भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 746

३८६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् यूषनिर्देशीयाध्यायः ४]

त्रिकटु तथा चांगेरी के साथ बिल्व एवं दधित्थ (कपित्थ) की बनाई हुई, अनारदाने से युक्त यवागू संग्राहक (Astringent) तथा दीपक और पाचक होती है। तथा पञ्चमूल के सहित बनाई हुई यवागू वायु से पीड़ित रोग में प्रयुक्त की जाती है ॥७९॥

बला वृषत्पर्ण्यथ शालपर्णी स्याद्दाडिमं बिल्वशलाटुयुक्तम् । पेया हिता पित्तकफातिसारे तोयं च तत्तत्र वदन्ति पेयम् ॥८०॥

बला, वृषत्पर्णी (आखुकर्णी), शालपर्णी, अनार तथा बिल्वशलाटु (कच्चा बिल्व) से युक्त पेया पित्त तथा कफातिसार में हितकर होती है। इस अवस्था में इसका जल पीना चाहिये ॥८०॥

एषैव दध्ना रुचिवर्धनी स्यान्निर्वाहिकां हन्ति तिलोपसिद्धा । रक्तातिसारं शमयत्युदीर्णमसृग्दरं गर्भपरिस्रवं च ॥८१॥

यही पेया दही के साथ रुचिवर्धक होती है। तिलों के द्वारा सिद्ध की हुई यह प्रवाहिका को नष्ट करती है। यह उत्पन्न हुए रक्तातिसार, रक्तप्रदर तथा गर्भस्त्राव को शान्त करती है ॥

सदाडिमा सातिविषाऽथ साम्ला पेया भवेदामविपाचनीया । स्यात् कण्टकारीरसगोक्षुराभ्यां सफाणिता मूत्रगदे यवागूः ॥८२॥

अनार, अतीस तथा अम्ल द्रव्यों से युक्त पेया आम का पाचन करती है। कण्टकारी के रस तथा गोखरु में फाणित (राब) मिलाकर बनाई हुई यवागू मूत्र रोगों में हितकर होती है ॥८२॥

सुवर्चिकाक्षारविडङ्गशिग्रुसपिप्पलीमूलकृता यवागूः । तक्रेापसिद्धा क्रिमिनाशनी स्याद्गुल्मेऽथ कासे ग्रहणीगदे च ॥८३॥

सज्जीक्षार, विडङ्ग, सुहांजना तथा पिप्पलीमूल के द्वारा बनाई हुई एवं तक्र से सिद्ध की हुई यवागू कृमिनाशक होती है तथा गुल्म, कास और ग्रहणी रोग में प्रयुक्त होती है ॥८३॥

मृद्वीकलाजामधुपिप्पलीभिः ससारिवा तृड्शमनी यवागूः । विषं निहन्त्याशु त सोमराज्ञा, वराहनियूहकृता तु बल्या ॥८४॥

मुनक्का, लाजा (खील), मधु, पिप्पली तथा सारिवा से युक्त यवागू प्यास को शान्त करती है। सोमराजी (वाकुची) से युक्त यवागू विष को नष्ट करती है तथा वराह (सूअर) के निर्यूह से बनाई हुई यवागू बल्य (बलकारक) होती है ॥८४॥

कार्श्यार्थमिष्टा तु गवेधुकानां, सर्पिष्मती सैन्धवयुग्बलाय । द्विपञ्चमूलोदकसाधिता तु श्वासं च कासं च कफं च हन्ति ॥८५॥

गेहुओं की यवागू कृशता के लिये श्रेष्ठ मानी गई है। घृत तथा सैन्धव से युक्त यवागू बलकारक होती है। दोनों पञ्चमूल अर्थात् दशमूल से सिद्ध की हुई यवागू श्वास, कास तथा कफ को नष्ट करती है ॥८५॥

शाकैः समांसैः सतलैः समाषैः सर्पिष्मती स्नेहनभेदनी तु । जम्ब्वाम्रयोरस्थिदधित्थबिल्वैस्तैरम्लयुग्वर्चविबन्धनी तु ॥८५॥

शाक, मांस, तिल, उड़द तथा घृत युक्त यवागू स्नेहन तथा मल का भेदन करती है। जामुन तथा आम की गुठली, दधित्थ (कपित्थ) तथा बिल्व की आम्लयुक्त यवागू मल को बांधती है ॥८६॥