काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५] खिलस्थानम् ३९१
नातिद्रूताशी तत्सर्वमनूनं प्रतिपद्यते । प्रसादमिन्द्रियाणां च तथा वातानुलोमताम् ।।२६।।
१२. अत्यन्त शीघ्र भोजन करने से आहार अपनी स्थिति में नहीं पहुंचता है। वह भोज्यानुपूर्वी (भोजन में कौन सा पदार्थ पहले खाना चाहिये) तथा अन्नरस के गुणों को नहीं जान सकता है। अत्यन्त शीघ्र भोजन करने वाला व्यक्ति इन्द्रियों की प्रसन्नता और वायु के अनुलोमन आदि सब बातों को पूर्णरूप से नहीं जान पाता है ॥२५-२६॥
शीतीकरोति चान्नाद्यं भुञ्जानोऽतिविलम्बितम् । भुङ्क्ते बहु च शीतं च न तृप्तिमधिगच्छति ।।२७।। शैत्याद्वहुत्वाद्धैरस्याद् भुक्तं क्लेशेन पच्यते ।
१३. अत्यन्त धीरे २ भोजन करने से सारा अन्न ठण्डा हो जाता है। अन्न अधिक मात्रा में खाया जाता है। तथा ठण्डे हुए अन्न से तृप्ति नहीं होती है। ठण्डा मात्रा में अधिक तथा विरस होने से खाया हुआ भोजन कष्ट से पचता है ॥२७॥
अत्युष्णभोजनाज्जिह्वाकण्ठौष्ठहृदयोदरम् ।।२८।। दह्यते न रसं वेत्ति रोगांश्चाप्नोति दारुणान् । मुखाक्षिपाकवैसर्परक्तपित्तभ्रमज्वरान् ।।२९।।
१४. अत्यन्त उष्ण भोजन करने से जिह्वा, कण्ठ, ओष्ठ, हृदय तथा उदर में दाह हो जाता है, रस का ज्ञान नहीं होता तथा मुखपाक, अक्षिपाक, विसर्प, रक्तपित्त, भ्रम तथा ज्वर आदि भयंकर रोग हो जाते हैं ॥२८-२९॥
अतिशीताशिनः शूलं ग्रहणीमार्दवं घृणा । कफवाताभिवृद्धिश्च कासो हिक्का च जायते ।।३०।।
१५. अत्यन्त शीत भोजन करने से शूल, ग्रहणी की मृदुता, घृणा, कफ और वात की वृद्धि, कास तथा हिक्का उत्पन्न हो जाती है ॥३०॥
रूक्षं करोति विष्टम्भमुदावर्तं विवर्णताम् । ग्लानिं बह्वशितं वायोः प्रकोपं मूत्रनिग्रहम् ।।३१।।
१६. रूक्ष भोजन से विष्टम्भ, उदावर्त, विवर्णता, ग्लानि, अधिक खाना, वायु का प्रकोप तथा मूत्र की रुकावट हो जाती है ॥३१॥
अतिस्निग्धाशिनस्तन्द्रीतृष्णाजीर्णोदरामयाः । भवन्ति कफमेदोत्था रोगाः कण्ठोद्भवास्तथा ।।३२।।
१७. अत्यन्त स्निग्ध भोजन करने से तन्द्रा, तृष्णा, जीर्ण उदर रोग, कफ, भेद तथा कण्ठ के रोग हो जाते हैं ॥३२॥
विष्टम्भोद्वेष्टनक्लेशचेष्टाहानिविसूचिकाः । ज्ञेया विकारा जन्तूनामतिबह्वशनोद्भवाः ।।३३।।
१८. अत्यन्त अधिक मात्रा में भोजन करने से मनुष्यों को विष्टम्भ, उद्वेष्टन, क्लेश, चेष्टाहानि (गति का अभाव) तथा विसूचिका आदि रोग हो जाते हैं ॥३३॥
अतिस्तोकाशिनोऽत्यग्निविकाराः कृशता भ्रमः । अतृप्तिर्लघुता निद्राशकृन्मूत्रबलक्षयः ।।३४।।
१९. अत्यन्त कम भोजन करने से अत्यग्नि के विकार, कृशता, भ्रम, अतृप्ति, लघुता (शरीर का परिमाण में लघु-छोटा होना), निद्रा, मल, मूत्र, तथा बल का क्षय हो जाता है ॥३४॥
अतिद्रवाशानाज्जन्तोरुत्क्लेशो बहुमूत्रता । पार्श्वभेदः प्रतिश्यायो विड्भेदश्चोपजायते ।।३५।।
२०. अत्यन्त द्रव भोजन करने से व्यक्ति को उत्क्लेश, बहुमूत्र (Polyurea) पार्श्वभेद (पसलियों में पीडा), प्रतिश्याय तथा विड्भेद (अतिसार) हो जाता है ॥३५॥