भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 768
४०८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७]

चयप्रकोपप्रशमाः पित्तस्य प्रावृडादिषु। श्लेष्मणः शिशिराद्येषु, वायोर्ग्रीष्मादिषु त्रिषु ।।४।।

पित्त का प्रावृट् आदि ऋतुओं में क्रमशः संचय, प्रकोप तथा शान्ति होती है। अर्थात् प्रावृट् ऋतु में पित्त का संचय, शरद् में पित्त का प्रकोप तथा हेमन्त में पित्त की शान्ति होती है। श्लेष्मा का शिशिर आदि ऋतुओं में संचय, प्रकोप तथा शान्ति होती है अर्थात् शिशिर में कफ का संचय, वसन्त में कफ का प्रकोप तथा ग्रीष्म में कफ की शान्ति हो जाती है। तथा वायु का ग्रीष्म आदि ऋतुओं में क्रमशः संचय, प्रकोप तथा शान्ति होती है। अर्थात् ग्रीष्म ऋतु में वात का संचय, वर्षा में प्रकोप तथा शरद् में शान्ति होती है ॥

प्रावृट्शरद्धेमन्ताख्या विसर्गस्त्वृतवस्त्रयः। शिशिरश्च वसन्तश्च ग्रीष्मश्चादानसंज्ञिताः ।।५।।

प्रावृट्, शरद् तथा हेमन्त आदि तीन ऋतुएं विसर्गकाल तथा शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म ऋतुएं आदानकाल कहलाती हैं। विसर्गकाल सौम्य तथा आदानकाल आग्नेय होता है। विसर्गकाल का अर्थ है जिसमें प्राणियों के शरीर तथा बल की वृद्धि होती है। विसृजति जनयत्याप्यमंशं प्राणिनां च बलमिति विसर्गः। आदानकाल में जगत् का आप्यभाग तथा प्राणियों का बल खींचा जाता है। इसलिये—'आददाति क्षपयति पृथिव्याः सौम्यांशं प्राणिनाञ्च बलमित्यादानम्' ।।५।।

विसर्गादानयोर्मध्ये बलं मध्ये शरीरिणाम्। आद्यन्तयोस्तु दौर्बल्यमन्ताद्योरुत्तमं बलम् ।।६।।

विसर्गकाल तथा आदानकाल के मध्य में अर्थात् शरद् और वसन्त ऋतु में प्राणियों का बल मध्यम होता है। अर्थात् इन ऋतुओं में मनुष्यों का बल न बहुत अधिक होता है और न बहुत कम। विसर्गकाल के आदि (प्रावृट् ऋतु) तथा आदानकाल के अन्त (ग्रीष्म ऋतु) में मनुष्यों में दुर्बलता होती है। विसर्गकाल के अन्त (हेमन्त ऋतु) तथा आदानकाल के प्रारंभ (शिशिर ऋतु) में पुरुषों का बल उत्तम (श्रेष्ठ) रहता है ।।६।।

हेमन्ते स्निग्धशीताभिरद्भिरोषधिभिस्तथा। चितोऽपि शैत्यात् प्रस्कन्नः कफो नात्र प्रकुप्यति ।।७।।
स कुप्यति हिमापाये संतप्तो भास्करांशुभिः। तस्मात् संशोधनं तत्र कर्तव्यं वमनोत्तरम् ।।८।।

हेमन्त ऋतु में स्निग्ध एवं शीतल जल तथा ओषधियों के द्वारा संचित हुआ भी कफ ठण्ड से जमा हुआ होने के कारण इस ऋतु में कुपित नहीं होता है। वही कफ ठण्ड के समाप्त हो जाने पर सूर्य की किरणों के द्वारा संतप्त होने के कारण कुपित हो जाता है। अर्थात् हेमन्त के बाद वसन्त ऋतु में कफ का प्रकोप हो जाता है इसलिये इस ऋतु (वसन्त) में वमन द्वारा शरीर का संशोधन करना चाहिये। वमन द्वारा शरीर का संशोधन 'माधवप्रथमे मासि' के अनुसार चैत्र मास में कराना चाहिये। कफ के प्रकोप को शान्त करने के लिये वमन श्रेष्ठ माना गया है। चरक सू. अ. २० में इसका उल्लेख मिलता है ।।७-८।।

ग्रीष्मे निष्पीतसारत्वाद्रसानां विचितोऽपि सः। औष्ण्यातिरेकात् कालस्य वायुरत्र न कुप्यति ।।९।।
रवेरम्बुदसंरोधात् प्रकुप्यत्यम्बुदागमे। बस्तिकर्मोत्तरं तत्र प्रतिकर्म विशिष्यते ।।१०।।

ग्रीष्म ऋतु में सम्पूर्ण रसयुक्त पदार्थों के सारभाग के सूर्य की किरणों के द्वारा पान किया जाने के कारण संचित हुआ भी वायु इस ऋतु में उष्णता की अधिकता के कारण प्रकुपित नहीं होता है। अर्थात् यद्यपि ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणों के द्वारा जगत् के प्रत्येक पदार्थ के रस (सार भाग) का शोषण किया जाने से शरीर में रूक्षता के कारण वायु संचित हो जाता है तथापि काल के उष्ण होने के कारण वायु प्रकुपित नहीं होता है। वायु शीतगुण वाला होने के कारण शीतकाल में ही प्रकुपित हो सकता है। क्योंकि 'वृद्धिः समानैः सर्वेषाम् के अनुसार समान गुण (शीत) के कारण समान वस्तु (वायु) की वृद्धि होती है इसलिये उष्णकाल में वायु का प्रकोप नहीं हो पाता है। इसीलिये चरक में कहा भी है—'शीतः शीते प्रकुप्यति'। वही वायु वर्षार्ऋतु के आने पर बादलों में सूर्य के छिप जाने से प्रकुपित हो जाता है। अर्थात्