काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 712, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३५२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] |
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इसलिये बुद्धिमान् व्यक्ति रम्य, विचित्र, हृद्य (हृदय को अच्छे लगने वाले) तथा श्रद्धा (रुचि) उत्पन्न करने वाले आहारों, सुरापान, विष्किर जन्तुओं के मांस के भक्षण, पञ्चगव्य घृत, दूध तथा लशुन के द्वारा रोगी के बलाधान का प्रयत्न करे ॥
उपक्रमेच्चौषधानां प्रयोगैर्विषमज्वरम् । दैवतेज्योपहारैश्च धूपनाभ्यञ्जनाञ्जनैः ॥८०॥
इसके अतिरिक्त ओषधियों के प्रयोग, देवता तथा इज्या के उपहार, धूपन, मालिश, एवं अञ्जनों के द्वारा विषम ज्वर की चिकित्सा करनी चाहिये ॥८०॥
वातोत्तरं स्नेहपानैरभ्यङ्गैः सावगाहनैः । स्निग्धोष्णैरन्नपानैश्च बलिभिश्चाप्युपक्रमैः ॥८१॥
वातप्रधान विषमज्वर की स्नेहपान, अभ्यङ्ग (मालिश), अवगाहन (Tub baths), स्निग्ध एवं उष्ण अन्नपान तथा बलियों के द्वारा चिकित्सा करे ॥८१॥
पित्तोत्तरं तिक्तशीतैः शमनैः सविरेचनैः । पयसा सर्पिषा चैव शीतैश्चाभ्यञ्जनैर्जयेत् ॥८२॥
पित्त प्रधान विषमज्वर की तिक्त एवं शीतल शमन द्रव्य, विरेचन द्रव्य, दूध, घृत तथा शीतल अभ्यञ्जन (मालिशों) के द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये ॥८२॥
वमनैः पाचनीयैश्च लङ्घनैर्लघुभोजनैः । रूक्षोष्णैश्चाप्युपचरेत् कषायैश्च कफोत्तरम् ॥८३॥
कफ प्रधान ज्वर की वमन एवं पाचन द्रव्य, लङ्घन, लघुभोजन तथा रूक्ष एवं उष्ण कषायों के द्वारा चिकित्सा करे ॥
रोमहर्षोऽङ्गमर्दश्च वातपित्तोत्तरे ज्वरे । महाकल्याणकं सर्पिः पञ्चगव्यमथो पिबेत् ॥८४॥
पीत्वा वा महतीं मात्रां सर्पिषः पुनरुल्लिखेत् । तदहर्वा परेद्युर्वा पेयां समरिचां पिबेत् ॥८५॥
वात तथा पित्त प्रधान ज्वर में रोमहर्ष तथा अङ्गमर्द होता है। इसमें महाकल्याणक तथा पञ्चगव्य घृत पिलाना चाहिये। अथवा घृत की बड़ी मात्रा पिलाकर पुनः वमन कराना चाहिये। अथवा उसी दिन या अगले दिन मरिच युक्त पेया पिलानी चाहिये ॥८४-८५॥
राजमूलस्य वा क्वाथं पिबेत् प्रज्वरकं हविः । क्रितोयं ...... मयोगश्चतुर्थकमपोहति ॥८६॥
अथवा ज्वर की प्रबलता होने पर राजमूल का क्वाथ पिलाना चाहिये तथा यज्ञ में ...... आहुति देनी चाहिये इससे चतुर्थक ज्वर दूर हो जाता है ॥८६॥
धारोष्णं वा पयः पीत्वा तद्वमेदिच्छया न वा ।
शीतं वा मधुनाऽशीतं निम्बपत्रोदकं पिबेत् ॥८७॥
अथवा धारोष्ण दूध पीकर स्वयमेव इच्छा से या अनिच्छा से वमन कर देना चाहिये अथवा मधु के साथ शीत या उष्ण निम्बपत्रोदक (नीम के पत्तों का कषाय) पिलाना चाहिये ॥
सर्पिर्वा माहिषं पीत्वा हिङ्गुस्तोकसमन्वितम् । तस्मिन् विदग्ध एवान्नं दध्ना भुञ्जीत केवलम् ॥८८॥
अथवा भैंस के घृत में थोड़ी हींग मिलाकर पिलाना चाहिये तथा इसके विदग्ध हो जाने पर दही के साथ केवल अन्न का सेवन करना चाहिये ॥८८॥
नीलस्यन्दशिफा वाऽपि सुपिष्टा तण्डुलाम्बुना ।
देया ज्वरतिथौ नस्ये मृगराजस्य वा वसा ॥८९॥