भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 714
३५४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्विशेषनिर्देशीयाध्यायः २ ]

विशेषनिर्देशीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः ।

अथातो विशेषनिर्देशीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम विशेषनिर्देशीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।

महर्षिं कश्यपं वृद्धं वेदवेदाङ्गपारगम् । सुखोपविष्टमव्यग्रमपृच्छद् वृद्धजीवकः ।।३।।
वेद वेदाङ्ग के पण्डित, ज्ञान में वृद्ध, व्यग्रता से रहित तथा सुखपूर्वक बैठे हुए महर्षि कश्यप से वृद्धजीवक ने प्रश्न किया ।।३।।

विषमाणां ज्वराणां ते सविकल्पं सविस्तरम् । यद्यथावच्च यावच्च प्रोक्तं वक्तव्यमादितः ।।४।।
पहले आपने विषम ज्वरों के विषय में जो भी तथा जितना भी वक्तव्य है वह विकल्प (भेद) एवं विस्तार सहित सब कह दिया है ।।४।।

सामान्येनापि सर्वेषां ज्वराणां विगतज्वर ! । वक्तुमर्हसि कार्त्स्न्येन परिशेषमतः परम् ।।५।।
हे विगतज्वर ! (जिसका ज्वर-सन्ताप नष्ट हो गया है) अब आप सामान्य रूप से सब ज्वरों के विषय में जो कुछ वक्तव्य है उसका विस्तारपूर्वक उपदेश करें ।।५।।

इति संचोदितः प्राह प्रजापतिरिदं वचः । समासाभिहितं यच्च (यच्च) नाभिहितं हितम् ।।६।।
ज्वरितानां ज्वराणां च भूयो वक्ष्यामि तच्छृणु । अवस्था लक्षणोद्देशविशेषोपक्रमे क्रमात् ।।७।।
इस प्रकार प्रश्न किया जाने पर प्रजापति कश्यप ने निम्न वचन कहा—ज्वरयुक्त व्यक्तियों तथा ज्वरों के विषय में पहले जो संक्षेप से कहा है तथा जो बिलकुल नहीं कहा है वह मैं क्रमशः अवस्था, लक्षण, उद्देश तथा विशेष उपक्रम के अनुसार अब पुनः कहूँगा। उसे तू सुन ।।६-७।।

भैषज्यमनवस्थायां पथ्यमप्यवचारितम् । गुणं न किञ्चित् कुरुते दोषायैव तु कल्पते ।।८।।
विपरीत अवस्था में प्रयुक्त की हुई ओषधि तथा पथ्य कुछ भी गुण नहीं करते हैं इसके विपरीत वे दोषों को ही करते हैं। वे ही अनुकूल अवस्थाओं में प्रयुक्त करने पर अमृत के समान गुणकारी होते हैं ।।८।।

प्रयुक्तं तदवस्थायाममृतत्वाय कल्पते । वाताद्वाह्यादभिघातात् क्रोधाच्छोकाद्भयात् क्षयात् ।।९।।
श्रमाद् ग्रहाभिषङ्गाच्च वेगानां च विधारणात् । समुत्पन्ने ज्वरे जन्तोर्वमनं न प्रयोजयेत् ।।१०।।
प्रयुक्तं कुरुते क्षिप्रं तीव्रं सोपद्रवं ज्वरम् ।
वायु, बाह्य आघात (चोट आदि), क्रोध, शोक, भय, क्षय, परिश्रम, ग्रहों के आक्रमण तथा वेगों के धारण करने से उत्पन्न हुए ज्वर में रोगी को वमन नहीं कराना चाहिये। उस अवस्था में प्रयुक्त कराया गया वमन शीघ्र ही तीव्र उपद्रवयुक्त ज्वर को उत्पन्न कर देता है ।।९-१०।।

पूरणात्तु समुत्पन्ने ज्वरे ह्यामात्रया श्रयेत् ।।११।।
दोषे वृद्धेऽतिमात्रा च समुत्क्लिष्टे तथैव च । सन्निपातज्वरभयात्त्वरितं वामयेद्भिषक् ।।१२।।
वामितं लङ्घनाद्येन क्रमेणोपक्रमेत्ततः ।