काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 748, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें३८८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५]
हमने पहले रस विमान में काल आदि २४ प्रकार का जो आहार का मान कहा है, अब हम उसके विशेष विकल्पों (भेदों) को कहेंगे। क्योंकि आहार के बिना किञ्चिन्मात्र भी प्राणियों के प्राण स्थिर नहीं रहते हैं। यदि आहार का अच्छी प्रकार से प्रयोग किया जाय तो वह जीवन प्रदान करता है, सम्पूर्ण इन्द्रियों को प्रसन्न करता है, धातुओं की वृद्धि करता है, स्मृति, बुद्धि, सब प्रकार के बल तथा ओज को बढ़ाता है तथा वर्ण (Complexion) को निखारता है। इसके विपरीत यदि आहार का अच्छी प्रकार प्रयोग न किया जाय तो वह शरीर को दुःखों से युक्त करता है।
वक्तव्य—आरोग्य, आयु तथा बल को चाहने वाले व्यक्ति को चाहिये कि १ उचित काल में, २ सात्म्य, ३. उचित मात्रा में, ४. उष्ण, ५. स्निग्ध, ६. जो विरुद्ध न हो, ७. पवित्र स्थान में पवित्र पात्रों (वर्तनों) में पवित्र परिचारक द्वारा लाया गया, ८ पूर्व दिशा की ओर मुख करके, ९. शान्त होकर, १०. अच्छी प्रकार मन लगाकर दत्तचित्त होकर, ११. स्वादपूर्वक, १२. न अत्यन्त शीघ्रता से, १३. न अत्यन्त धीरे-धीरे, १४ न अत्यन्त उष्ण, १५. न अत्यन्त शीत, १६. न अत्यन्त रूक्ष, १७. न अत्यन्त स्निग्ध, १८. न अत्यन्त अधिक परिमाण में, १९. न अत्यन्त स्वल्प परिमाण में, २०. न अत्यन्त द्रव, २१. न अत्यन्त शुष्कं, २२. न भोजन के प्रति अनिच्छा होने पर, २३. न निरन्तर-बारबार तथा २४ न केवल एक रस वाला भोजन करे ॥३॥
भवन्ति चात्र— आरोग्यं दोषसमता सर्वाबाधनिवर्तनम् । तदर्थमृषयः पुण्यमायुर्वेदमध्येयते ॥४॥ दोषों का समावस्था में होना तथा सम्पूर्ण रोगों की निवृत्ति (आरोग्य) कहलाता है। इस आरोग्य के लिये ही ऋषि लोग पुण्यकारक आयुर्वेद का अध्ययन करते हैं ॥४॥
रसायनानि विधिवत्तदर्थं चोपयुञ्जते । धर्मार्थकाममोक्षाणामवाप्तिश्च तदाश्रया ॥५॥ तदात्मवांस्तदर्थाय प्रयतेत विचक्षणः । उस आरोग्य के लिये ही विधिवत् रसायनों का प्रयोग किया जाता है। धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष आदि चतुर्विध पुरुषार्थ की प्राप्ति भी आरोग्य से ही होती है। चरक सू. अ. १६ में कहा है कि आरोग्य दान के द्वारा वैद्य धर्म, अर्थ, काम तथा अभ्युदय एवं निश्रेयस रूप मोक्ष का दाता होता है। निर्बल पुरुष जहां भौतिक अर्थ एवं काम की प्राप्ति में असमर्थ रहता है वहां वह धर्म तथा मोक्ष से भी वञ्चित रहता है। इसलिये बुद्धिमान् तथा आत्मवान् (जितेन्द्रिय मनुष्य) को उस आरोग्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिये ॥५॥
अन्नाभिलाषो भुक्तस्य परिपाकः सुखेन च ॥६॥ सृष्टविण्मूत्रवातत्वं शरीरस्य च लाघवम् । सुप्रसन्नेन्द्रियत्वं च सुखस्वप्रप्रबोधनम् ॥७॥ बलवर्णायुषां लाभः सौमनस्यं समाग्निता । विद्यादारोग्यलिङ्गानि विपरीते विपर्ययम् ॥८॥ आरोग्य के लक्षण— अन्न में रुचि, खाये हुए अन्न का सुख-पूर्वक परिपाक हो जाना, मल, मूत्र, तथा वायु का निकलना, शरीर की लघुता, इन्द्रियों की प्रसन्नता, सुखपूर्वक सोना तथा जागना, बल, वर्ण तथा आयु की प्राप्ति, मन की प्रसन्नता, तथा अग्नि की समता ये आरोग्य के लक्षण जानने चाहिये। अनारोग्य (अस्वास्थ्य-रोग) में इससे विपरीत लक्षण होते हैं।
आरोग्यं भोजनाधीनं भोज्यं विधिमवेक्षते । विधिर्विकल्पं भजते विकल्पस्तु प्रवक्ष्यते ॥९॥ आरोग्य (स्वास्थ्य) भोजन पर निर्भर होता है तथा भोजन विधि की अपेक्षा करता है। भोजन की विधि उसके विकल्प पर आश्रित होती है इसलिये हम भोजन के विकल्पों का व्याख्यान करेंगे ॥९॥