर्थात् पित्त को प्रकुपित करने के लिये पित्त के समान गुण-उष्णता की आवश्यकता होती है। परन्तु वर्षा में उस उष्णता का अभाव होता है इसलिये इस ऋतु में पित्त प्रकुपित नहीं हो पाता। वही पित्त सूर्य की किरणों के द्वारा संतप्त हुआ शरत् काल में प्रकुपित हो जाता है। क्योंकि उष्णता पित्त का समान धर्मी होने से इसे प्रकुपित कर देती है। इस ऋतु (शरत् काल) में विरेचन के द्वारा शरीर का शोधन करना चाहिये। पित्त के प्रकोप को शान्त करने के लिये विरेचन सर्वश्रेष्ठ उपक्रम माना गया है॥
दोषप्रकोपे सर्वस्मिन् कार्यमनन्तरम् । न हि हेत्वीरितो दोषः कञ्चित्कालमुदीक्ष्यते ॥१३॥
औचित्यादार्तवो दोषप्रकोपो न तथा भृशः । यथा हेतुकृतस्तस्मात् क्षिप्रेमेनमुपक्रमेत् ॥१४॥
अथवा दोषों का प्रकोप हो जाने पर सम्पूर्ण कालों में इनका शोधन किया जा सकता है। अर्थात् दोषों के प्रकुपित हो जाने पर दोष शोधन के योग्य पूर्वोक्त ऋतुओं की अपेक्षा न करके प्रत्येक ऋतु में उन २ दोषों का शोधन कर देना चाहिये। क्योंकि अपने २ हेतुओं के द्वारा प्रेरित हुआ दोष थोड़ी देर भी प्रतीक्षा नहीं करता है। उन २ ऋतुओं में होने वाला दोषप्रकोप अर्थात् वर्षा में वायु, शरद में पित्त तथा वसन्त में कफ का प्रकोप उचित (काल के अनुसार स्वाभाविक) होने के कारण उतना भयंकर नहीं होता है जितना कि अपने २ प्रकोपक कारणों के द्वारा प्रकुपित हुआ दोष। इसलिये इस दोष को शीघ्र ही शान्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। अर्थात् अपने २ प्रकोपक कारणों के द्वारा प्रकुपित होने से पूर्व ही उन २ दोषों का उन २ ऋतुओं में शोधन कर लेना चाहिये जिनमें कि उनका प्रकोप होता है। जैसे वायु का वर्षा में, पित्त का शरद् में तथा कफ का वसन्त में। अर्थात् उपर्युक्त ऋतुओं में इन दोषों का प्रकोप स्वाभाविक रूप से हो होता है। इसलिये इन ऋतुओं में ये दोष स्वाभाविक होते हैं और इतने कष्टसाध्य नहीं होते हैं। यदि इन ऋतुओं में अपने २ दोषों का शोधन नहीं किया जाय तो उसके बाद अपने २ हेतुओं के द्वारा प्रकुपित हुए वे ही दोष सुखसाध्य नहीं होते क्योंकि फिर वे दोष स्वाभाविक नहीं होते। इसलिये जबतक दोष का स्वाभाविक प्रकोप ही है तभी उसे उन २ ऋतुओं में शान्त करने का प्रयत्न करना चाहिये ॥१३-१४॥
वमनैश्च विरेकैश्च निरूहैः सानुवासनैः । तथा स्वास्थ्यमवाप्नोति रोगेभ्यश्च प्रमुच्यते ॥१५॥
वमन, विरेचन तथा अनुवासन सहित निरूह बस्तियों के द्वारा मनुष्य स्वास्थ्य को प्राप्त करता है तथा रोगों से मुक्त हो जाता है। अर्थात् योग्य काल में—वसन्त में वमन के द्वारा कफ का, शरद् में विरेचन के द्वारा पित्त तथा वर्षा में बस्तियों के द्वारा वायु की शान्ति हो जाने पर मनुष्य स्वस्थ रहता है। तथा यदि रोग हो भी जाते हैं तो उन रोगों से शीघ्र ही मुक्त हो जाता है। यहां यह स्मरण रखना चाहिये कि आयुर्वेद के दो प्रयोजन हैं—१. स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा तथा २. रोगी होने पर रोगों से मुक्ति। इनमें से प्रथम प्रयोजन प्रधान है इसीलिये इसका प्रथम वर्णन किया है। चरक