भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 752

३९२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५]

अतिशुष्काशनं चापि विष्टभ्य परिपच्यते। पूर्वजातरसं जग्ध्वा कुर्यान्मूत्रकफक्षयम्।।३६।।

२१. अत्यन्त शुष्क भोजन विष्टब्ध होकर पचता है। वह पहले उत्पन्न हुए रस को जलाकर (शुष्क करके) मूत्र तथा कफ के क्षय को करता है ।।३६।।

मोहात् प्रमादाल्लौल्याद्वा यो भुङ्क्ते ह्यप्रकाङ्क्षितः। अविपाकारुचिच्छर्दिशूलानाहान् समृच्छति ।।३७।।

२२. जो व्यक्ति भोजन के प्रति रुचि न होने पर भी मोह, प्रसाद अथवा जिह्वालौल्य के कारण भोजन करता है उसे अविपाक (भोजन का न पचना), अरुचि, वमन, शूल तथा आनाह रोग हो जाते हैं ।।३७।।

प्रता¹न्तभोक्तुस्तृण्मूर्च्छा वह्निसादोऽङ्गसीदनम्। ज्वरः क्षतोऽतिसारो वा मन्दत्वं दर्शनस्य च ।।३८।।

२३. निरन्तर (बारबार) भोजन करने वाले व्यक्ति को तृष्णा, मूर्च्छा, अग्निससाद (जाठराग्नि का मन्द होना), अङ्गों की पीडा, ज्वर, क्षय, अतिसार तथा दृष्टि का मन्द होना, हो जाता है ।।३८।।

दौर्बल्यमदृढत्वं च भवत्येकरसाशनात्। दोषाप्रवृद्धिर्धातूनां साम्यं वृद्धिर्बलायुषोः ।।३९।। आरोग्यं चाग्निदीप्तिश्च जन्तोः सर्वरसाशनात्। तस्मादेकरसाभ्यासमारोग्यार्थी विवर्जयेत् ।।४०।।

२४. सदा एक ही रस का सेवन करने से दुर्बलता तथा अदृढता हो जाती है। इसके विपरीत सब रसों का सेवन करने से दोषों की कमी, धातुओं में समता, बल और आयु की वृद्धि, आरोग्य तथा अग्नि दीप्त होती है। इसलिये आरोग्य को चाहने वाला व्यक्ति केवल एक रस के अभ्यास को त्याग दे। सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है कि कभी भी एक ही रस के सेवन में आसक्ति नहीं होनी चाहिये ।।३९-४०।।

कालसात्म्यादिनाऽन्नेन विधिनाऽश्नाति यो नरः। स प्राप्नोति गुणांस्तज्जान्न च दोषैः प्रबाध्यते ।।४१।।

उपर्युक्त काल, सात्म्य आदि की विधि के अनुसार जो व्यक्ति भोजन करता है वह उन २ के गुणों से युक्त होता है तथा उसे उन २ काल सात्म्य आदि से सम्बन्धित दोष कष्ट नहीं पहुंचाते हैं ।।४१।।

स्थिरतां स्वस्थताऽङ्गानामिन्द्रियोपचयं बलम्। कफमेदोऽभिवृद्धिं च कुर्यान्मधुरसात्म्यता ।।४२।।

मधुर रस की सात्म्यता के कारण शरीर की स्थिरता, अङ्गों की स्वस्थता, इन्द्रियों का उपचय, बल तथा कफ और मेद की वृद्धि होती है ।।४२।।

दन्ताक्षिकेशदौर्बल्यं कफपित्तामयोद्भवम्। लघुतामग्निदीप्तिं च जनयेदम्लसात्म्यता ।।४३।।

अम्ल रस की सात्म्यता के कारण दांतों, आंखों तथा बालों की दुर्बलता, कफ तथा पित्त रोगों की उत्पत्ति, लघुता एवं अग्निदीप्ति हो जाती है ।।४३।।

रक्तप्रकोपं तैमिर्यं तृष्णां दुर्बलशुक्रताम्। पालित्यं बलहानिं च कुर्याल्लवणसात्म्यता ।।४४।।

लवण रस की सात्म्यता से रक्तप्रकोप, तिमिर रोग, तृष्णा, शुक्र की दुर्बलता, पालित्य (बालों का सफेद होना) तथा बल में कमी हो जाती है। लवणसात्म्यता के विषय में चरक वि. अ. १ में भी कहा है ।।४४।।

पक्तेरुपचयं कार्श्यं रौक्ष्यं शुक्रबलक्षयम्। पित्तानिलप्रवृद्धिं च कुर्यात् कटुकसात्म्यता ।।४५।।


१. नितान्तभोक्तः निरन्तरं भक्षणशीलस्येति यावत्।