काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 753, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंभोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५] खिलस्थानम् ३९३
कटु रस की सात्म्यता से पाचन शक्ति की वृद्धि, कृशता, रूक्षता, शुक्र और बल का क्षय तथा पित्त और वायु की वृद्धि हो जाती है ॥४५॥
क्लेदाल्पतां वातवृद्धिं दृष्टिहानिं कफक्षयम्। त्वग्विकारोपशान्तिं च जनयेत्तिक्तसात्म्यता ॥४६॥
तिक्तरस की सात्म्यता के कारण क्लेद की कमी, वायु की वृद्धि, दृष्टि की कमी, कफ का क्षय तथा त्वचा के रोगों की शान्ति हो जाती है ॥४६॥
कफपित्तक्षयं वायोः प्रकोपं पक्तिमार्दवम्। कुर्याद्रक्तोपशान्तिं च कषायरससात्म्यता ॥४७॥
कषाय रस की सात्म्यता के कारण कफ और पित्त का क्षय, वायु का प्रकोप, पाचन शक्ति की मृदुता तथा रक्त रोगों की शान्ति हो जाती है ॥४७॥
ओजस्तेजो बलं वर्णमायुर्मेधा धृतिः स्मृतिः। जायते सौकुमार्यं च घृतसात्म्यस्य देहिनः ॥४८॥
जिस व्यक्ति को घृत सात्म्य हो उसमें ओज, तेज, बल, वर्ण, आयु, मेधा, धृति, स्मृति तथा सुकुमारता हो जाती है॥
तथैव क्षीरसात्म्यस्य परं चैतद्रसायनम्। दृढोपचितगात्रश्च निर्मेदरको जितश्रमः ॥४९॥
जिस व्यक्ति को क्षीर (दूध) सात्म्य हो उसके लिये वह रसायन है तथा उसका शरीर दृढ़ होता है। मेदा (चर्बी) कम हो जाती है तथा वह व्यक्ति परिश्रमी होता है ॥४९॥
बलवान् तैलसात्म्यः स्यात् क्षीणवातकफामयः। चक्षुष्मान् बलवाञ्छ्लेष्मी दृढसत्त्वो दृढेन्द्रियः ॥५०॥
जिस व्यक्ति को तैल सात्म्य हो वह बलवान् होता है, उसके वात तथा कफ के रोग क्षीण हो जाते हैं। उसके चक्षु (नेत्र) उत्तम हो जाते हैं वह बलवान् होता है, उसमें कफ की वृद्धि हो जाती है तथा उसका सत्त्व एवं इन्द्रियां दृढ़ हो जाती हैं ॥५०॥
दृढाश्रयो मन्दरुजो मांससात्म्यो भवेन्नरः।
(इति ताडपत्रपुस्तके २११ तमं पत्रम्।)
अहितं यस्य सात्म्यं स्यादसात्म्यं च हितं भवेत् ॥५१॥
स शनैर्हितमादद्यादहितं च शनैस्त्यजेत्।
जिस व्यक्ति को मांस सात्म्य होता है वह दृढ़ आश्रयवाला होता है तथा उसके रोग मन्द हो जाते हैं। अहितकर पदार्थ जिसे सात्म्य होते हैं तथा हितकर पदार्थ जिसे असात्म्य होते उसे शनैः २ हित का ग्रहण तथा अहित का त्याग करना चाहिये। चरक वि. अ. १ में कहा है—तस्मात्तेषां त सात्म्यतः क्रमेणापगमनं श्रेयः, सात्म्यमपि हि क्रमेणोपनिवर्त्त्यमानमदोषमल्पदोषं वा भवति। अर्थात् अहित का त्याग एवं हित का ग्रहण भी क्रमशः ही होना चाहिये। अहित का सहसा त्याग ठीक नहीं है॥
आदौ तु स्निग्धमधुरं विचित्रं मध्यतस्तथा ॥५२॥
रूक्षद्रवावसानं च भुञ्जानो नावसीदति।
भोजन के प्रारम्भ में स्निग्ध तथा मधुर पदार्थ, मध्य में नाना प्रकार के भोजन तथा अन्त में रूक्ष और द्रव पदार्थों का सेवन करनेवाला व्यक्ति कष्ट नहीं पाता। इसी संहिता के कल्प स्थान के भोजनकल्पाध्याय में कहा है—स्निग्धञ्च पूर्वं मधुरं च भोज्यं मध्ये द्रवं शीतमथो विचित्रम्। तीक्ष्णोष्णरूक्षाणि लघूनि पश्चाद्भोज्यानुपूर्वी खलु सात्म्यतश्च ॥५२॥