काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५] खिलस्थानम् ३८९
स्वस्थानस्थेषु दोषेषु स्रोतःसु विमलेषु च। जातायां च प्रकाङ्क्षायामन्नकालं विदुर्बुधाः ॥१०॥
अन्न का काल—दोषों के अपने स्थान में स्थित होने पर, स्त्रोतों के मल रहित हो जाने पर तथा भोजन के प्रति इच्छा उत्पन्न होने पर विद्वान् लोग अन्न का काल कहते हैं। अर्थात् जब तक दोष अपने स्थान में स्थित न हों, स्त्रोत मल रहित न हों तथा भोजन की इच्छा उत्पन्न न हो तब तक अन्न का सेवन नहीं करना चाहिये ॥१०॥
कालेऽश्नतोऽन्नं स्वदते तुष्टिः पुष्टिश्च वर्धते । सुखेन जीर्यते न स्युः प्रतान्ताजीर्णजा गदाः ।।११।।
अब भोजन के २४ विकल्पों का व्याख्यान किया जायगा।
१. योग्यकाल में खाया हुआ अन्न स्वादु लगता है, शरीर को सन्तुष्ट करता है, पोषण की वृद्धि होती है वह सुखपूर्वक जीर्ण हो जाता है तथा बार २ भोजन के करने तथा अजीर्ण से उत्पन्न होने वाले रोग नहीं होते हैं। सुश्रुत में भी कहा है—‘काले भुक्तं प्रीणयति' ॥११॥
सात्म्यं नामाहुरौचित्यं सातत्येनोपसेवितम् । आहारजातं यद्यस्य चानुशेते स्वभावतः ।।१२।।
२. सात्म्य का लक्षण—सात्म्य औचित्य को कहते हैं। निरन्तर सेवन किया जाता हुआ जो आहार स्वाभाविक रूप से जिसके अनुकूल होता है उसे सात्म्य कहते हैं। चरक वि. अ. १ में कहा है कि सात्म्य उसे कहते हैं जो अपने (मन, आत्मा एवं शरीर के संयोग रूप) को सुखकर हो। सात्म्य और उपशय परस्पर पर्यायवाची शब्द हैं। यह मुख्य रूप से तीन प्रकार का है। प्रवर, अवर तथा मध्यम। इनमें सम्पूर्ण रस सात्म्य तथा एक रस अवर सात्म्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति को प्रयत्न करना चाहिये कि उसे छओं रस सात्म्य हों अर्थात् प्रवर सात्म्य की प्राप्ति का प्रयत्न करना चाहिये ॥१२॥
सात्म्याशी सात्म्यसाद्गुण्याच्छतं वर्षाणि जीवति । न चाप्यनुचिताहारविकारैरुपसृज्यते ।।१३।। (इति ताडपत्रपुस्तके २१० तमं पत्रम् ।)
सात्म्य का सेवन करने वाला व्यक्ति सात्म्य के साद्गुण (श्रेष्ठ गुण कारक होने) के कारण सौ वर्ष तक जीवित रहता है तथा इसे अनुचित आहार से उत्पन्न होने वाले विकार नहीं होते हैं। सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है—'सात्म्यमन्नं न बाधते' अर्थात् सात्म्य अन्न शरीर में किसी प्रकार का कष्ट नहीं पहुंचाता है ॥१३॥
लघूनां नातिसौहित्यं गुरूणामल्पशस्तथा। मात्रावदश्नतो भुक्तं सुखेन परिपच्यते ।।१४।। स्वस्थ(स्वास्थ्य)यात्राग्निचेष्टानांमविरोधि च तद्भवेत् ।
३. लघु पदार्थों को अत्यन्त सौहित्य से अर्थात् खूब पेट भरकर नहीं खाना चाहिये तथा गुरु पदार्थों को भी अल्प मात्रा में सेवन करना चाहिये। इस प्रकार उचित मात्रा में भोजन करने वाले व्यक्ति को खाया हुआ आहार सुखपूर्वक पच जाता है तथा वह मात्रा में खाया हुआ आहार शरीर की स्वास्थ्यरूपी यात्रा, जाठराग्नि तथा शरीर की चेष्टाओं का विरोधी नहीं होता। चरक सू. अ. ५ में कहा है कि भोजन मात्रा (उपयुक्त परिमाण) में ही करना चाहिये। तथा भोजन की मात्रा अग्निबल के अनुसार होती है अर्थात् जाठराग्नि के अनुसार मात्रा कम या अधिक करनी चाहिये। जितना भोजन यथासमय सुखपूर्वक जीर्ण हो जाय उतनी ही आहारमात्रा समझनी चाहिये। अर्थात् आहारमात्रा प्रत्येक व्यक्ति की अपेक्षा रखती है। सबके लिये कोई एक समान मात्रा निर्धारित नहीं की जा सकती है। उचित मात्रा में सेवन किया गया गुरु भोजन भी परिणाम में लघु हो जाता है तथा इसके विपरीत लघु भोजन भी यदि अधिक मात्रा में सेवन किया जाय तो वह परिणाम में गुरु (भारी) हो जाता है। इसलिये प्रत्येक द्रव्य मात्रा की अपेक्षा रखता है। इसीलिये सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी कहा है कि मात्रा के अनुसार किया हुआ भोजन सुखपूर्वक जीर्ण हो जाता है तथा धातुओं की समता करता है ॥१४॥
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