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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५] खिलस्थानम् ३८९

स्वस्थानस्थेषु दोषेषु स्रोतःसु विमलेषु च। जातायां च प्रकाङ्क्षायामन्नकालं विदुर्बुधाः ॥१०॥

अन्न का काल—दोषों के अपने स्थान में स्थित होने पर, स्त्रोतों के मल रहित हो जाने पर तथा भोजन के प्रति इच्छा उत्पन्न होने पर विद्वान् लोग अन्न का काल कहते हैं। अर्थात् जब तक दोष अपने स्थान में स्थित न हों, स्त्रोत मल रहित न हों तथा भोजन की इच्छा उत्पन्न न हो तब तक अन्न का सेवन नहीं करना चाहिये ॥१०॥

कालेऽश्नतोऽन्नं स्वदते तुष्टिः पुष्टिश्च वर्धते । सुखेन जीर्यते न स्युः प्रतान्ताजीर्णजा गदाः ।।११।।

अब भोजन के २४ विकल्पों का व्याख्यान किया जायगा।

१. योग्यकाल में खाया हुआ अन्न स्वादु लगता है, शरीर को सन्तुष्ट करता है, पोषण की वृद्धि होती है वह सुखपूर्वक जीर्ण हो जाता है तथा बार २ भोजन के करने तथा अजीर्ण से उत्पन्न होने वाले रोग नहीं होते हैं। सुश्रुत में भी कहा है—‘काले भुक्तं प्रीणयति' ॥११॥

सात्म्यं नामाहुरौचित्यं सातत्येनोपसेवितम् । आहारजातं यद्यस्य चानुशेते स्वभावतः ।।१२।।

२. सात्म्य का लक्षण—सात्म्य औचित्य को कहते हैं। निरन्तर सेवन किया जाता हुआ जो आहार स्वाभाविक रूप से जिसके अनुकूल होता है उसे सात्म्य कहते हैं। चरक वि. अ. १ में कहा है कि सात्म्य उसे कहते हैं जो अपने (मन, आत्मा एवं शरीर के संयोग रूप) को सुखकर हो। सात्म्य और उपशय परस्पर पर्यायवाची शब्द हैं। यह मुख्य रूप से तीन प्रकार का है। प्रवर, अवर तथा मध्यम। इनमें सम्पूर्ण रस सात्म्य तथा एक रस अवर सात्म्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति को प्रयत्न करना चाहिये कि उसे छओं रस सात्म्य हों अर्थात् प्रवर सात्म्य की प्राप्ति का प्रयत्न करना चाहिये ॥१२॥

सात्म्याशी सात्म्यसाद्गुण्याच्छतं वर्षाणि जीवति । न चाप्यनुचिताहारविकारैरुपसृज्यते ।।१३।। (इति ताडपत्रपुस्तके २१० तमं पत्रम् ।)

सात्म्य का सेवन करने वाला व्यक्ति सात्म्य के साद्गुण (श्रेष्ठ गुण कारक होने) के कारण सौ वर्ष तक जीवित रहता है तथा इसे अनुचित आहार से उत्पन्न होने वाले विकार नहीं होते हैं। सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है—'सात्म्यमन्नं न बाधते' अर्थात् सात्म्य अन्न शरीर में किसी प्रकार का कष्ट नहीं पहुंचाता है ॥१३॥

लघूनां नातिसौहित्यं गुरूणामल्पशस्तथा। मात्रावदश्नतो भुक्तं सुखेन परिपच्यते ।।१४।। स्वस्थ(स्वास्थ्य)यात्राग्निचेष्टानांमविरोधि च तद्भवेत् ।

३. लघु पदार्थों को अत्यन्त सौहित्य से अर्थात् खूब पेट भरकर नहीं खाना चाहिये तथा गुरु पदार्थों को भी अल्प मात्रा में सेवन करना चाहिये। इस प्रकार उचित मात्रा में भोजन करने वाले व्यक्ति को खाया हुआ आहार सुखपूर्वक पच जाता है तथा वह मात्रा में खाया हुआ आहार शरीर की स्वास्थ्यरूपी यात्रा, जाठराग्नि तथा शरीर की चेष्टाओं का विरोधी नहीं होता। चरक सू. अ. ५ में कहा है कि भोजन मात्रा (उपयुक्त परिमाण) में ही करना चाहिये। तथा भोजन की मात्रा अग्निबल के अनुसार होती है अर्थात् जाठराग्नि के अनुसार मात्रा कम या अधिक करनी चाहिये। जितना भोजन यथासमय सुखपूर्वक जीर्ण हो जाय उतनी ही आहारमात्रा समझनी चाहिये। अर्थात् आहारमात्रा प्रत्येक व्यक्ति की अपेक्षा रखती है। सबके लिये कोई एक समान मात्रा निर्धारित नहीं की जा सकती है। उचित मात्रा में सेवन किया गया गुरु भोजन भी परिणाम में लघु हो जाता है तथा इसके विपरीत लघु भोजन भी यदि अधिक मात्रा में सेवन किया जाय तो वह परिणाम में गुरु (भारी) हो जाता है। इसलिये प्रत्येक द्रव्य मात्रा की अपेक्षा रखता है। इसीलिये सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी कहा है कि मात्रा के अनुसार किया हुआ भोजन सुखपूर्वक जीर्ण हो जाता है तथा धातुओं की समता करता है ॥१४॥


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३९०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५]

उष्णं हि भुक्तं स्वदते श्लेष्माणं च जयत्यपि ।।१५।।
वातानुलोम्यं कुरुते क्षिप्रमेव च जीर्यते । अन्नाभिलाषं लघुतामग्निदीप्तिं च देहिनाम् ।।१६।।

४. उष्ण भोजन खाया हुआ मनुष्य को स्वादु लगता है, श्लेष्मा (कफ) को शान्त करता है, वायु का अनुलोमन करता है, शीघ्र ही जीर्ण हो जाता है, अन्न में रुचि उत्पन्न करता है, शरीर में लघुता तथा अग्नि को प्रदीप्त करता है। सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी कहा है—'स्निग्धोष्णं बलवह्निदम्' ।।

स्निग्धं प्रीणयते देहमूर्जयत्यपि पौरुषम् । करोति धातूपचयं बलवर्णौ दधाति च ।।१७।।

५. स्निग्ध भोजन शरीर को प्रसन्न करता है, पौरुष को बढ़ाता है, धातुओं की वृद्धि करता है तथा बल और वर्ण को धारण कराता है ।।१७।।

सुमृष्टमपि नाश्नीयाद्विरुद्धं तद्धि देहिनः । प्राणानस्याऽऽशु वा हन्यात्तुल्यं मधुघृतं यथा ।।१८।।
अविरुद्धान्नभुक स्वास्थ्यमायुर्वर्णं बलं सुखम् । प्राप्नोति, विपरीताशी तेषामेव विपर्ययम् ।।१९।।

६. अच्छी प्रकार साफ किया हुआ भी विरुद्ध भोजन नहीं करना चाहिये। विरुद्ध भोजन शीघ्र ही प्राणियों के प्राणों को नष्ट कर देता है जिस प्रकार समान मात्रा में मधु और घृत का सेवन। अविरुद्ध अन्न का सेवन करने वाला व्यक्ति स्वास्थ्य, आयु, वर्ण, बल तथा सुख को प्राप्त करता है। इससे विपरीत अर्थात् विरुद्ध अन्न का सेवन करने वाला व्यक्ति उपर्युक्त गुणों से विपरीत अर्थात् आयु, वर्ण, बल तथा सुख के ह्रास को प्राप्त करता है ।।१८-१९।।

शुचिपात्रोपचरणः शुचौ देशे शुचिः स्वयं । भुञ्जानो लभते तुष्टिं पुष्टिं तेनाधिगच्छति ।।२०।।
नानिष्टैरमनस्यैर्वा विघातं मनसोर्च्छति । तस्मादनिष्टे नाश्नीयादायुरारोग्यलिप्सया ।।२१।।

७. पवित्र पात्रों में, पवित्र देश में तथा स्वयं पवित्र होकर भोजन करने वाला व्यक्ति तुष्टि को प्राप्त करता है तथा शरीर का पोषण होता है। जो इष्ट न हो तथा मन को रुचिकर न हो ऐसे ढंग से आहार न करे। इससे मन का विघात होता है। इसलिये आयु तथा आरोग्य को चाहने वाला व्यक्ति ऐसे स्थान पर भोजन न करे जो इष्ट (मन के अनुकूल) न हो ।।२०-२१।।

प्राङ्मुखोऽश्नन्नरो धीमान् दीर्घमायुरवाप्नुते । तूष्णीं सर्वेन्द्रियाह्लादं मनःसात्म्यं च विन्दति ।।२२।।

८-९. पूर्व दिशा की ओर मुख करके भोजन करने वाला बुद्धिमान् व्यक्ति दीर्घ आयु को प्राप्त करता है। शान्त (चुप-चाप) होकर भोजन करने वाला व्यक्ति सब इन्द्रियों की प्रसन्नता तथा मन की सात्म्यता को प्राप्त करता है ।।२२।।

एतदेव च मात्रां च पक्तिं युक्तिं च तन्मनाः ।
तस्मात्तत्प्रवणोऽजल्पन् स्वस्थो भुञ्जीत भोजनम् ।।२३।।

१०. दत्तचित्त होकर भोजन करने वाला व्यक्ति पूर्वोक्त गुणों को तथा इसके साथ ही मात्रा, पाचन, शक्ति तथा युक्ति को जानता है। इसलिये स्वस्थ व्यक्ति को भोजन में मन लगाकर तथा बिना अधिक बातचीत किये भोजन करना चाहिये ।।२३।।

आस्वाद्यास्वाद्य योऽश्नाति शुद्धजिह्वेन्द्रियो रसान् । स वेत्ति रसनानात्वं विशेषांश्चाधिगच्छति ।।२४।।

११. जो शुद्ध रसनेन्द्रिय वाला मनुष्य अच्छी प्रकार रसों का स्वाद ले लेकर भोजन करता है वह अनेक रसों को तथा उनके भेदों को जानता है ।।२४।।

अतिद्रुतं हि भुञ्जानो नाहारस्थितिमाप्नुयात् । भोज्यानुपूर्वीं नो वेत्ति न चान्नरससंपदम् ।।२५।।

भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५] खिलस्थानम् ३९१

नातिद्रूताशी तत्सर्वमनूनं प्रतिपद्यते । प्रसादमिन्द्रियाणां च तथा वातानुलोमताम् ।।२६।।

१२. अत्यन्त शीघ्र भोजन करने से आहार अपनी स्थिति में नहीं पहुंचता है। वह भोज्यानुपूर्वी (भोजन में कौन सा पदार्थ पहले खाना चाहिये) तथा अन्नरस के गुणों को नहीं जान सकता है। अत्यन्त शीघ्र भोजन करने वाला व्यक्ति इन्द्रियों की प्रसन्नता और वायु के अनुलोमन आदि सब बातों को पूर्णरूप से नहीं जान पाता है ॥२५-२६॥

शीतीकरोति चान्नाद्यं भुञ्जानोऽतिविलम्बितम् । भुङ्क्ते बहु च शीतं च न तृप्तिमधिगच्छति ।।२७।। शैत्याद्वहुत्वाद्धैरस्याद् भुक्तं क्लेशेन पच्यते ।

१३. अत्यन्त धीरे २ भोजन करने से सारा अन्न ठण्डा हो जाता है। अन्न अधिक मात्रा में खाया जाता है। तथा ठण्डे हुए अन्न से तृप्ति नहीं होती है। ठण्डा मात्रा में अधिक तथा विरस होने से खाया हुआ भोजन कष्ट से पचता है ॥२७॥

अत्युष्णभोजनाज्जिह्वाकण्ठौष्ठहृदयोदरम् ।।२८।। दह्यते न रसं वेत्ति रोगांश्चाप्नोति दारुणान् । मुखाक्षिपाकवैसर्परक्तपित्तभ्रमज्वरान् ।।२९।।

१४. अत्यन्त उष्ण भोजन करने से जिह्वा, कण्ठ, ओष्ठ, हृदय तथा उदर में दाह हो जाता है, रस का ज्ञान नहीं होता तथा मुखपाक, अक्षिपाक, विसर्प, रक्तपित्त, भ्रम तथा ज्वर आदि भयंकर रोग हो जाते हैं ॥२८-२९॥

अतिशीताशिनः शूलं ग्रहणीमार्दवं घृणा । कफवाताभिवृद्धिश्च कासो हिक्का च जायते ।।३०।।

१५. अत्यन्त शीत भोजन करने से शूल, ग्रहणी की मृदुता, घृणा, कफ और वात की वृद्धि, कास तथा हिक्का उत्पन्न हो जाती है ॥३०॥

रूक्षं करोति विष्टम्भमुदावर्तं विवर्णताम् । ग्लानिं बह्वशितं वायोः प्रकोपं मूत्रनिग्रहम् ।।३१।।

१६. रूक्ष भोजन से विष्टम्भ, उदावर्त, विवर्णता, ग्लानि, अधिक खाना, वायु का प्रकोप तथा मूत्र की रुकावट हो जाती है ॥३१॥

अतिस्निग्धाशिनस्तन्द्रीतृष्णाजीर्णोदरामयाः । भवन्ति कफमेदोत्था रोगाः कण्ठोद्भवास्तथा ।।३२।।

१७. अत्यन्त स्निग्ध भोजन करने से तन्द्रा, तृष्णा, जीर्ण उदर रोग, कफ, भेद तथा कण्ठ के रोग हो जाते हैं ॥३२॥

विष्टम्भोद्वेष्टनक्लेशचेष्टाहानिविसूचिकाः । ज्ञेया विकारा जन्तूनामतिबह्वशनोद्भवाः ।।३३।।

१८. अत्यन्त अधिक मात्रा में भोजन करने से मनुष्यों को विष्टम्भ, उद्वेष्टन, क्लेश, चेष्टाहानि (गति का अभाव) तथा विसूचिका आदि रोग हो जाते हैं ॥३३॥

अतिस्तोकाशिनोऽत्यग्निविकाराः कृशता भ्रमः । अतृप्तिर्लघुता निद्राशकृन्मूत्रबलक्षयः ।।३४।।

१९. अत्यन्त कम भोजन करने से अत्यग्नि के विकार, कृशता, भ्रम, अतृप्ति, लघुता (शरीर का परिमाण में लघु-छोटा होना), निद्रा, मल, मूत्र, तथा बल का क्षय हो जाता है ॥३४॥

अतिद्रवाशानाज्जन्तोरुत्क्लेशो बहुमूत्रता । पार्श्वभेदः प्रतिश्यायो विड्भेदश्चोपजायते ।।३५।।

२०. अत्यन्त द्रव भोजन करने से व्यक्ति को उत्क्लेश, बहुमूत्र (Polyurea) पार्श्वभेद (पसलियों में पीडा), प्रतिश्याय तथा विड्भेद (अतिसार) हो जाता है ॥३५॥

३९२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५]

अतिशुष्काशनं चापि विष्टभ्य परिपच्यते। पूर्वजातरसं जग्ध्वा कुर्यान्मूत्रकफक्षयम्।।३६।।

२१. अत्यन्त शुष्क भोजन विष्टब्ध होकर पचता है। वह पहले उत्पन्न हुए रस को जलाकर (शुष्क करके) मूत्र तथा कफ के क्षय को करता है ।।३६।।

मोहात् प्रमादाल्लौल्याद्वा यो भुङ्क्ते ह्यप्रकाङ्क्षितः। अविपाकारुचिच्छर्दिशूलानाहान् समृच्छति ।।३७।।

२२. जो व्यक्ति भोजन के प्रति रुचि न होने पर भी मोह, प्रसाद अथवा जिह्वालौल्य के कारण भोजन करता है उसे अविपाक (भोजन का न पचना), अरुचि, वमन, शूल तथा आनाह रोग हो जाते हैं ।।३७।।

प्रता¹न्तभोक्तुस्तृण्मूर्च्छा वह्निसादोऽङ्गसीदनम्। ज्वरः क्षतोऽतिसारो वा मन्दत्वं दर्शनस्य च ।।३८।।

२३. निरन्तर (बारबार) भोजन करने वाले व्यक्ति को तृष्णा, मूर्च्छा, अग्निससाद (जाठराग्नि का मन्द होना), अङ्गों की पीडा, ज्वर, क्षय, अतिसार तथा दृष्टि का मन्द होना, हो जाता है ।।३८।।

दौर्बल्यमदृढत्वं च भवत्येकरसाशनात्। दोषाप्रवृद्धिर्धातूनां साम्यं वृद्धिर्बलायुषोः ।।३९।। आरोग्यं चाग्निदीप्तिश्च जन्तोः सर्वरसाशनात्। तस्मादेकरसाभ्यासमारोग्यार्थी विवर्जयेत् ।।४०।।

२४. सदा एक ही रस का सेवन करने से दुर्बलता तथा अदृढता हो जाती है। इसके विपरीत सब रसों का सेवन करने से दोषों की कमी, धातुओं में समता, बल और आयु की वृद्धि, आरोग्य तथा अग्नि दीप्त होती है। इसलिये आरोग्य को चाहने वाला व्यक्ति केवल एक रस के अभ्यास को त्याग दे। सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है कि कभी भी एक ही रस के सेवन में आसक्ति नहीं होनी चाहिये ।।३९-४०।।

कालसात्म्यादिनाऽन्नेन विधिनाऽश्नाति यो नरः। स प्राप्नोति गुणांस्तज्जान्न च दोषैः प्रबाध्यते ।।४१।।

उपर्युक्त काल, सात्म्य आदि की विधि के अनुसार जो व्यक्ति भोजन करता है वह उन २ के गुणों से युक्त होता है तथा उसे उन २ काल सात्म्य आदि से सम्बन्धित दोष कष्ट नहीं पहुंचाते हैं ।।४१।।

स्थिरतां स्वस्थताऽङ्गानामिन्द्रियोपचयं बलम्। कफमेदोऽभिवृद्धिं च कुर्यान्मधुरसात्म्यता ।।४२।।

मधुर रस की सात्म्यता के कारण शरीर की स्थिरता, अङ्गों की स्वस्थता, इन्द्रियों का उपचय, बल तथा कफ और मेद की वृद्धि होती है ।।४२।।

दन्ताक्षिकेशदौर्बल्यं कफपित्तामयोद्भवम्। लघुतामग्निदीप्तिं च जनयेदम्लसात्म्यता ।।४३।।

अम्ल रस की सात्म्यता के कारण दांतों, आंखों तथा बालों की दुर्बलता, कफ तथा पित्त रोगों की उत्पत्ति, लघुता एवं अग्निदीप्ति हो जाती है ।।४३।।

रक्तप्रकोपं तैमिर्यं तृष्णां दुर्बलशुक्रताम्। पालित्यं बलहानिं च कुर्याल्लवणसात्म्यता ।।४४।।

लवण रस की सात्म्यता से रक्तप्रकोप, तिमिर रोग, तृष्णा, शुक्र की दुर्बलता, पालित्य (बालों का सफेद होना) तथा बल में कमी हो जाती है। लवणसात्म्यता के विषय में चरक वि. अ. १ में भी कहा है ।।४४।।

पक्तेरुपचयं कार्श्यं रौक्ष्यं शुक्रबलक्षयम्। पित्तानिलप्रवृद्धिं च कुर्यात् कटुकसात्म्यता ।।४५।।


१. नितान्तभोक्तः निरन्तरं भक्षणशीलस्येति यावत्।

भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५] खिलस्थानम् ३९३

कटु रस की सात्म्यता से पाचन शक्ति की वृद्धि, कृशता, रूक्षता, शुक्र और बल का क्षय तथा पित्त और वायु की वृद्धि हो जाती है ॥४५॥

क्लेदाल्पतां वातवृद्धिं दृष्टिहानिं कफक्षयम्। त्वग्विकारोपशान्तिं च जनयेत्तिक्तसात्म्यता ॥४६॥

तिक्तरस की सात्म्यता के कारण क्लेद की कमी, वायु की वृद्धि, दृष्टि की कमी, कफ का क्षय तथा त्वचा के रोगों की शान्ति हो जाती है ॥४६॥

कफपित्तक्षयं वायोः प्रकोपं पक्तिमार्दवम्। कुर्याद्रक्तोपशान्तिं च कषायरससात्म्यता ॥४७॥

कषाय रस की सात्म्यता के कारण कफ और पित्त का क्षय, वायु का प्रकोप, पाचन शक्ति की मृदुता तथा रक्त रोगों की शान्ति हो जाती है ॥४७॥

ओजस्तेजो बलं वर्णमायुर्मेधा धृतिः स्मृतिः। जायते सौकुमार्यं च घृतसात्म्यस्य देहिनः ॥४८॥

जिस व्यक्ति को घृत सात्म्य हो उसमें ओज, तेज, बल, वर्ण, आयु, मेधा, धृति, स्मृति तथा सुकुमारता हो जाती है॥

तथैव क्षीरसात्म्यस्य परं चैतद्रसायनम्। दृढोपचितगात्रश्च निर्मेदरको जितश्रमः ॥४९॥

जिस व्यक्ति को क्षीर (दूध) सात्म्य हो उसके लिये वह रसायन है तथा उसका शरीर दृढ़ होता है। मेदा (चर्बी) कम हो जाती है तथा वह व्यक्ति परिश्रमी होता है ॥४९॥

बलवान् तैलसात्म्यः स्यात् क्षीणवातकफामयः। चक्षुष्मान् बलवाञ्छ्लेष्मी दृढसत्त्वो दृढेन्द्रियः ॥५०॥

जिस व्यक्ति को तैल सात्म्य हो वह बलवान् होता है, उसके वात तथा कफ के रोग क्षीण हो जाते हैं। उसके चक्षु (नेत्र) उत्तम हो जाते हैं वह बलवान् होता है, उसमें कफ की वृद्धि हो जाती है तथा उसका सत्त्व एवं इन्द्रियां दृढ़ हो जाती हैं ॥५०॥

दृढाश्रयो मन्दरुजो मांससात्म्यो भवेन्नरः।
(इति ताडपत्रपुस्तके २११ तमं पत्रम्।)
अहितं यस्य सात्म्यं स्यादसात्म्यं च हितं भवेत् ॥५१॥
स शनैर्हितमादद्यादहितं च शनैस्त्यजेत्।

जिस व्यक्ति को मांस सात्म्य होता है वह दृढ़ आश्रयवाला होता है तथा उसके रोग मन्द हो जाते हैं। अहितकर पदार्थ जिसे सात्म्य होते हैं तथा हितकर पदार्थ जिसे असात्म्य होते उसे शनैः २ हित का ग्रहण तथा अहित का त्याग करना चाहिये। चरक वि. अ. १ में कहा है—तस्मात्तेषां त सात्म्यतः क्रमेणापगमनं श्रेयः, सात्म्यमपि हि क्रमेणोपनिवर्त्त्यमानमदोषमल्पदोषं वा भवति। अर्थात् अहित का त्याग एवं हित का ग्रहण भी क्रमशः ही होना चाहिये। अहित का सहसा त्याग ठीक नहीं है॥

आदौ तु स्निग्धमधुरं विचित्रं मध्यतस्तथा ॥५२॥
रूक्षद्रवावसानं च भुञ्जानो नावसीदति।

भोजन के प्रारम्भ में स्निग्ध तथा मधुर पदार्थ, मध्य में नाना प्रकार के भोजन तथा अन्त में रूक्ष और द्रव पदार्थों का सेवन करनेवाला व्यक्ति कष्ट नहीं पाता। इसी संहिता के कल्प स्थान के भोजनकल्पाध्याय में कहा है—स्निग्धञ्च पूर्वं मधुरं च भोज्यं मध्ये द्रवं शीतमथो विचित्रम्। तीक्ष्णोष्णरूक्षाणि लघूनि पश्चाद्भोज्यानुपूर्वी खलु सात्म्यतश्च ॥५२॥

३९४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५]

भागद्वयमिहान्नस्य तृतीयमुदकस्य च ।। ५३ ।।
वायोः संचरणार्थं च चतुर्थमवशेषयेत् ।

कुक्षि के चार भागों में से दो भाग अन्न (ठोस आहार) द्रव्य से तथा तीसरा जल (द्रव पदार्थ–Liquids) से भरना चाहिये और चौथा भाग वायु की गति के लिये खाली रखना चाहिये। यह अर्धसौहित्य की दृष्टि से कहा गया है। इसमें मूर्त आहार आमाशय के १/२ भाग में रहते हैं। अष्टाङ्ग हृदय सू. अ. १० में भी कहा है कि यदि आमाशय के अवकाश (रिक्त) स्थान को चार भागों में विभक्त किया जाय तो उसमें से दो भाग अन्न द्वारा तथा एक भाग पेय पदार्थों से भरकर चौथा स्थान (भाग) वायु आदि की गति के लिये खाली रखना चाहिये ।। ५३ ।।

ततो मुहूर्त्तमाश्वस्य गत्वा पादशतं शनैः ।। ५४ ।।
स्वासीनस्य सुखेनान्नमव्यथं परिपच्यते । वीणावेणुस्वनोमिश्रं गीतं नाट्यविडम्बितम् ।। ५५ ।।
विचित्रांश्च कथाः शृण्वन् भुक्त्वा वर्धयते बलम् । सुखस्पर्शविहारं च सम्यगाप्नोत्यतोऽन्यथा ।। ५६ ।।

भोजन के बाद मुहूर्त भर आराम करके धीरे २ सौ कदम टहले तथा फिर सुखपूर्वक अच्छी तरह (आराम से) बैठ जाय। इस प्रकार उसका खाया हुआ अन्न बिना बाधा के पच जाता है। भोजन करते हुए अथवा भोजन के बाद वीणा तथा वेणु के शब्द से मिश्रित गीत (गाना), नाटक का देखना तथा विचित्र कथाओं के सुनने² से बल बढ़ता है। तथा वह सुखकारक स्पर्श और विहार को अच्छी प्रकार प्राप्त करता है। सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है कि भोजन के बाद जब तक अन्न का क्लम (भारीपन–नशा) रहे तब तक सुखपूर्वक आराम करे। उसके बाद सौ कदम अर्थात् थोड़ी दूर टहल कर बांई करवट से लेट जाना चाहिये। तथा भोजन के बाद मनुष्य को मन को प्रसन्न करने वाले शब्द, रूप, रस, गन्ध एवं स्पर्श का सेवन करना चाहिये। भोजन के बाद शारीरिक तथा मानसिक आराम करना बहुत आवश्यक है। अंगरेजी में एक कहावत है—(After dinner reot awhile) भोजन के बाद विश्राम न करने से खाया हुआ अन्न सम्यक् प्रकार से नहीं पचता है जिससे अजीर्ण, वमन, अतिसार आदि शिकायतें हो जाती हैं। इसीलिये कहा भी है—
व्यायामं च व्यवायं च धावनं यानमेव च । युद्धं गीतं च पाठं च मुहूर्तं भुक्तवांस्त्यजेत् ।। ५४-५५ ।।

अतिस्निग्धातिशुष्काणां गुरूणां चातिसेवनात् । जन्तोरत्यम्बुपानाच्च वातविण्मूत्रधारणात् ।। ५७ ।।
रात्रौ जागरणात् स्वप्नाह्निवा विषमभोजनात् । असात्म्यसेवनाच्चैव न सम्यक् परिपच्यते ।। ५८ ।।

इसके विपरीत अतिस्निग्ध, अतिशुष्क तथा गुरु पदार्थों के अत्यन्त सेवन से, वायु, मल तथा मूत्र के धारण करने


१. शृण्वन् भुक्त्वात्यत्रत्यपदक्रमस्वरसतो भोजनसमये गीतवाद्यादिश्रवणं रुचिवर्धकत्वेन बलवृद्ध्यादिजनकत्या आधुनिकपाश्चात्यसंप्रदायवदनुकूलं प्रतीयते, 'अजल्पन्नहसंस्तन्मना भुञ्जीत' इति चरकोक्तेः, 'शब्दरूपरसान् गन्धान् स्पर्शांश्च मनसः प्रियान्। भुक्तवानुपसेवेत' इति सुश्रुतोक्तेश्च संवादो यद्यपेक्षेत तदा 'भुक्त्वा शृण्वन्' इति पदव्यत्ययेनान्वयो विधेयः।

२. 'शृण्वन् भुक्त्वा' इस पदक्रम के स्वारस्य के अनुसार भोजन के समय गीत वाद्य आदि का सुनना रुचिवर्धक तथा बलवर्धक होने से आधुनिक पाश्चात्य सम्प्रदाय के अनुकूल प्रतीत होता है। इसके विपरीत चरक के 'अजल्पन्नहसंस्तन्मना भुञ्जीत' तथा 'शब्दरूपान् रसान् गन्धान् स्पर्शांश्च मनसः प्रियान्। भुक्तवानुपसेवेत' को यदि दृष्टि में रखा जाय तो 'भुक्त्वा शृण्वन्' यह अन्वय करना चाहिये। अर्थात् यदि पाश्चात्यमत को दृष्टि में रखा जाय तो वे लोग भोजन के समय गाना बजाना, रेडियो आदि सुनते हैं तब 'शृण्वन् भुक्त्वा' यह अन्यव होना चाहिये। इसके विपरात चरक तथा सुश्रुत के प्राचीन आर्ष मतों को दृष्टि में रखा जाय तो वे भोजन के समय शान्त भाव से भोजन करने को कहते हैं तथा उसके बाद गाना, बजाना आदि का विधान बतलाते हैं। इसके अनुसार 'भुक्त्वा शृण्वन्' यह अन्वय किया जा सकता है।

रसदोषविभागीयाध्यायः ६] खिलस्थानम् ३९५

से, रात्रि जागरण से, दिन में सोने से, विषम भोजन तथा असात्म्य सेवन के द्वारा प्राणी का खाया हुआ अन्न ठीक प्रकार से नहीं पचता है ॥५६-५८॥

हिताहितं यदैकध्यं भुक्तं समशनं तु तत् । पूर्वभक्तेऽपरिणते विद्यादध्यशनं भिषक् ॥५९॥
क्षुत्तृष्णोपरमे जाते शान्तेऽग्नौ प्रमृताशनात् (नम्) । विषमं गुणसंस्कारात् क्रमसात्म्यव्यतिक्रमात् ॥६०॥

हितकर और अहितकर दोनों प्रकार के पदार्थ एक ही समय या एक साथ मिलाकर भोजन करना समशन कहलाता है। पूर्व भोजन का पूरा परिपाक न होने पर भी पुनः भोजन करना अध्यशन कहलाता है। क्षुधा तथा तृष्णा के नष्ट हो जाने एवं अग्नि के शान्त हो जाने पर प्रमृताशन कहलाता है तथा गुणों के संस्कार और सात्म्य क्रम के बदल जाने से विषमाशन कहलाता है। सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी ऐसा कहा है ॥

विरुद्धं पयसा मत्स्या यथा वा गुडमूलकम् । स्यादजीर्णाशनं नाम व्युष्टाजीर्णे चतुर्विधे ॥६१॥
तथैवात्यशनं ज्ञेयमतिमात्रोपयोगतः । स.....तान्यामयोत्पत्तौ मूलहेतुं प्रचक्षते ॥६२॥

दूध तथा मछली परस्पर विरुद्ध हैं। इसी प्रकार गुड़ और मूली भी परस्पर विरुद्ध हैं। चार प्रकार का व्युष्टाजीर्ण (प्रभात काल में हुआ अजीर्ण) अजीर्णाशन कहलाता है। इसी प्रकार मात्रा में अधिक भोजन करना अत्यशन कहलाता है। ये सब रोगों की उत्पत्ति के मूल कारण माने गये हैं ॥६१-६२॥

आहारसात्म्यं देशेषु येषु येषु यथा यथा । प्रोक्तं तथोपदेष्टव्यं तेषु तेषु तथा तथा ॥६३॥

जिन २ देशों में जो २ आहार सात्म्य माना गया है उन २ देशों में उसी २ आहार का उसी प्रकार उपदेश करना चाहिये ॥६३॥

चतुर्विंशतिरित्येते विकल्पाः समुदाहृताः । भिषजा ह्युपदेष्टव्या राज्ञो राजोपमस्य वा ॥६४॥
अन्येषां वा वसुमतां यशोधर्मार्थसिद्धये ।

ये आहार के २४ विकल्प कहे गये हैं। यश, धर्म एवं अर्थ (धन) की सिद्धि के लिये वैद्य को राजा तथा राजा के समान अन्य ऐश्वर्यशाली व्यक्तियों के लिये उपदेश करना चाहिये ॥६४॥

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥
(इति) खिलेषु भोज्यविभागीयो (नाम पञ्चमोऽध्यायः) ॥५॥


ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति) खिलेषु भोज्यविभागीयो (नाम पञ्चमोऽध्यायः) ॥५॥


अथ रसदोषविभागीयाध्यायः षष्ठः ।

अथातो रसदोषविभागीयँ नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

३९६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्रसदोषविभागीयाध्यायः ६]

अब हम रसदोषविभागीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

रसदोषविभागज्ञः प्रकोपोपशमं प्रति। भिषग्भिषक्त्वं लभते विपर्ययमथान्यथा ॥३॥

रस और दोष के विभाग को जानने वाला वैद्य रोगों के प्रकोप तथा शान्ति के प्रति भिषक्त्व (वैद्यत्व) को प्राप्त करता है। अर्थात् रस और दोषों के विभाग को जानने वाला वैद्य ही वस्तुतः वैद्य कहलाता है। यदि वह इससे विपरीत है तो वैद्य कहलाने के योग्य नहीं है ॥३॥

तस्माद्दोषविकल्पांश्च विकल्पांश्च रसाश्रयान्। प्रवक्ष्यामि यथाशास्त्रं सविशेषं सविस्तरम् ॥४॥

इसलिये मैं शास्त्र के अनुसार दोषों तथा रसों के भेदों को विशेषज्ञान एवं विस्तार सहित कहूंगा ॥४॥

व्यासतःस्तु ज्वरादीनां व्याधीनां दोषभेदतः।
द्विषष्टिधा कल्पनोक्ता स्थूलसंख्या त्वतः परम् ॥५॥

ज्वरों के विस्तार तथा रोगों के दोष भेद के अनुसार इनकी ६२ कल्पनाएं कही गई हैं। इसके बाद इनकी स्थूल संख्या कही जायेंगी। सुश्रुत उ. अ. ६६ में भी कहा है-भिन्ना दोषास्त्रयो गुणाः । द्विषष्ट्या भवन्त्येते भूयिष्ठमिति निश्चयः ॥५॥

एकैकशस्त्रयो द्वन्द्वैर्नव सर्वे त्रयोदश। क्षीणाधिकसमैश्चान्यैर्दश द्वौ च प्रकीर्तिताः ॥६॥

पृथक् २ दोषों के अनुसार तीन विकार होते हैं। द्वन्द्वज (द्विदोषज) विकार ९ होते हैं। तथा सम्पूर्ण दोषों (सन्निपात) से १३ विकार होते हैं। क्षीण, अधिक तथा समता के अनुसार दोषों की संख्या १२ होती है अर्थात् पृथक् २ दोषों के अनुसार ३, द्वन्द्व के अनुसार ९, सन्निपात के अनुसार १३, इस प्रकार बढ़े हुए दोषों को दृष्टि में रखते हुए कुल २५ विकार होते हैं। बढ़े हुए दोषों की तरह ही क्षीण हुए दोषों के अनुसार भी २५ विकार होते हैं। क्षीणवृद्ध तथा समता के अनुसार दोषों की संख्या-१२ इस प्रकार कुल विकारों की संख्या=२५+२५+१२=६२ चरक सू. अ. १७ तथा सुश्रुत उ. अ. ६६ में भी ये ही ६२ भेद दिये गये हैं ॥६॥

तेषां विभागं वक्ष्यामि विस्तरेण यथाक्रमम्। एकैकशस्त्रयो ज्ञेया वातपित्तकफैर्गदाः ॥७॥
समैर्द्वन्द्वैस्त्रयः षट तु विषमैर्नव ते स्मृताः।
द्व्यधिकैकाधिकैः षट् च हीनमध्याधिकैश्च षट् ॥८॥
एकः समैस्त्रिभिर्दोषैरित्यातङ्कास्त्रयोदश। दोषैरेतैर्विवृद्धैः स्युर्विकल्पाः पञ्चविंशतिः ॥९॥

अब मैं उनके विभाग को क्रमशः विस्तारपूर्वक कहूंगा। पृथक् २ दोषों (की वृद्धि) से तीन विकार होते हैं। यथा— १. वातवृद्ध, २. पित्तवृद्ध ३. कफवृद्ध अर्थात् एकदोषज विकार ३ होते हैं। द्वन्द्वज विकार ९ होते हैं। इनमें से दोनों दोष समता से बढ़े हुए हों तो ३ विकार होते हैं—१. वातपित्त (दोनों समवृद्ध), २. वात-कफ (दोनों समवृद्ध), ३. पित्त-कफ (दोनों समवृद्ध), द्वन्द्वज विकारों में यदि दोष विषमता से बढ़े हुए हों तो ६ विकार होते हैं—१. वातवृद्ध (पित्तवृद्धतर), २. पित्त-वृद्ध (वातवृद्धतर), ३. कफ-वृद्ध (पित्तवृद्धतर), ४. पित्त-वृद्ध (कफवृद्धतर), ५. वात-वृद्ध (कफवृद्धतर), ६. कफ-वृद्ध (वातवृद्धतर)। इस प्रकार वृद्ध दोष द्वन्द्वज (संसर्गज) विकार ३+६=९ होते हैं।

सन्निपात से १३ विकार होते हैं। इनमें दो दोष तथा एक दोष की अधिकता से ६ विकार होते हैं। इनमें से दो दोष अधिक बढ़े हुए हों तो निम्न तीन विकार होते हैं। यथा—१. कफवृद्ध वातपित्त दोनों अधिक वृद्ध, २. पित्त वृद्ध वातकफ दोनों अधिक वृद्ध, ३. वातवृद्ध पित्तकफ दोनों अधिक वृद्ध, सन्निपात में एक दोष अधिक बढ़ा हुआ हो तो

रसदोषविभागीयाध्यायः ६] खिलस्थानम् ३९७

निम्न ३ विकार होते हैं। यथा—१. पित्त कफ दोनों वृद्ध वात अधिक वृद्ध, २. वात कफ दोनों वृद्ध पित्त अधिक वृद्ध, ३. वात पित्त दोनों वृद्ध कफ अधिक वृद्ध, तीनों दोषों के हीन, मध्य एवं अधिक भेद से सन्निपात ६ प्रकार के होते हैं। यथा—१. वात वृद्ध, पित्त वृद्धतर, कफ वृद्धतम, २. वात वृद्ध, कफ वृद्धतर, पित्त वृद्धतम, ३. पित्त वृद्ध, कफ वृद्धतर, वात वृद्धतम, ४. पित्त वृद्ध, वात वृद्धतर, कफ वृद्धतम, वात वृद्धतम, ५. कफ वृद्ध, वात वृद्धतर, पित्त वृद्धतम, ६. कफ वृद्ध, पित्त वृद्धतर, वातवृद्धतम, हीन, मध्य एवं अधिक का अभिप्राय यही है कि सन्निपातों में क्रमशः एक दोष कम बढ़ा हुआ हो, एक मध्यम बढ़ा हुआ हो तथा एक अधिक बढ़ा हुआ हो। अर्थात् तीनों दोष बढ़े हुए होते हैं परन्तु उन तीनों में भी एक कम, एक मध्यम तथा एक अधिक बढ़ा हुआ होता है। सन्निपात में तीनों दोष यदि समान रूप से बढ़े हुए हों तो एक विकार होता है। यथा—१. वात पित्त कफ तीनों समवृद्ध अर्थात् द्वयुल्वण ३+एकोल्वण ३+हीन मध्य एवं अधिक भेद से ६+समवृद्ध १=१३ सन्निपात विकार होते हैं। इस प्रकार बढ़े हुए दोषों को दृष्टि में रखते हुए २५ विकार होते हैं। यथा—एक दोषज ३+द्विदोषज ९+सान्निपातिक १३=२५ ।।७-९।।

दोषैः क्षीणैरपि गदा दृष्ट्वैवं पञ्चविंशतिः ।

इसी प्रकार वृद्ध दोषों की तरह क्षीण दोषों को दृष्टि में रखते हुए भी २५ ही विकार होते हैं। अर्थात् पूर्ववत् एक दोषज ३, द्विदोषज ९ तथा सन्निपात से १३ विकार होते हैं। यथा—पृथक् २ एक दोषज) क्षीण विकार ३ होते हैं। यथा—१. वात क्षीण, २. पित्त क्षीण, ३. कफ क्षीण, द्विदोषज (संसर्गज) विकार ९ होते हैं। इन क्षीण द्विदोषजों में दोनों दोषों के समान रूप से क्षीण होने पर ३ विकार होते हैं। यथा—१. वात पित्त दोनों समक्षीण, २. वात कफ दोनों समक्षीण, ३. पित्त कफ दोनों समक्षीण, यदि दोनों दोष विषमता से क्षीण हों तो ६ विकार होते हैं। यथा—१. वातक्षीण पित्त क्षीणतर, २. पित्त क्षीण वात क्षीणतर, ३. वात क्षीण कफ क्षीणतर, ४. कफ क्षीण वात क्षीणतर, ५. कफ क्षीण पित्त क्षीणतर, ६. पित्त क्षीण कफ क्षीणतर, इस प्रकार क्षीण दोष द्वन्द्वज रोग ३+६-९ होते हैं। सन्निपात में दो दोषों के अतिक्षीण होने से ३ विकार होते हैं। यथा—१. वातक्षीण पित्त कफ दोनों अतिक्षीण, २. पित्त क्षीण वात कफ दोनों अतिक्षीण, ३. कफ क्षीण वात पित्त दोनों अति क्षीण, सन्निपात में एक दोष के अतिक्षीण होने से ३ भेद होते हैं। यथा—१. वात पित्त दोनों क्षीण कफ अतिक्षीण, २. वात कफ दोनों क्षीण पित्त अतिक्षीण, ३. पित्त कफ दोनों क्षीण वात अतिक्षीण, सन्निपात में हीन, मध्य एवं अधिक के भेद से ६ विकार होते हैं। यथा—१. कफ क्षीण, पित्त क्षीणतर, वात क्षीणतम, २. वात क्षीण, कफ क्षीण, पित्त क्षीणतर, वात क्षीणतम ३. पित्त क्षीण, कफ क्षीणतर, वात क्षीणतम, ४. कफ क्षीण, वात क्षीणतर, पित्त क्षीणतम, ५. वात क्षीण, पित्त क्षीणतर, कफ क्षीणतम, ६. पित्त क्षीण, वात क्षीणतर, कफ क्षीणतम, यहां हीन, मध्य तथा अधिक से अभिप्राय क्रमशः कम क्षीण, मध्यम क्षीण तथा अधिक क्षीण से है। सन्निपात में तीनों दोषों के समक्षीण होने से १ विकार होता है। यथा—१. वात पित्त कफ तीनों समक्षीण अर्थात् क्षीण दोष सन्निपात ३+३+६+१=१३ होते हैं। इस प्रकार क्षीण दोषों को दृष्टि में रखते हुए ३+९+१३=२५ विकार होते हैं॥

द्विक्षीणैरेकवृद्धैः स्युरेकक्षीणैर्द्विवृद्धलैः ।।१०।।
षट् षट् क्षीणाधिकसमैर्दश द्वौ चापरे गदाः ।

दो दोष क्षीण तथा एक वृद्ध और एक दोष क्षीण तथा दो वृद्ध से ६ भेद होते हैं। तथा एक क्षीण एक वृद्ध तथा एक सम के भेद से ६ हैं। इस प्रकार ये १२ विकार होते हैं। अर्थात्—दो का क्षय तथा एक की वृद्धि इस भेद से ३ विकार होते हैं। यथा—१. कफ पित्त दोनों क्षीण वात वृद्ध, २. वात कफ दोनों क्षीण पित्त वृद्ध, ३. वात पित्त दोनों क्षीण कफ वृद्ध, एक का क्षय तथा दो की वृद्धि इस भेद से ३ विकार होते हैं। यथा—१. वातक्षीण कफ पित्त दोनों

३९८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रसदोषविभागाध्यायः ६]

वृद्ध, २. पित्त क्षीण वात कफ दोनों वृद्ध, ३. कफ क्षीण वात पित्त दोनों वृद्ध, एक का क्षय, एक की वृद्धि तथा एक की समता के अनुसार ६ भेद होते हैं। यथा—१. कफ क्षीण, पित्त सम, वात वृद्ध, २. पित्त क्षीण, कफ सम, वात वृद्ध, ३. वात क्षीण, कफ सम, पित्त वृद्ध, ४. कफ क्षीण, वात सम, पित्त वृद्ध, ५. वात क्षीण, पित्त सम, कफ वृद्ध, ६. पित्त क्षीण, वात सम, कफ वृद्ध, ये विकार १२ होते हैं। इस प्रकार दोषों के परिणाम के भेद से २५+२५+१२=६२ विकार होते हैं। चरक सू. अ. १७ में भी ये ही ६२ विकार दिये हैं ॥१०॥

इति द्विषष्टिसंख्येषा विकाराणां विकल्पशः ॥११॥
वातपित्तकफैरेको दश स्यात् प्रकृतिस्थितैः ।

इस प्रकार विकल्प (भेद) के अनुसार विकारों की संख्या ६२ होती है। इसके अतिरिक्त वात पित्त तथा कफ के प्रकृतिस्थ होने पर एक भेद और होता है। अष्टाङ्ग हृदय में भी इन ६२ दोष भेदों के अतिरिक्त एक ६३ वां भेद और दिया है। वहां कहा है—'त्रिषष्टः स्वास्थ्यकारणम्'। यह ६३ वां भेद आरोग्य का कारण माना गया है। इस अवस्था में वात पित्त कफ तीनों अपने परिमाण में स्थित होते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि पूर्वोक्त ६२ भेद रोग के कारण होते हैं ॥११॥

रसानां तु विकल्पाः स्युरेकैकश्येनः षट् स्मृताः ॥१२॥
पूर्वः पूर्वः परैर्युक्तो द्विकाः पञ्चदशापरे ।

रसों के विकल्प—एक रस वाले ६ भेद होते हैं। यथा—१. मधुर, २. अम्ल, ३. लवण, ४. कटु, ५. तिक्त, ६. कषाय द्विक (दो रसों का संयोग)—पूर्व २ रस अगले २ रस के साथ मिलकर १५ योग बनाता है। चरक सू. अ. २६ में भी द्विकों के १५ भेद दिये हैं। इसी प्रकार सुश्रुत उ. अ. ६३ में भी कहा है ॥१२॥

रसेषु त्रिषु पूर्वेषु विकल्पाः स्युस्त्रयोऽधिकाः ॥१३॥
द्विकेषु त्रिष्वथैकैकं संयोज्य कटुकादिभिः । कट्वादिषु तथा पूर्वैः स्वादम्ललवणैः पृथक् ॥१४॥
अष्टादशैते द्वाभ्यां च त्रिकाभ्यां विंशतिस्त्रिकाः ।

मधुर, अम्ल तथा लवण आदि प्रथम तीन रसों से तीन अधिक भेद (द्विकों के) हो जाते हैं (मधुराम्ल, मधुरलवण तथा अम्ललवण) इन तीनों द्विकों के साथ कटु आदि (कटु, तिक्त, कषाय) एक २ को जोड़कर (संयुक्त करके) तथा कटु आदि तीनों द्विकों (कटु तिक्त, कटु कषाय, तिक्त कषाय) के साथ पूर्वोक्त मधुर आदियों (मधुर, अम्ल, लवण) को जोड़ने से १८ भेद (द्विक) बन जाते हैं। इनमें दो त्रिकों (मधुराम्ललवण तथा कटुतिक्तकषाय) को जोड़ने से १८+२=२० त्रिक बन जाते हैं ॥१३-१४॥

पूर्वोत्तराभ्यां मधुरव्योषादिभ्यां यथाक्रमम् ॥१५॥
ये द्विकास्त्रिषु पूर्वेषु योज्यास्ते त्रिभिरुत्तरैः । प्रत्येकशो नवैते स्युर्विकल्पा षडिहान्यथा ॥१६॥
युक्ताः स्वादम्ललवणाः पृथक् कट्वादिभिस्त्रिभिः ।
कट्वादयस्तथा पूर्वैरित्येते दश पञ्च च ॥१७॥
चतुष्काः पञ्चकाः षट् स्युरेकैकस्य विवर्जनात् ।

पूर्व एवं उत्तर (पहले एवं पिछले) मधुर (मधुर, अम्ल, लवण) तथा कटु (कटु, तिक्त, कषाय) आदि के जो द्विक हैं (अर्थात् मधुराम्ल, मधुरलवण एवं अम्ललवण तथा कटुतिक्त, कटुकषाय एवं तिक्तकषाय) उनमें पहले तीन के साथ पिछले तीन को क्रमशः जोड़ने से ९ चतुष्क बनते हैं। तथा संयुक्त मधुर, अम्ल, लवण तीनों को कटु, तिक्त एवं कषाय

रसदोषविभागीयाध्यायः ६] खिलस्थानम् ३९९

के साथ तथा कटु, तिक्त एवं कषाय को मधुर, अम्ल, लवण के साथ पृथक् २ मिलाने से ६ चतुष्क बनते हैं। इस प्रकार ९+६=१५ चतुष्क होते हैं॥१५-१७॥

षड्भिरेके रसैस्तेषां कल्पनेयं त्रिषष्ठिधा ॥१८॥

पञ्चक (पांच रसों वाले) द्रव्य—छओं रसों में से एक २ रस को छोड़ने से ५ रस वाले द्रव्य ६ होते हैं। चरक सू. अ. २६ में भी कहा है—'षट् तु पञ्चरसान्याहुरेकैकस्यापवर्जनात्।' ६ रस वाले द्रव्य—एक हैं। इस प्रकार कल्पना के अनुसार ६+१५+२०+१५+६+१=६३ रसों के भेद होते हैं। चरक सू. अ. २६ में तथा सुश्रुत उ. अ. ६३ में भी इसी प्रकार कहा है॥१८॥

संयोगाः सप्तपञ्चाशदसंयुक्तास्तु षड्रसाः। षडेव त्रिषु युज्यन्ते रसा दोषेषु योगतः ॥१९॥

संयुक्त रस ५७ होते हैं। अर्थात् उपर्युक्त ६३ में से पृथक् २ एक २ रस को छोड़ने से शेष ५७ भेद होते हैं। ये संयोग दो २, तीन २, चार २, पांच २ तथा छ रसों के संयोग से होते हैं। असंयुक्त (पृथक् २ मधुर अम्ल आदि) रस ६ होते हैं। वातपित्त तथा कफ रूप तीनों दोषों में भिन्न २ योग के अनुसार ये ६ रस ही प्रयुक्त होते हैं। कहीं एक रस का प्रयोग किया जाता है, कहीं दो का तथा दोष की यदि अधिक वृद्धि हो तो कहीं तीन रस इत्यादि का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार चरक सू. अ. २६ में भी कहा है॥१९॥

क्वचिदेकः क्वचिद् द्वौ च दोषवृद्ध्या क्वचित्त्रयः। हीनमध्यातिक्रुद्धानां दोषाणां तु यथाक्रमम्॥२०॥
हीनमध्याधिकैरेवं रसैः कुर्यादुपक्रमम्। द्व्युद्वलैकोद्वलानां च समानां चैव तद्विधैः ॥२१॥

हीन, मध्य तथा वृद्ध दोषों की यथाक्रम हीन, मध्य तथा अधिक (वृद्ध) रसों के द्वारा ही चिकित्सा करनी चाहिये। द्व्युल्बण, एकोल्बण तथा समान वृद्ध दोषों की भी इसी प्रकार के रसों से चिकित्सा करनी चाहिये॥२०-२१॥

वृद्धानां क्षपणं कार्यं मध्यानां यापनं तथा। क्षीणानां वर्धनं चैव रसवृद्धिप्रमाणतः ॥२२॥

रस की वृद्धि के प्रमाण के अनुसार बढ़े हुए दोषों को घटाने का, समावस्था में स्थित दोषों को स्थिर रखने का तथा क्षीण हुए दोषों को बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिये। अर्थात् यदि दोष अपने प्रमाण से अधिक बढ़े हुए हैं तो उन्हें कम करने का प्रयत्न करना चाहिये तथा यदि दोष स्वप्रमाण से घटे हुए हैं तो उन्हें बढ़ाकर अपने प्रमाण में लाने का प्रयत्न करना चाहिये। ये दोनों अवस्थाएँ विषम हैं तथा रोग या अस्वास्थ्य को सूचित करती हैं। तीसरी अवस्था स्वस्थ व्यक्ति की है अर्थात् दोष अपने स्वाभाविक परिमाण में स्थित हों। इस अवस्था में दोषों के स्वाभाविक परिमाण को स्थिर रखने का प्रयत्न करना चाहिये। यही आयुर्वेद का प्रधान उद्देश्य है। इसे आजकल के विज्ञान के अनुसार Prophilactic या Preventive Treatment अथवा Hygiene कह सकते हैं। दोषों की विषमता होकर रोग उत्पन्न ही न होने पावें—यह श्रेष्ठ प्रयत्न है। इसीलिये सुश्रुत में स्वास्थ्य का रक्षण भी आयुर्वेद का प्रयोजन बताते हुए भगवान् धन्वन्तरि ने कहा है—'इह खल्वायुर्वेदप्रयोजनं-व्याध्युपसृष्टानां व्याधिपरिमोक्षः स्वस्थस्य रक्षणं च। चरक सू. अ. ३० में भी यही प्रयोजन बतलाया गया है। परन्तु वहां अनुक्रम उलटा है और वही स्वाभाविक भी है। उत्पन्न होते हुए व्यक्ति जन्म के समय साधारणतया स्वस्थ एवं नीरोग ही होते हैं। बाद में प्रज्ञापराध आदि के कारण ही व्याधियां हो जाती हैं। इसलिये प्रजाहित के लिये आयुर्वेद की उत्पत्ति प्रजा की उत्पत्ति के साथ या उससे पहले हुई—उसका प्रयोजन भी यही था कि स्वस्थ व्यक्ति किस प्रकार से अपने स्वास्थ्य को स्थिर रख सके। इसीलिये चरक में कहा भी है—'धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम्'॥

विशेषोऽत्र यथायोगं कार्यो रसविपर्ययात्।
(इति ताडपत्रपुस्तके २१२ तमं पत्रम्।)

४००काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्रसदोषविभागीयाध्यायः ६]

एवं द्विषष्टिदोषाणां रसैरेषां द्विषष्टिभिः ।। २३ ।।
साम्यं तैः षट्‌कैरेवैकः स्वस्थवृत्तौ प्रयुज्यते ।

रसों के विपर्यय से योग के अनुसार इसमें परिवर्तन करना पड़ता है । इस प्रकार ६२ रसों के द्वारा ६२ दोषों की चिकित्सा करनी चाहिये । परन्तु ६ रसों के योग से जो एक रस (मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषाय) बनता है उससे दोष समावस्था में स्थित रहते हैं तथा वही स्वस्थवृत्त (स्वस्थावस्था) में प्रयुक्त होता है । अर्थात् रसों की ६३ कल्पनायें कही गई हैं । तथा कुपित और अकुपित दोषों के भेद भी ६३ ही दिये गये हैं । इनमें कुपित ६२ प्रकार के दोषों में ६२ प्रकार के ही रसों की कल्पना का उपयोग होता है तथा ६३ वें (समधातु वा समदोष) में ६३ वें रस भेद (छओं रसों के मिश्रण) का सेवन करना चाहिये ।। २३ ।।

कटुतिक्तकषायांस्तु रसान् प्राज्ञो यथाक्रमम् ।। २४ ।।
योगतः कफजे व्याधौ भैषज्यमवतारयेत् ।

बुद्धिमान् व्यक्ति कटु, तिक्त तथा कषाय रसों को क्रमशः सम्यक् योग के द्वारा कफज व्याधि में भैषज्य के रूप में प्रयुक्त करे ।। २४ ।।

प्रयुक्तः कटुकः पूर्वं पैच्छिल्यं गौरवं च यत् ।। २५ ।।
श्लेष्मणस्तं निहन्त्याशु तिक्तस्तस्मादनन्तरम् । ह्रासयत्यास्यमाधुर्यं कफं संशोषयत्यपि ।। २६ ।।
संगृह्णाति कषायश्च स्नेहं चास्यापकर्षति ।

इनमें से प्रयुक्त किया गया कटु रस सर्वप्रथम श्लेष्मा (कफ) की पिच्छिलता तथा गौरवता को शीघ्र ही नष्ट कर देता है । इसके बाद तिक्त रस मुख की मधुरता को नष्ट करता है तथा कफ का शोषण करता है । और कषाय रस इसका संग्रहण करता है तथा श्लेष्मा के स्नेह का अपकर्षण करता है अर्थात् इसके स्नेहांश को कम करता है ।। २५-२६ ।।

तिक्तस्वादुकषायाः स्युः क्रमशः पैत्तिके हिताः ।। २७ ।।
आमान्वयत्वात् पित्तस्य पूर्वं तिक्तोऽवचारितः । पाचयत्याशु तं पक्वं ततस्तु मधुरो रसः ।। २८ ।।
शैत्याद् गुरुत्वात् स्नेहाच्च माधुर्याच्च नियच्छति । तद्द्रवत्वविघातार्थं कषायश्चावचारितः ।। २९ ।।
रौक्ष्याद्विशोषिभावाच्च विशोषयति तैजसम् ।

तिक्त, स्वादु एवं कषाय रस क्रमशः पैत्तिक रोगों में हितकर हैं । पित्त में आमरस का संसर्ग होने से प्रारम्भ में प्रयुक्त किया गया तिक्तरस उस आम का शीघ्र ही पाचन कर देता है । उसके बाद मधुर रस अपनी शीतलता, गुरुता (गौरव), स्निग्धता तथा मधुरता के कारण उस पके हुए पित्त को शान्त कर देता है । उसके बाद उसकी द्रवता को नष्ट करने के लिये कषाय रस का प्रयोग किया जाता है । यह कषाय रस अपनी रूक्षता तथा विशोषण के स्वभाव के कारण इस पित्त का शोषण कर देता है ।। २७-२९ ।।

वातिके लवणः पूर्वं संयोगादवचारितः ।। ३० ।।
प्रक्लेदिभावाज्जयति विबन्धं मातरिश्वनः । निहन्ति शैत्यमुष्णत्वाद् गुरुत्वाच्चापि लाघवम् ।। ३१ ।।
तथैवाम्लो रसः पश्चात्सस्नेहेवावचारितः । जडीकृतानि स्रोतांसि तैक्ष्ण्यादुद्घाट्य मारुतम् ।। ३२ ।।
अनुलोमयति क्षिप्रं स्निग्धोष्णत्वाद्द्विमार्गगम् । अम्लादनन्तरं पश्चात् प्रयुक्तो मधुरो रसः ।। ३३ ।।
वायोर्लघुत्वं वैशद्यं रूक्षत्वं च व्यपोहति । गुरुत्वात् पिच्छिलत्वाच्च स्निग्धत्वाच्च यथाबलम् ।। ३४ ।।
इत्युक्ताः सर्वरोगेषु रसानां प्रविचारणाः ।

[रसदोषविभागीयाध्यायः ६] खिलस्थानम् ४०१

वातरोगों में सर्वप्रथम संयोग के द्वारा प्रयुक्त किया गया लवणरस क्लेद के कारण वायु के विबन्ध को शान्त करता है। यही लवण रस उष्ण होने के कारण वायु की शीतलता को तथा गुरु होने के कारण वायु की लघुता को नष्ट कर देता है। उसके बाद वातरोग में प्रयुक्त किया गया अम्लरस अपनी तीक्ष्णता के कारण जडीभूत स्रोतों का उद्घाटन करके (खोलकर) स्निग्धता तथा उष्णता के कारण विमार्गस्थित वायु का शीघ्र ही अनुलोमन करता है। अर्थात् प्रतिकूल मार्ग में जाती हुई वायु का अनुलोमन करता है अर्थात् अनुकूल मार्ग में लाता है। अम्लरस के अनन्तर प्रयुक्त किया गया मधुर रस अपने बल के अनुसार गुरुता, पिच्छिलता तथा स्निग्धता के कारण वायु की लघुता, विशदता तथा रूक्षता को नष्ट करता है। इस प्रकार सम्पूर्ण (वातिक, पैत्तिक तथा श्लैष्मिक) रोगों में रसों के भेद कहे गये हैं। अर्थात् जिन रोगों में जिन रसों का प्रयोग किया जाना चाहिए-इसका निर्देश किया गया है। कौन २ से रस किस २ दोष को शान्त करते हैं तथा किन २ को बढ़ाते हैं इस विषय में चरक वि. अ. १ में तथा सु. सू. अ. ४२ में भी विस्तृत रूप से कहा है ॥३०-३४॥

दृश्यन्ते प्रायशो योगा रोगेषूक्ता ज्वरादिषु ॥३५॥
कटुतिक्तकषायाश्च रसतो मधुरास्तथा।
वातज्वरे यथापूर्वं पेयायूषरसादिषु । लवणोऽम्लश्च युज्येते रसौ संस्कारयोगिनौ ॥३६॥
ततो विदारिगन्धादिर्मधुरः संप्रयुज्यते ।

ज्वर आदि रोगों में प्रायः कटु, तिक्त, कषाय तथा मधुर रस वाले योग कहे गये हैं। वातज्वर में पहले पेया, यूष तथा रस आदियों में संस्कार से युक्त लवण एवं अम्ल रस का प्रयोग किया जाता है। इसके बाद विदारिगन्ध आदि मधुर द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है ॥३५-३६॥

पित्तज्वरे यथा तिक्तः शार्ङ्गष्टादिः प्रयुज्यते ॥३७॥
मधुरः सारिवादिश्ञ्च, कषायश्चाभयादिकः ।

पित्तज्वर में शार्ङ्गेष्टा (काकजंघा अथवा काकमाची) आदि तिक्त, सारिवा आदि मधुर तथा अभया (हरीतकी) आदि कषाय द्रव्य प्रयुक्त किये जाते हैं ॥३७॥

पिप्पल्यादिर्यथापूर्वं कटुकः कफजे ज्वरे ॥३८॥
आरग्वधादिकस्तिक्तः, कषायस्त्रिफलादिकः ।

कफज (श्लैष्मिक) ज्वर में यथापूर्वं पिप्पली आदि कटु, आरग्वध (अमलतास) आदि तिक्त तथा त्रिफला आदि कषाय द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिये ॥३८॥

सर्वत्रैवानया युक्त्या यथोद्दिष्टान्त्रसान् बुधः ॥३९॥
यथादोषं यथायोगं प्रयुञ्जीत यथेप्सितम् । प्रक्षेपैरवकषैश्च द्रव्याणामन्यथाऽन्यथा ॥४०॥

बुद्धिमान् व्यक्ति सर्वत्र इसी उपर्युक्त युक्ति से यथोद्दिष्ट रसों को दोष एवं योग के अनुसार द्रव्यों के प्रक्षेप (बढ़ाना) तथा अपकर्ष (घटाने) के द्वारा इच्छानुसार प्रयुक्त करे ॥३९-४०॥

यथा वा वीणया वीणी तन्त्रीणां स्वरके विदः । उत्कर्षश्चावकर्षंश्च स्वरान् सम्यक् प्रयोजयेत् ॥४१॥
विन्दन् नानाविकल्पैश्च ग्रामरागांश्च दर्शयेत् । स्वरमण्डलतत्त्वज्ञो विकल्पैर्बहुविस्तरैः ॥४२॥
तथैव शास्त्रतत्त्वज्ञो योगज्ञः प्रतिपत्तिमान् । व्याधौ बलाबलज्ञश्च प्रकृतिज्ञश्च योगवान् ॥४३॥
उत्कर्षश्चावकर्षंश्च प्रयोगाच्छास्त्रकोविदः । केवलैः शीतवीर्यैश्च तथैवोष्णैश्च वीर्यतः ॥४४॥

४०२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रसदोषविभागीयाध्यायः ६]

शीतैरुष्णैश्च संसृक्तैर्द्रव्यैर्योगान् प्रयोजयेत् । कार्त्स्न्यतश्च प्रयुञ्जीत यथावदनुपूर्वशः ।।४५।।

जिस प्रकार तन्त्रियों के स्वरों को जानने वाला वीणावादक व्यक्ति आरोह तथा अवरोह के द्वारा ठीक प्रकार से स्वरों को प्रयुक्त करता है तथा स्वरमण्डलों के तत्त्व को जानने वाला अनेक विस्तृत विकल्पों (भेदों) के द्वारा ज्ञान प्राप्त करके ग्रामरोगों का प्रदर्शन करता है अर्थात् ७ स्वरों के ही आरोह अवरोह के द्वारा नाना भेद हो जाते हैं। उसी प्रकार शास्त्रों के तत्त्व, योग, युक्ति, रोग के बलाबल तथा प्रकृति को जानने वाला शास्त्र का पण्डित प्रयोगों के उत्कर्ष तथा अपकर्ष के द्वारा केवल शीतवीर्य, केवल उष्णवीर्य अथवा शीतवीर्य एवं उष्णवीर्य दोनों प्रकार के द्रव्यों के संयोग से बनाये हुए योगों का सम्पूर्णरूप में अथवा क्रमशः धीरे २ प्रयोग करे ।।४१-४५।।

समुच्चयैर्विकल्पैश्च नानारससमुच्चयैः । युञ्जीत बहुधा योगान्नृत्तं गीतवशादिव ।।४६।।

नाना रसों से बने हुए योगों का समुच्चय (सामूहिक) तथा विकल्प (पृथक् २) रूप में नृत्य तथा गीत की तरह प्रयोग करे ।।४६।।

समस्योक्तं पृथक्चोक्तं संप्रधार्य बलाबलम् । द्विषष्टिर्दोषभेदा ये निर्दिष्टास्तानतः परम् ।।४७।। स्थानानि दश संगृह्य प्रवक्ष्यामि सविस्तरम् ।

इस प्रकार दोषों के बलाबलको देखकर सम एवं पृथक् रूप में जो दोषों के ६२ भेद कहे गये हैं उन्हें अब १० स्थानों के अनुसार विभक्त करके विस्तार पूर्वक कहूँगा।

वक्तव्य—दस स्थानों से अभिप्राय रस-रक्त आदि सात धातु एवं वात पित्त कफ तीन दोषों (मिलकर दस होते हैं) से प्रतीत होता है ।।४७।।

त्रय एकैकशस्तेषां ये च वृद्धास्त्रयः समाः ।।४८।। समैरेकश्च सप्तैते क्षयवृद्ध्या चतुर्दश । स्थानवृद्ध्या भवेत्तेषां चत्वारिंशोत्तरं शतम् ।।४९।।

वे दोष पृथक् २ तीन हैं। यथा १. वात २. पित्त ३. कफ तथा समानरूप से एक २ दोष की वृद्धि के अनुसार भी वे तीन हैं। यथा १. वातवृद्ध २. पित्तवृद्ध ३. कफवृद्ध। तथा दोषों के समावस्था में स्थित होने पर एक भेद होता है। यथा—१. समवात पित्त कफ। ये सात भेद होते हैं। क्षय के अनुसार भी ये सात दोष होते हैं। इस प्रकार वृद्धि एवं क्षय के अनुसार ये भेद ७×२=१४ हो जाते हैं। तथा १० स्थानों की वृद्धि के अनुसार इनके १४×१०=१४० भेद हो जाते हैं ।।४८-४९।।

व्युदस्यैतानतः शेषा ये त्रिंशद्दश चाष्ट च । ते भेदं यान्त्यमेयत्वाच्छतशोऽथ सहस्रशः ।।५०।। द्वन्द्वानां विषमाणां तु षण्णामन्यतमं बुधः । स्वस्थानाद्वर्धयेत्तावद्यावत् स्यात् स्थानमष्टमम् ।।५१।।

इन १४ भेदों को छोड़कर जो शेष अर्थात् ६२—१४=४८ भेद बचते हैं, उनके अपरिमित होने से सैकड़ों तथा हजारों भेद हो जाते हैं। ६ विषमद्वन्द्वों—(१-वातवृद्ध पित्तवृद्ध तर, २. पित्त वृद्ध वात वृद्धतर, ३. कफ वृद्ध पित्त वृद्धतर, ४. पित्त वृद्ध कफ वृद्धतर, ५. वात वृद्ध कफ वृद्धतर ६. कफ वृद्ध वात वृद्धतर) को एक २ को लेकर अपने स्थान से तब तक बढ़ाये जब तक कि आठवें स्थान तक न पहुंच जायं। इस प्रकार ये ६×८=४८ भेद होते हैं ।।५०-५१।।

एकैकशो द्विशश्चैव चतुर्विंशद्भवन्ति ते । ह्रासेनैकेकंशश्चापि विंशन्नव च भेदतः ।।५२।। एवमेते त्रिपञ्चाशद् द्वन्द्वेनैकेन दर्शिताः ।

रसदोषविभागीयाध्यायः ६] खिलस्थानम् ४०३

पृथक् २ एक दोष तथा द्वन्द्वों के अनुसार वे २४ हो जाते हैं। अर्थात् पृथक् २ दोष तीन तथा द्वन्द्वज ९ होते हैं जो कि मिलकर १२ होते हैं। इनके ह्रास तथा वृद्धि के अनुसार १२×२=२४ भेद हो जाते हैं। एक २ दोष के ह्रास के द्वारा २९ भेद और हो जाते हैं। इस प्रकार एक द्वन्द्व के द्वारा ये २४+२९=५३ भेद हो जाते हैं ॥५२॥

एषैव युक्तिः शिष्टानां द्वन्द्वानां स्यान्न संशयः ॥५३॥
शतत्रयं भवत्येवमेषामष्टादशोत्तरम् ।

अवशिष्ट (६-१=५) द्वन्द्वों के भी इसी प्रकार से योग बन जाते हैं। इस प्रकार ६ द्वन्द्वों से ये कुल ५३×६=३१८ भेद हो जाते हैं ॥५३॥

द्व्युद्वलैकोद्वलानां च तावदेव विनिर्दिशेत् ॥५४॥

इसी प्रकार सन्निपातों में द्वयुल्बण तथा एकोल्बण (३+३=६) दोषों के भी इतने ही भेद होते हैं ॥५४॥

हीनमध्याधिका दोषाः स्वे स्वे स्थाने व्यवस्थिताः ।
स्वस्थानात् सप्तमं स्थानमेकैकश्येन यान्ति ते ॥५५॥
द्वौ च द्वौ च समस्ताश्च तेषां षट् सप्तकास्तथा ।
भवन्ति ह्रासयेत्तांश्च यथा(स्था)नमधः क्रमात् ॥५६॥
पञ्चाशीतिमत्तस्तेषां भेदानां परिचक्षते ।
एष एव विकल्पः स्याच्छेषाणां प्रविभागशः ॥५७॥
शतानि सप्त षटिश्च द्वौ च भेदा भवन्ति ते ।
एवं सहस्त्रं भेदानां वृद्धैस्त्रीणि शतानि च ॥५८॥
दोषैर्नवतिरष्टौ च क्षीणैस्तावन्त एव ते ।

हीन मध्य एवं अधिक के अनुसार अर्थात् तर-तम आदि के अनुसार अपने २ स्थान पर स्थित हुए दोष अपने स्थान से एक २ करके सप्तम स्थान तक पहुंचते हैं। इस प्रकार समस्त दोष मिलकर चार, छै और सात अर्थात् १७ बन जाते हैं। इसी प्रकार इन्हें यथास्थान उलटे क्रम से कम करते जायें। इस प्रकार ये १७×५=८५ भेद हो जाते हैं। इसी प्रकार शेष द्वन्द्वों के भी विभागपूर्वक ये ही भेद हो जाते हैं। ये ७६२ भेद हो जाते हैं। इस प्रकार वृद्ध दोषों के ३१८+३१८+७६२=१३९८ भेद हो जाते हैं। इसी प्रकार क्षीण दोषों के भी इतने ही अर्थात् १३९८ भेद होते हैं ॥५५-५८॥

द्विक्षीणैरेकवृद्धैः स्युः षट् च त्रीणि शतानि च ॥५९॥
यावन्त्येव च भेदानामेकक्षीणैर्द्विरुद्वलैः ।
क्षीणाधिकसमैः षट् च षट् च षट् च शतानि च ॥६०॥

(इति ताडपत्रपुस्तके २१३ तमं पत्रम्)

क्रम एवात्र भागः स्याद्यो द्वन्द्वेषु निदर्शितः ।

दो क्षीण तथा एक वृद्ध दोष वाले द्वन्द्व के ३०६ भेद होते हैं। इसी प्रकार एक क्षीण तथा दो वृद्ध दोष वाले द्वन्द्व के भी इतने ही अर्थात् ३०६ भेद होते हैं। पूर्व द्वन्द्वों का जो क्रम बताया है उसके अनुसार क्षीण, अधिक एवं सम दोषों के ६१२ भेद हो जाते हैं ॥५९-६०॥

चतुर्दश विनिर्दिष्टाः सविकल्पास्तयोः पृथक् ॥६१॥

४०४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्रसदोषविभागीयाध्यायः ६]

तैः सार्धमेषां सर्वेषां कार्त्स्न्येनैव विभावयेत् । सहस्त्राणि च चत्वारि शतं षष्ट्युत्तरं तथा ।। ६२ ।।

इनके अतिरिक्त जो पहले १४ भेद बताये हैं उनके भेद अर्थात् १४x१० = १४० पृथक् समझने चाहिये । इन १४० भेदों के साथ इन उपर्युक्त सम्पूर्ण भेदों को गिनने से १३९८+१३९८+३०६+३०६+६१२+१४०=४१६० भेद हो जाते हैं।

एतावन्तो ज्वराद्यानां भेदाः प्रोक्ता यथागमम् । अथैतेषु चतुर्योगविभागगतिकर्मतः ।। ६३ ।।
सहस्रं सन्निपातानां विद्यात् सनवकं भिषक् ।

ज्वर आदियों के भी शास्त्रानुसार इतने ही भेद कहे गये हैं। इनमें योग, विभाग, गति एवं कर्म इन चार के अनुसार सन्निपातों के भी नौ हजार भेद समझने चाहिये ॥६३॥

अत ऊर्ध्वं रसानां तु वक्ष्यते भेदविस्तरः ।। ६४ ।।

अब हम विस्तारपूर्वक रसों के भेदों का वर्णन करेंगे ॥६४॥

कर्मस्थानानि दोषाणां भाववृद्ध्या यथाक्रमम् ।
तथा रसानां षट् कुर्यात् स्थानानीति विनिश्चयः ।। ६५ ।।

यथाक्रम वृद्धि के अनुसार दोषों के कर्म एवं स्थान के समान निश्चय से रसों के भी ६ स्थान होते हैं ॥६५॥

तदेव कर्म सर्वेषां द्विकादीनां क्षयं विना । भवत्येवं द्विकानां तु पञ्चषष्ट्युत्तरं शतम् ।। ६६ ।।

क्षय के बिना सम्पूर्ण द्विकों के भी वे ही कर्म होते हैं इस प्रकार द्विकों (१५) के १६५ भेद होते हैं ॥६६॥

त्रिकानां च सविंशानि षट्शतानि विनिर्दिशेत् । चतुष्कानां सहस्रं च पञ्चषष्ट्युत्तरं वदेत् ।। ६७ ।।

त्रिकों के ६२० भेद होते हैं तथा चतुष्कों के १०६५ भेद होते हैं ॥६७॥

पञ्चकाणां शतान्यष्टौ स्याच्छतं च षडुत्तरम् । षष्ठकानां शते द्वे तु शतं चैकादशोत्तरम् ।। ६८ ।।
संयुक्तानां विकल्पोऽयं सविकल्पाः षडेककः ।

पञ्चकों के ९०६ भेद होते हैं तथा षष्ठकों (६ रसों के संयोग) के ३११ भेद होते हैं। इसप्रकार संयुक्त रसों के ये उपर्युक्त विकल्प (भेद) हैं तथा एक (पृथक् २) रस ६ होते हैं ॥६८॥

समानां रसभेदानामेकमेकं तु पिण्डितम् ।। ६९ ।।
त्रिसप्ततिर्भवत्येषां सहस्रत्रयमेव च ।

इस प्रकार सब समान रसों को परस्पर मिलाकर इनके १६५+६२०+१०६५+९०६+३११+६=३०७३ भेद होते हैं॥

रसदोषविकल्पानामतिसौक्ष्म्यादतः परम् । न वक्ष्यामि महाभाग ! न तु बुद्धिपरिक्षयात् ।। ७० ।।

हे महाभाग ! इससे आगे बुद्धि के क्षीण होने के कारण नहीं, अपितु रसों तथा दोषों के भेदों के अत्यन्त सूक्ष्म होने से नहीं वर्णन करूंगा। अर्थात् इससे आगे रसों तथा दोषों के भेद अत्यन्त सूक्ष्म हो जाते हैं इसलिये उनका मैं वर्णन नहीं करूंगा। इसका तुम यह तात्पर्य मत समझना कि इससे आगे बुद्धि की पहुंच नहीं है ॥७०॥

अतः परमिदानीं रसभेदान् विस्तरेणोपदेक्ष्यामः । तद्यथा-मधुराम्ललवणकटुकतिक्तकषायाः षड्रसाः । एषामिदानीं रसानां विकल्पास्त्रिषष्टिर्भवन्ति । तत्रैकैकश्येन षट् । तद्यथा-मधुर एव, अम्ल एव, लवण एव, कटुक एव, तिक्त एव, कषाय एव ।। ७१ ।।

रसदोषविभागीयाध्यायः ६] खिलस्थानम् ४०५

इसके बाद अब मैं रसों के भेदों का विस्तारपूर्वक वर्णन करूंगा। उदाहरण के लिये मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय—ये ६ रस होते हैं। इन ६ रसों के ६३ भेद होते हैं। इनमें से पृथक् २ रस ६ होते हैं। यथा—१. अकेला मधुर (सन्तानिकागोदुग्धातिकम्) २. अकेला अम्ल (आमकर्मार्दादिकम्) ३. अकेला लवण (रोमकादिकम्) ४. कटु (चव्यादिकम्) ५. तिक्त (निम्बपर्पटादिकम्) ६. कषाय (पद्मन्यग्रोधाद्यङ्कुरादिकम्) ।।७१।।

पूर्वः पूर्वः परैर्युक्तो द्विकः, ते पञ्चदश भवन्ति। तत्र मधुरः पञ्चभिरम्लादिभिर्युज्यते। तद्यथा—मधुराम्लः, मधुरलवणः, मधुरकटुकः, मधुरतिक्तः, मधुरकषाय इति। अम्लश्चतुर्भिर्लवणादिभिः; तद्यथा—अम्ललवणः, अम्लकटुकः अम्लतिक्तः, अम्लकषाय इति। लवणस्त्रिभिः कटुकादिभिः; तद्यथा—लवणकटुः, लवणतिक्तः, लवणकषाय इति। कटुकस्तिक्तकषायाभ्यां द्वाभ्यां; तद्यथा—कटुतिक्तः, कटुकषाय इति। तिक्तः कषायेण च। तद्यथा—तिक्तकषाय इति। ते पञ्चदश एव। ते द्विकाः पञ्चदशविकल्पा भवन्ति; मधुरसंयोगेन पञ्च भवन्ति, अम्लसंयोगेन चत्वारः, लवणसंयोगेन त्रयः, कटुसंयोगेन द्वौ, तिक्तसंयोगेनैकइति। पूर्वेषु त्रिषु रसेषु मधुराम्ललवणेषु त्रयोऽधिका निष्पद्यन्ते। मधुराम्लः, मधुरलवणः, अम्ललवण इति।।

पूर्व रस अगले रस के साथ मिलकर द्विक बनते हैं। ये १५ होते हैं। इनमें से मधुर रस अम्ल आदि ५ रसों के साथ संयुक्त होता है। यथा—१. मधुराम्ल (वदरकपित्थफलादिकम्) २. मधुर लवण (उष्ट्रीक्षीरोरभ्रमांसादिकम्) ३. मधुर कटु (कुक्कुरशृगालमांसादिकम्) ४. मधुर तिक्त (श्रीवाससर्जरसादिकम्) ५. मधुर कषाय (तैलधन्वनफलादिकम्)। अम्ल लवण आदि ४ रसों के साथ संयुक्त होता है। यथा—१. अम्ल लवण (ऊषकादिकम्) २. अम्ल कटु (चुक्रादिकम्) ३. अम्ल तिक्त (सुरादिकम्) ४. अम्ल कषाय (हस्तिनीदधिशुकमांसादिकम्) लवण रस कटु आदि ३ के साथ संयुक्त होता है। यथा—१. लवण कटु (गोमूत्रस्वर्जिकादिकम्) २. लवण तिक्त (त्रपुसीसादिकम्) ३. लवण कषाय (समुद्रफेनादिकम्) कटु रस तिक्त एवं कषाय रस के साथ संयुक्त होता है। यथा—१. कटुतिक्त (कर्पूरजातिफलादिकम्) २. कटुकषाय (भल्लातकमज्जाहरितालादिकम्) तिक्त रस, कषाय के साथ संयुक्त होता है। यथा—१. तिक्तकषाय (लवलीफलहस्तिनीघृतादिकम्) इस प्रकार इन द्विकों के १५ भेद होते हैं। इनमें मधुर के संयोग से पांच, अम्ल के संयोग से चार, लवण के संयोग से तीन, कटु के संयोग से दो तथा तिक्त के संयोग से एक होते हैं। इसी प्रकार चरक सू. अ. २६ में तथा सुश्रुत उ. अ. ६३ में भी कहा है। मधुर, अम्ल, लवण आदि प्रथम तीन रसों में तीन संयोग अधिक होते हैं। यथा—१. मधुराम्ल २. मधुरलवण ३. अम्ल लवण ।।७२।।

एषां त्रयाणां द्विकानामेकैको द्विकस्त्रिभिरितरैः कटुतिक्तकषायै रसैर्योज्यः, ततस्त्रिका निष्पद्यन्ते। तद्यथा—मधुराम्लकटुः, मधुराम्लतिक्तः, मधुराम्लकषायः, मधुरलवणकटुः, मधुरलवणतिक्तः, मधुरलवणकषायः; अम्ललवणकटुः अम्ललवणतिक्तः, अम्ललवणकषाय इति। उत्तरेषु त्रिषु रसेषु कटुतिक्तकषायेषु त्रयो द्विका निष्पद्यन्ते; तद्यथा—कटुतिक्तः, कटुकषायः, तिक्तकषाय इति; एषां त्रयाणां द्विकानामेकैको द्विकस्त्रिभिरितरैर्मधुराम्ललवणै रसैर्योजयितव्यः, तत्र त्रिका निष्पद्यन्ते। तद्यथा—कटुतिक्तमधुरः, कटुतिक्ताम्लः, कटुतिक्तलवणः; कटुकषायमधुरः, कटुकषायाम्लः, कटुकषायलवणः; तिक्तकषायमधुरः, तिक्तकषायाम्लः, तिक्तकषायलवण इति। पूर्वे चोत्तरे च। पूर्वे च त्रयः, मधुराम्ललवणत्रिक एकः, उत्तरे च त्रयः, कटुकतिक्तकषायत्रिक एकः। त एते त्रिका विंशतिर्भवन्ति; प्रथमेन सूत्रेणोक्ता नव, नव च द्वितीयेन, तृतीयेन द्वाविति ।।७३।।

४०६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्रसदोषविभागीयाध्यायः ६]

इन उपर्युक्त तीनों द्विकों में से एक २ द्विक शेष तीन कटु, तिक्त तथा कषाय रसों के साथ मिलकर त्रिक बनते हैं। यथा—१. मधुराम्लकटु (शल्पकमीमांसादिकम्) २. मधुराम्लतिक्त (गोधूमोत्यसुरादिकम्) ३. मधुराम्लकषाय (मस्तुतक्रादिकम्) ४. मधुर लवण कटु (काणकषोतमांसादिकम्) ५. मधुरलवणतिक्त (शम्बूकादिमांसम्) ६. मधुरलवणकषाय (पद्मकन्दादिकं गुडसंयुक्तम्) ७. अम्ळलवण कटु (रौप्यशिलाजत्वादिकम्) ८. अम्ललवण तिक्त (हस्तिमूत्रादिकम्) ९. अम्ललवणकषाय (सरोमकं हस्तिनीदध्यादिकम्) पिछले तीन कटु तिक्त एवं कषाय रसों से तीन द्विक बनते हैं। यथा—१. कटुतिक्त २. कटुकषाय ३. तिक्तकषाय इन तीनों द्विकों में से एक २ द्विक शेष मधुर, अम्ल तथा लवण आदि तीनों रसों से मिलाया जाता है। इससे त्रिक बनते हैं। यथा—१. कटुतिक्त मधुर (तृणशून्याफलशुष्ककुस्तुम्बर्यादिकम्) २. कटुतिक्ताम्ल (मरिचसंस्कृतसुरादिकम्) ३. कटुतिक्त लवण (अविमूत्रादिकम्) ४. कटुकषायमधुर (गोधामान्सैरण्डतैलादिकम्) ५. कटुकषायाम्ल (अम्लवेतसादिकम्) ६. कटुकषायलवण (अरुष्करं सरोमकम्) ७. तिक्तकषायमधुर (गुडूचीशाखामृगाभिषुतवरकतैलादिकम्) ८. तिक्तकषायाम्ल (कीरमांसयुतसुरादिकम्) ९. तिक्तकषायलवण (समुद्रफेनादिकम्) प्रथम तीन रसों से एक त्रिक बनता है—१. मधुराम्ललवण (हस्तिमांसादिकम्)। तथा पिछले तीन रसों से एक त्रिक बनता है २. कटुतिक्तकषाय (कृष्णागुरुसुरदारुस्नेहादिकम्) इस प्रकार त्रिक २० होते हैं। प्रथम सूत्र के द्वारा ९+द्वितीय के द्वारा ९+तथा तृतीय के द्वारा २=२० सु. उ. अ. ६३ में कहा है कि मधुर के योग से १० त्रिक+अम्ल के योग से ६+लवण के योग से ३+कटु के योग से १=२० त्रिक होते हैं ॥७३॥

पूर्वेषु त्रिषु रसेषु मधुराम्ललवणेषु त्रयोऽधिका ये पूर्वोक्तास्ते परेषां त्रयाणां रसानां कटुकतिक्तकषायाणां पूर्वोक्तैस्त्रिभिर्द्विकैः प्रत्येककशयेन योजयितव्याः; तेन चतुष्का निष्पद्यन्ते। तद्यथा-मधुराम्लकटुतिक्तः, मधुराम्लकटुकषायः, मधुराम्लतिक्तकषायः, मधुरलवणकटुतिक्तः, मधुरलवणकटुकषायः, मधुरलवणतिक्तकषायः, अम्ललवणकटुतिक्तः, अम्ललवणकटुकषायः, अम्ललवणतिक्तकषाय इति। पूर्वे मधुराम्ललवणा उत्तरैः कटुकतिक्तकषायैरैककशो युज्यन्ते। तद्यथा-मधुराम्ललवणकटुः, मधुराम्ललवणतिक्तः, मधुरलवणकटुतिक्तः, मधुटलवणकटुकषायः, मधुरलवणतिक्तकणायः। मधुराम्ललवणकषाय इति। उत्तरे त्रयः कटुकतिक्तकषायाः पूर्वैर्मधुराम्ललवणैरैककशो युज्यन्ते, ततश्चतुष्का निष्पद्यन्ते। तद्यथा-कटुतिक्तकषायमधुरः, कटुतिक्तकषायाम्लः, कटुतिक्तकषायाम्लः, कटुतिक्तकषायलवण इति। एते चतुष्काः पञ्चदश, पूर्वसूत्रोक्ता नव, द्वितीयसूत्रोक्तास्त्रयः, तृतीयसूत्रोक्तास्त्रयः; इत्येते चतुष्काः पञ्चदश ।।७४।।

(इति ताडपत्रपुस्तके २१४ तमं पत्रम्।)

पूर्वोक्त, मधुर, अम्ल, लवण आदि तीन रसों में जो तीन अधिक रस कहे हैं वे पिछले तीन कटु, तिक्त तथा कषाय रसों में जो पूर्वोक्त तीन द्विक हैं-उनमें प्रत्येक के साथ जोड़ने चाहिये जिससे चतुष्कसंयोग बनते हैं। यथा—१. मधुराम्लकटुतिक्त (लशुनान्वितं सुरादिकम्) २. मधुराम्लकटुकषाय (काञ्जिकान्वितैरण्डतैलादि खदिरान्वितशिलाहादिकं च) ३. मधुराम्लतिक्तकषाय (उदुम्बरान्वितं यवासशर्करादिकम्) ४. मधुर लवणकटुतिक्त (वार्ताकफलादिकम्) ५. मधुरलवणकटुकषाय (गोमूत्रान्वितं तैलादिकम्) ६. मधुरलवणतिक्तकषाय (समुद्रफेनशर्कराचित्रकान्वितबदरादि) ७. अम्ललवणकटुतिक्त (सुवर्चलान्वितहस्तिनीदध्यादिकृतसुरादिकम्) ८. अम्ललवणकटुकषाय (सौवर्चलान्वितहस्तिनीदध्यादिकम्) ९. अम्ललवणतिक्तकषाय (औद्भिदलवणान्वितं शुकमांसादिकम्) पूर्व मधुराम्ललवण, पिछले कटु तिक्त कषाय में से एक २ के साथ पृथक् २ जुड़ते हैं। यथा—१. मधुराम्ललवणकटु (गोमूत्रान्वितशिलाजतु प्रभृतिकम्) २. मधुराम्ललवणतिक्त (गोमूत्रैकशफक्षीरादिकम्) ३. मधुराम्ललवणकषाय (सैन्धवान्विततक्रादिकम्) पिछले तीन कटु, तिक्त एवं कषायरस प्रथम तीन-मधुर, अम्ल तथा लवण में से प्रत्येक के साथ पृथक् २जुड़ते हैं जिससे चतुष्क संयोग बनते हैं। यथा—१.

संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] खिलस्थानम् ४०७

कटुतिक्तकषाय मधुर (तिलगुग्गुल्वादिकम्) २. कटुतिक्तकषायाम्ल (बालमूलकहस्तिनीदध्यादिकम्) ३. कटुतिक्तकषायलवण (सरोमकं बालबिल्वादिकम्) इस प्रकार चतुष्क संयोग १५ होते हैं। पूर्व सूत्रोक्त ९+द्वितीय सूत्रोक्त ३+तृतीय सूत्रोक्त ३=इस प्रकार चतुष्क १५ होते हैं। इसी प्रकार चरक सू. अ. २६ में तथा सु. उ. अ. ६३ में भी कहा है॥७४॥

षट् पञ्चकाः । षण्णां रसानां मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायाणामैकैकमपनयितव्याः, षट् पञ्चका निष्पद्यन्ते । तद्यथा—अम्ललवणकटुतिक्तकषायः, मधुरलवणकटुतिक्तकषायः, मधुराम्लकटुतिक्तकषायः, मधुराम्ललवणतिक्तकषायः मधुराम्ललवणकटुकषायः, मधुराम्ललवणकटुतिक्त इति । त एते षट् पञ्चकाः । षड्भिर्मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायैरेकः । तद्यथा—मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषाय इति । त एवमेते रसास्त्रिषष्टिविधा¹ भिन्नाः; तत्र संयुक्ताः सप्तपञ्चाशत्, असंयुक्ताः षट् ७५ ।

पंचक (पांच रसों के संयोग) ६ होते हैं। मधुर अम्ल लवण कटु तिक्त तथा कषाय इन छहों रसों में से एक २ रस कम करते जाना चाहिये। इस प्रकार ६ पञ्चक संयोग बनते हैं। तथा—१. अम्ललवण कटु तिक्त कषाय (भल्लातकरौप्यशिलाजतुमिश्रितनिम्बादिकम्) २. मधुरलवणकटुतिक्तकषाय (रसोनादिकम्) ३. मधुराम्लकटुतिक्तकषाय (हरीतकीधात्रीफलादिकम्) ४. मधुराम्ललवणतिक्तकषाय (औद्भिदान्विततक्रादिकम्) ५. मधुराम्ललवणकटुकषाय (कटुत्रययवक्षारान्विततक्रादिकम्) ६. मधुराम्ललवणकटुतिक्त (आमकर्मर्दान्वितं भृष्टवार्ताकफलादिकम्) षष्ट्क संयोग—मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त तथा कषाय इन छहों रसों के संयोग से एक रस बनता है। यथा—१. मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय (एणमांसाणादिकम्) इस प्रकार इन रसों के ६३ भेद हो जाते हैं। इनमें से संयुक्त रस ५७ होते हैं तथा असंयुक्त (पृथक् २) रस ६ होते हैं। चरक सू. अ. २६ में भी कहा है—संयोगाः सप्तपञ्चाशत्कल्पना तु त्रिषष्टिधा ॥७५॥

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥७६॥ ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥७६॥

(इति) खिलेषु रसदोषविभागीयो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥


अथसंशुद्धिविशेषणीयो नाम सप्तमोऽध्यायः

अथातः संशुद्धिविशेषणीयं व्याख्यास्यामः ॥१॥ इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम संशुद्धिविशेषणीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

सिद्धौ विशोधनाख्यायामनुक्तं यद्विशेषणम्। ऊर्ध्वानुलोमयोः सर्वं तत् प्रवक्ष्याम्यतः परम् ॥३॥

सिद्धिस्थान में विशोधन के प्रकरण में ऊर्ध्व तथा अनुलोम शोधन के विषय में जो बातें नहीं कही हैं। उन सबको अब मैं यहां कहूंगा ॥३॥


१. एष एव त्रिषष्टिविधो रसबिकल्पश्चरकसूत्रस्थाने २६ अध्याये; सुश्रुतोत्तरतन्त्रे ६४ अध्याये चोपवर्णितः ।

४०८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७]

चयप्रकोपप्रशमाः पित्तस्य प्रावृडादिषु। श्लेष्मणः शिशिराद्येषु, वायोर्ग्रीष्मादिषु त्रिषु ।।४।।

पित्त का प्रावृट् आदि ऋतुओं में क्रमशः संचय, प्रकोप तथा शान्ति होती है। अर्थात् प्रावृट् ऋतु में पित्त का संचय, शरद् में पित्त का प्रकोप तथा हेमन्त में पित्त की शान्ति होती है। श्लेष्मा का शिशिर आदि ऋतुओं में संचय, प्रकोप तथा शान्ति होती है अर्थात् शिशिर में कफ का संचय, वसन्त में कफ का प्रकोप तथा ग्रीष्म में कफ की शान्ति हो जाती है। तथा वायु का ग्रीष्म आदि ऋतुओं में क्रमशः संचय, प्रकोप तथा शान्ति होती है। अर्थात् ग्रीष्म ऋतु में वात का संचय, वर्षा में प्रकोप तथा शरद् में शान्ति होती है ॥

प्रावृट्शरद्धेमन्ताख्या विसर्गस्त्वृतवस्त्रयः। शिशिरश्च वसन्तश्च ग्रीष्मश्चादानसंज्ञिताः ।।५।।

प्रावृट्, शरद् तथा हेमन्त आदि तीन ऋतुएं विसर्गकाल तथा शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म ऋतुएं आदानकाल कहलाती हैं। विसर्गकाल सौम्य तथा आदानकाल आग्नेय होता है। विसर्गकाल का अर्थ है जिसमें प्राणियों के शरीर तथा बल की वृद्धि होती है। विसृजति जनयत्याप्यमंशं प्राणिनां च बलमिति विसर्गः। आदानकाल में जगत् का आप्यभाग तथा प्राणियों का बल खींचा जाता है। इसलिये—'आददाति क्षपयति पृथिव्याः सौम्यांशं प्राणिनाञ्च बलमित्यादानम्' ।।५।।

विसर्गादानयोर्मध्ये बलं मध्ये शरीरिणाम्। आद्यन्तयोस्तु दौर्बल्यमन्ताद्योरुत्तमं बलम् ।।६।।

विसर्गकाल तथा आदानकाल के मध्य में अर्थात् शरद् और वसन्त ऋतु में प्राणियों का बल मध्यम होता है। अर्थात् इन ऋतुओं में मनुष्यों का बल न बहुत अधिक होता है और न बहुत कम। विसर्गकाल के आदि (प्रावृट् ऋतु) तथा आदानकाल के अन्त (ग्रीष्म ऋतु) में मनुष्यों में दुर्बलता होती है। विसर्गकाल के अन्त (हेमन्त ऋतु) तथा आदानकाल के प्रारंभ (शिशिर ऋतु) में पुरुषों का बल उत्तम (श्रेष्ठ) रहता है ।।६।।

हेमन्ते स्निग्धशीताभिरद्भिरोषधिभिस्तथा। चितोऽपि शैत्यात् प्रस्कन्नः कफो नात्र प्रकुप्यति ।।७।।
स कुप्यति हिमापाये संतप्तो भास्करांशुभिः। तस्मात् संशोधनं तत्र कर्तव्यं वमनोत्तरम् ।।८।।

हेमन्त ऋतु में स्निग्ध एवं शीतल जल तथा ओषधियों के द्वारा संचित हुआ भी कफ ठण्ड से जमा हुआ होने के कारण इस ऋतु में कुपित नहीं होता है। वही कफ ठण्ड के समाप्त हो जाने पर सूर्य की किरणों के द्वारा संतप्त होने के कारण कुपित हो जाता है। अर्थात् हेमन्त के बाद वसन्त ऋतु में कफ का प्रकोप हो जाता है इसलिये इस ऋतु (वसन्त) में वमन द्वारा शरीर का संशोधन करना चाहिये। वमन द्वारा शरीर का संशोधन 'माधवप्रथमे मासि' के अनुसार चैत्र मास में कराना चाहिये। कफ के प्रकोप को शान्त करने के लिये वमन श्रेष्ठ माना गया है। चरक सू. अ. २० में इसका उल्लेख मिलता है ।।७-८।।

ग्रीष्मे निष्पीतसारत्वाद्रसानां विचितोऽपि सः। औष्ण्यातिरेकात् कालस्य वायुरत्र न कुप्यति ।।९।।
रवेरम्बुदसंरोधात् प्रकुप्यत्यम्बुदागमे। बस्तिकर्मोत्तरं तत्र प्रतिकर्म विशिष्यते ।।१०।।

ग्रीष्म ऋतु में सम्पूर्ण रसयुक्त पदार्थों के सारभाग के सूर्य की किरणों के द्वारा पान किया जाने के कारण संचित हुआ भी वायु इस ऋतु में उष्णता की अधिकता के कारण प्रकुपित नहीं होता है। अर्थात् यद्यपि ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणों के द्वारा जगत् के प्रत्येक पदार्थ के रस (सार भाग) का शोषण किया जाने से शरीर में रूक्षता के कारण वायु संचित हो जाता है तथापि काल के उष्ण होने के कारण वायु प्रकुपित नहीं होता है। वायु शीतगुण वाला होने के कारण शीतकाल में ही प्रकुपित हो सकता है। क्योंकि 'वृद्धिः समानैः सर्वेषाम् के अनुसार समान गुण (शीत) के कारण समान वस्तु (वायु) की वृद्धि होती है इसलिये उष्णकाल में वायु का प्रकोप नहीं हो पाता है। इसीलिये चरक में कहा भी है—'शीतः शीते प्रकुप्यति'। वही वायु वर्षार्ऋतु के आने पर बादलों में सूर्य के छिप जाने से प्रकुपित हो जाता है। अर्थात्