भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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यूषनिर्देशीयाध्यायः ४] खिलस्थानम् ३८५

ओदन के विपरीत गुण—अच्छी प्रकार स्विन्न न होना (अच्छी प्रकार पका हुआ न होना), क्लेद का न होना, असाकल्य (चावलों का पूरे रूप में न होना), मांड का चुआया न जाना, विरस तथा अविशद (रस तथा विशदता का अभाव) और ठण्डा होना—ये ओदन के विपरीत गुण हैं अर्थात् ये ओदन के अप्रशस्त गुण हैं ।।७१।।

द्वाविंशतिभागेन तण्डुलैः सह साधयेत् । तथा पञ्चदशाख्येन यवागूर्दशकेन वा ।।७२।।

यवागू बनाते हुए चावलों को बीस भाग, पन्द्रह भाग अथवा दस भाग पानी के साथ सिद्ध करना चाहिये ।।७२।।

विंशतेः स्फुटितैः सिक्थैस्तुल्याधोमध्यतोपरि ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २०९ तमं पत्रम्) ।
अह^१स्तहार्या पेया स्याद्यवागूः सपरिग्रहाः ।।७३।।

पेया तथा यवागू में अन्तर—जो बीस गुने पानी में सिद्ध की हुई हो, सिक्थ (चावलों की कणियां) जिसमें स्फुटित हों, ऊपर नीचे तथा मध्य में समान रूप से द्रव होने के कारण हाथ से जो ग्रहण न की जा सके—उसे पेया कहते हैं । तथा जो परिग्रह युक्त अर्थात् हाथ से ग्रहण की जा सकने वाली हो—उसे यवागू कहते हैं । अन्यत्र इनके भेद निम्न प्रकार से दिये हैं—सिक्थकै रहितो मण्डः पेया सिक्थसमन्विता । यवागूर्बहुसिक्था स्याद् विलेपी विरलद्रवा ।। अर्थात् अल्प सिक्थयुक्त द्रव्य को पेया तथा सिक्थ प्रधान द्रव्य को यवागू कहते हैं ।।७३।।

घना विशीर्णा शीता च न चावक्षीणतण्डुला । पिच्छिला विशदाऽहृद्या यवाग्वा दोषसंग्रहः ।।७४।।

यवागू के दोष—बहुत गाढ़ी, विशीर्ण (पतली), ठण्डी, चावलों का कम न होना, पिच्छिलता, विशदता तथा अहृद्या (हृदय को अच्छी न लगना)—ये यवागुओं के दोष है ।।७४।।

तक्रसिद्धा यवागूस्तु दधिसिद्धा च ते घने । संस्कृते हस्तहार्ये ते प्रतिषिद्धे क्रियावताम् ।।७५।।
उष्णा घना प्रशिथिला दलितैस्तण्डुलैः कृता ।

तक्र एवं दही में सिद्ध की हुई जो यवागू सान्द्र एवं संस्कारयुक्त हो, हाथों से जिसका ग्रहण हो सके तथा जो उष्ण, घन (गाढ़ी-सान्द्र), शिथिल तथा टूटे हुए चावलों से बनाई हुई हो—उनका क्रियायुक्त व्यक्तियों के लिये निषेध है ।।७५।।

विलेप्या गुणदोषांस्तु यवाग्वा इव निर्दिशेत् ।।७६।।

विलेपी के गुण एवं दोष यवागू के समान ही जानने चाहिये ।।

दीर्घोपवासिनां नृणां क्षीरपेया प्रशस्यते । शीतपित्तोपशमनी बृंहणी वर्चबन्धनी ।।७७।।

लम्बे उपवास करनेवाले व्यक्तियों के लिये क्षीर पेया प्रशस्त मानी गई है । यह शीत पित्त को शान्त करती है, बृंहणकारक है तथा मल को बांधती है ।।७७।।

शूलघ्नी दीपनी पेया दीपनीयोपसाधिता । पाचनी पचनी चोक्ता कषायैर्वर्चबन्धनी ।।७८।।

दीपन द्रव्यों से सिद्ध की हुई पेया शूल को नष्ट करती है, दीपक हैं, पाचक है, स्वयं पचने वाली है तथा कषायों के द्वारा मल को बांधती है ।।७८।।

बिल्वं दधित्थं सह दाडिमेन सव्योषचाङ्गेरिकृता यवागूः ।
सांग्राहिणी दीपनपाचनी च सपञ्चमूलाऽनिलपीडिते तु ।।७९।।


१. विंशतिभागजलसिद्धा स्फुटितसिक्था उपर्यधोर्ध्वभागेषु समानरूपा द्रवतया हस्तेन ग्रहीतुमयोग्या पेया, ग्रहीतं योग्या तु यवागूरित्यर्थः ।