भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 766
४०६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्रसदोषविभागीयाध्यायः ६]

इन उपर्युक्त तीनों द्विकों में से एक २ द्विक शेष तीन कटु, तिक्त तथा कषाय रसों के साथ मिलकर त्रिक बनते हैं। यथा—१. मधुराम्लकटु (शल्पकमीमांसादिकम्) २. मधुराम्लतिक्त (गोधूमोत्यसुरादिकम्) ३. मधुराम्लकषाय (मस्तुतक्रादिकम्) ४. मधुर लवण कटु (काणकषोतमांसादिकम्) ५. मधुरलवणतिक्त (शम्बूकादिमांसम्) ६. मधुरलवणकषाय (पद्मकन्दादिकं गुडसंयुक्तम्) ७. अम्ळलवण कटु (रौप्यशिलाजत्वादिकम्) ८. अम्ललवण तिक्त (हस्तिमूत्रादिकम्) ९. अम्ललवणकषाय (सरोमकं हस्तिनीदध्यादिकम्) पिछले तीन कटु तिक्त एवं कषाय रसों से तीन द्विक बनते हैं। यथा—१. कटुतिक्त २. कटुकषाय ३. तिक्तकषाय इन तीनों द्विकों में से एक २ द्विक शेष मधुर, अम्ल तथा लवण आदि तीनों रसों से मिलाया जाता है। इससे त्रिक बनते हैं। यथा—१. कटुतिक्त मधुर (तृणशून्याफलशुष्ककुस्तुम्बर्यादिकम्) २. कटुतिक्ताम्ल (मरिचसंस्कृतसुरादिकम्) ३. कटुतिक्त लवण (अविमूत्रादिकम्) ४. कटुकषायमधुर (गोधामान्सैरण्डतैलादिकम्) ५. कटुकषायाम्ल (अम्लवेतसादिकम्) ६. कटुकषायलवण (अरुष्करं सरोमकम्) ७. तिक्तकषायमधुर (गुडूचीशाखामृगाभिषुतवरकतैलादिकम्) ८. तिक्तकषायाम्ल (कीरमांसयुतसुरादिकम्) ९. तिक्तकषायलवण (समुद्रफेनादिकम्) प्रथम तीन रसों से एक त्रिक बनता है—१. मधुराम्ललवण (हस्तिमांसादिकम्)। तथा पिछले तीन रसों से एक त्रिक बनता है २. कटुतिक्तकषाय (कृष्णागुरुसुरदारुस्नेहादिकम्) इस प्रकार त्रिक २० होते हैं। प्रथम सूत्र के द्वारा ९+द्वितीय के द्वारा ९+तथा तृतीय के द्वारा २=२० सु. उ. अ. ६३ में कहा है कि मधुर के योग से १० त्रिक+अम्ल के योग से ६+लवण के योग से ३+कटु के योग से १=२० त्रिक होते हैं ॥७३॥

पूर्वेषु त्रिषु रसेषु मधुराम्ललवणेषु त्रयोऽधिका ये पूर्वोक्तास्ते परेषां त्रयाणां रसानां कटुकतिक्तकषायाणां पूर्वोक्तैस्त्रिभिर्द्विकैः प्रत्येककशयेन योजयितव्याः; तेन चतुष्का निष्पद्यन्ते। तद्यथा-मधुराम्लकटुतिक्तः, मधुराम्लकटुकषायः, मधुराम्लतिक्तकषायः, मधुरलवणकटुतिक्तः, मधुरलवणकटुकषायः, मधुरलवणतिक्तकषायः, अम्ललवणकटुतिक्तः, अम्ललवणकटुकषायः, अम्ललवणतिक्तकषाय इति। पूर्वे मधुराम्ललवणा उत्तरैः कटुकतिक्तकषायैरैककशो युज्यन्ते। तद्यथा-मधुराम्ललवणकटुः, मधुराम्ललवणतिक्तः, मधुरलवणकटुतिक्तः, मधुटलवणकटुकषायः, मधुरलवणतिक्तकणायः। मधुराम्ललवणकषाय इति। उत्तरे त्रयः कटुकतिक्तकषायाः पूर्वैर्मधुराम्ललवणैरैककशो युज्यन्ते, ततश्चतुष्का निष्पद्यन्ते। तद्यथा-कटुतिक्तकषायमधुरः, कटुतिक्तकषायाम्लः, कटुतिक्तकषायाम्लः, कटुतिक्तकषायलवण इति। एते चतुष्काः पञ्चदश, पूर्वसूत्रोक्ता नव, द्वितीयसूत्रोक्तास्त्रयः, तृतीयसूत्रोक्तास्त्रयः; इत्येते चतुष्काः पञ्चदश ।।७४।।

(इति ताडपत्रपुस्तके २१४ तमं पत्रम्।)

पूर्वोक्त, मधुर, अम्ल, लवण आदि तीन रसों में जो तीन अधिक रस कहे हैं वे पिछले तीन कटु, तिक्त तथा कषाय रसों में जो पूर्वोक्त तीन द्विक हैं-उनमें प्रत्येक के साथ जोड़ने चाहिये जिससे चतुष्कसंयोग बनते हैं। यथा—१. मधुराम्लकटुतिक्त (लशुनान्वितं सुरादिकम्) २. मधुराम्लकटुकषाय (काञ्जिकान्वितैरण्डतैलादि खदिरान्वितशिलाहादिकं च) ३. मधुराम्लतिक्तकषाय (उदुम्बरान्वितं यवासशर्करादिकम्) ४. मधुर लवणकटुतिक्त (वार्ताकफलादिकम्) ५. मधुरलवणकटुकषाय (गोमूत्रान्वितं तैलादिकम्) ६. मधुरलवणतिक्तकषाय (समुद्रफेनशर्कराचित्रकान्वितबदरादि) ७. अम्ललवणकटुतिक्त (सुवर्चलान्वितहस्तिनीदध्यादिकृतसुरादिकम्) ८. अम्ललवणकटुकषाय (सौवर्चलान्वितहस्तिनीदध्यादिकम्) ९. अम्ललवणतिक्तकषाय (औद्भिदलवणान्वितं शुकमांसादिकम्) पूर्व मधुराम्ललवण, पिछले कटु तिक्त कषाय में से एक २ के साथ पृथक् २ जुड़ते हैं। यथा—१. मधुराम्ललवणकटु (गोमूत्रान्वितशिलाजतु प्रभृतिकम्) २. मधुराम्ललवणतिक्त (गोमूत्रैकशफक्षीरादिकम्) ३. मधुराम्ललवणकषाय (सैन्धवान्विततक्रादिकम्) पिछले तीन कटु, तिक्त एवं कषायरस प्रथम तीन-मधुर, अम्ल तथा लवण में से प्रत्येक के साथ पृथक् २जुड़ते हैं जिससे चतुष्क संयोग बनते हैं। यथा—१.

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