भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 750
३९०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५]

उष्णं हि भुक्तं स्वदते श्लेष्माणं च जयत्यपि ।।१५।।
वातानुलोम्यं कुरुते क्षिप्रमेव च जीर्यते । अन्नाभिलाषं लघुतामग्निदीप्तिं च देहिनाम् ।।१६।।

४. उष्ण भोजन खाया हुआ मनुष्य को स्वादु लगता है, श्लेष्मा (कफ) को शान्त करता है, वायु का अनुलोमन करता है, शीघ्र ही जीर्ण हो जाता है, अन्न में रुचि उत्पन्न करता है, शरीर में लघुता तथा अग्नि को प्रदीप्त करता है। सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी कहा है—'स्निग्धोष्णं बलवह्निदम्' ।।

स्निग्धं प्रीणयते देहमूर्जयत्यपि पौरुषम् । करोति धातूपचयं बलवर्णौ दधाति च ।।१७।।

५. स्निग्ध भोजन शरीर को प्रसन्न करता है, पौरुष को बढ़ाता है, धातुओं की वृद्धि करता है तथा बल और वर्ण को धारण कराता है ।।१७।।

सुमृष्टमपि नाश्नीयाद्विरुद्धं तद्धि देहिनः । प्राणानस्याऽऽशु वा हन्यात्तुल्यं मधुघृतं यथा ।।१८।।
अविरुद्धान्नभुक स्वास्थ्यमायुर्वर्णं बलं सुखम् । प्राप्नोति, विपरीताशी तेषामेव विपर्ययम् ।।१९।।

६. अच्छी प्रकार साफ किया हुआ भी विरुद्ध भोजन नहीं करना चाहिये। विरुद्ध भोजन शीघ्र ही प्राणियों के प्राणों को नष्ट कर देता है जिस प्रकार समान मात्रा में मधु और घृत का सेवन। अविरुद्ध अन्न का सेवन करने वाला व्यक्ति स्वास्थ्य, आयु, वर्ण, बल तथा सुख को प्राप्त करता है। इससे विपरीत अर्थात् विरुद्ध अन्न का सेवन करने वाला व्यक्ति उपर्युक्त गुणों से विपरीत अर्थात् आयु, वर्ण, बल तथा सुख के ह्रास को प्राप्त करता है ।।१८-१९।।

शुचिपात्रोपचरणः शुचौ देशे शुचिः स्वयं । भुञ्जानो लभते तुष्टिं पुष्टिं तेनाधिगच्छति ।।२०।।
नानिष्टैरमनस्यैर्वा विघातं मनसोर्च्छति । तस्मादनिष्टे नाश्नीयादायुरारोग्यलिप्सया ।।२१।।

७. पवित्र पात्रों में, पवित्र देश में तथा स्वयं पवित्र होकर भोजन करने वाला व्यक्ति तुष्टि को प्राप्त करता है तथा शरीर का पोषण होता है। जो इष्ट न हो तथा मन को रुचिकर न हो ऐसे ढंग से आहार न करे। इससे मन का विघात होता है। इसलिये आयु तथा आरोग्य को चाहने वाला व्यक्ति ऐसे स्थान पर भोजन न करे जो इष्ट (मन के अनुकूल) न हो ।।२०-२१।।

प्राङ्मुखोऽश्नन्नरो धीमान् दीर्घमायुरवाप्नुते । तूष्णीं सर्वेन्द्रियाह्लादं मनःसात्म्यं च विन्दति ।।२२।।

८-९. पूर्व दिशा की ओर मुख करके भोजन करने वाला बुद्धिमान् व्यक्ति दीर्घ आयु को प्राप्त करता है। शान्त (चुप-चाप) होकर भोजन करने वाला व्यक्ति सब इन्द्रियों की प्रसन्नता तथा मन की सात्म्यता को प्राप्त करता है ।।२२।।

एतदेव च मात्रां च पक्तिं युक्तिं च तन्मनाः ।
तस्मात्तत्प्रवणोऽजल्पन् स्वस्थो भुञ्जीत भोजनम् ।।२३।।

१०. दत्तचित्त होकर भोजन करने वाला व्यक्ति पूर्वोक्त गुणों को तथा इसके साथ ही मात्रा, पाचन, शक्ति तथा युक्ति को जानता है। इसलिये स्वस्थ व्यक्ति को भोजन में मन लगाकर तथा बिना अधिक बातचीत किये भोजन करना चाहिये ।।२३।।

आस्वाद्यास्वाद्य योऽश्नाति शुद्धजिह्वेन्द्रियो रसान् । स वेत्ति रसनानात्वं विशेषांश्चाधिगच्छति ।।२४।।

११. जो शुद्ध रसनेन्द्रिय वाला मनुष्य अच्छी प्रकार रसों का स्वाद ले लेकर भोजन करता है वह अनेक रसों को तथा उनके भेदों को जानता है ।।२४।।

अतिद्रुतं हि भुञ्जानो नाहारस्थितिमाप्नुयात् । भोज्यानुपूर्वीं नो वेत्ति न चान्नरससंपदम् ।।२५।।