काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] खिलस्थानम् ४०७
कटुतिक्तकषाय मधुर (तिलगुग्गुल्वादिकम्) २. कटुतिक्तकषायाम्ल (बालमूलकहस्तिनीदध्यादिकम्) ३. कटुतिक्तकषायलवण (सरोमकं बालबिल्वादिकम्) इस प्रकार चतुष्क संयोग १५ होते हैं। पूर्व सूत्रोक्त ९+द्वितीय सूत्रोक्त ३+तृतीय सूत्रोक्त ३=इस प्रकार चतुष्क १५ होते हैं। इसी प्रकार चरक सू. अ. २६ में तथा सु. उ. अ. ६३ में भी कहा है॥७४॥
षट् पञ्चकाः । षण्णां रसानां मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायाणामैकैकमपनयितव्याः, षट् पञ्चका निष्पद्यन्ते । तद्यथा—अम्ललवणकटुतिक्तकषायः, मधुरलवणकटुतिक्तकषायः, मधुराम्लकटुतिक्तकषायः, मधुराम्ललवणतिक्तकषायः मधुराम्ललवणकटुकषायः, मधुराम्ललवणकटुतिक्त इति । त एते षट् पञ्चकाः । षड्भिर्मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायैरेकः । तद्यथा—मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषाय इति । त एवमेते रसास्त्रिषष्टिविधा¹ भिन्नाः; तत्र संयुक्ताः सप्तपञ्चाशत्, असंयुक्ताः षट् ७५ ।
पंचक (पांच रसों के संयोग) ६ होते हैं। मधुर अम्ल लवण कटु तिक्त तथा कषाय इन छहों रसों में से एक २ रस कम करते जाना चाहिये। इस प्रकार ६ पञ्चक संयोग बनते हैं। तथा—१. अम्ललवण कटु तिक्त कषाय (भल्लातकरौप्यशिलाजतुमिश्रितनिम्बादिकम्) २. मधुरलवणकटुतिक्तकषाय (रसोनादिकम्) ३. मधुराम्लकटुतिक्तकषाय (हरीतकीधात्रीफलादिकम्) ४. मधुराम्ललवणतिक्तकषाय (औद्भिदान्विततक्रादिकम्) ५. मधुराम्ललवणकटुकषाय (कटुत्रययवक्षारान्विततक्रादिकम्) ६. मधुराम्ललवणकटुतिक्त (आमकर्मर्दान्वितं भृष्टवार्ताकफलादिकम्) षष्ट्क संयोग—मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त तथा कषाय इन छहों रसों के संयोग से एक रस बनता है। यथा—१. मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय (एणमांसाणादिकम्) इस प्रकार इन रसों के ६३ भेद हो जाते हैं। इनमें से संयुक्त रस ५७ होते हैं तथा असंयुक्त (पृथक् २) रस ६ होते हैं। चरक सू. अ. २६ में भी कहा है—संयोगाः सप्तपञ्चाशत्कल्पना तु त्रिषष्टिधा ॥७५॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥७६॥ ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥७६॥
(इति) खिलेषु रसदोषविभागीयो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
अथसंशुद्धिविशेषणीयो नाम सप्तमोऽध्यायः
अथातः संशुद्धिविशेषणीयं व्याख्यास्यामः ॥१॥ इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम संशुद्धिविशेषणीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
सिद्धौ विशोधनाख्यायामनुक्तं यद्विशेषणम्। ऊर्ध्वानुलोमयोः सर्वं तत् प्रवक्ष्याम्यतः परम् ॥३॥
सिद्धिस्थान में विशोधन के प्रकरण में ऊर्ध्व तथा अनुलोम शोधन के विषय में जो बातें नहीं कही हैं। उन सबको अब मैं यहां कहूंगा ॥३॥
१. एष एव त्रिषष्टिविधो रसबिकल्पश्चरकसूत्रस्थाने २६ अध्याये; सुश्रुतोत्तरतन्त्रे ६४ अध्याये चोपवर्णितः ।