भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 713

विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३५३

ज्वर के आने के दिन चावलों के पानी के साथ नील अपराजिता की मूल को अच्छी तरह पीसकर अथवा मृगराज की वसा (चर्बी) नस्य के रूप में देनी चाहिये ॥८९॥

हरीतकी वचा कुष्ठं निम्बपत्रं पलङ्कषा ।
सिद्धार्थका यवाः सर्पिर्धूपो जीर्णज्वरापहः ॥९०॥

हरीतकी, वच, कूट, नीम के पत्ते, गूगल, सफेद सरसों, जौ तथा घी-इनका धूप जीर्ण ज्वर को नष्ट करता है ॥९०॥

मूलानि सहदेवायाः कटुका रोहिणी वचा । तण्डुलोदकपिष्टोऽयं देहो दाहज्वरापहः ॥९१॥

सहदेवी की जड़, कुटकी, रोहिणी तथा बच-इन्हें तण्डुलोदक के साथ पीसकर देने से दाहज्वर नष्ट होता है ॥९१॥

सुरया सर्वगन्धैश्च तैलमभ्यञ्जनं पचेत् । सर्षपा लसुनं हिङ्गु त्रिव्योषं रोचना वचा ॥९२॥
ऋक्षपित्तं बस्तमूत्रं करञ्जस्य फलानि च । ग्रहज्वराभिभूतानां नस्यकर्माञ्जनं हितम् ॥९३॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २०१ तमं पत्रम् ।)

सुरा तथा सर्वगन्ध की ओषधियों के द्वारा अभ्यङ्ग के लिये तैल का पाक करना चाहिये तथा सरसों, लहसुन, हींग, त्रिकटु, गोरोचन, वच, रीछ का पित्त, बकरे का मूत्र तथा करञ्ज के फल-ग्रह ज्वर से पीडित रोगी में नस्यकर्म तथा अञ्जन के लिये हितकर होते हैं ॥९२-९३॥

सन्निपातविबन्धे च व्यालदष्टे च शस्यते । अर्शःसु योनिशूले च प्रलेपोऽयमनुत्तमः ॥९४॥

उपर्युक्त ओषधियों का ही लेप सन्निपात ज्वर, मलबन्ध, सर्पदंश, अर्श तथा योनि शूल में हितकर होता है ॥९४॥

भीषणैर्हर्षणैश्चैव विचित्राद्भुतदर्शनैः । व्याक्षेपं मनसश्चास्य भिषक्कुर्याज्ज्वरागमे ॥९५॥

ज्वर हो जाने पर चिकित्सक को भीषण (भयंकर) तथा हर्षकारक विचित्र एवं अद्भुत दर्शनों के द्वारा रोगी के मन का परिवर्तन करना चाहिये ॥९५॥

पानं चैतत् प्रदातव्यं स्निग्धस्विन्नस्य देहिनः । त्रिभण्डीमजगन्धां च नीलिनीं कटुरोहिणीम् ॥९६॥
कल्कं वा कटुरोहिण्याः पिबेन्मूत्रसंप्लुतम् । चिकित्सायां च यत् प्रोक्तं तच्च कुर्याद्विधानवित् ॥९७॥

तथा स्निग्ध एवं स्विन्न (जिसे स्नेहन एवं स्वेदन दिया गया हो) रोगी को त्रिभण्डी (त्रिवृत्), अजगन्धा, नीलिनी तथा कटुरोहिणी का क्वाथ पिलाना चाहिये । अथवा कटुरोहिणी का कल्क गोमूत्र के साथ मिलाकर पिलाना चाहिये । इसके अतिरिक्त विधान को जानने वाला वैद्य चिकित्सा में अन्य भी जो कुछ कहा है उसका प्रयोग करे ॥९६-९७॥

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
(इति) खिलेषु विषमज्वरनिर्देशीयो (नाम प्रथमोऽध्यायः) ॥


ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
(इति) खिलेषु विषमज्वरनिर्देशीयो (नाम प्रथमोऽध्यायः) ॥