भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३५१

ज्वरोष्मणाऽभिसंतप्ते प्रागुष्णादिक्रियाविधिः ॥६८॥ क्रियते नेतरः कस्माच्छीत उष्णस्य बाधकः । यथाऽग्न्यगारे संतप्ते कपाटपुटसंवृते ॥६९॥ भवत्यत्यधिकस्तूष्मा सर्वतः परितापनः । स एवोद्घाटितद्वारे मन्दीभवति तत्क्षणात् ॥७०॥ एवमावृतमार्गेषु दोषैः स्रोतःसु देहिनाम् । ज्वरोष्मा वर्धते देहे यथाहेतुबलाश्रयम् ॥७१॥ उद्घाटनार्थं तत्तेषामुष्णोपक्रम इष्यते । स्तम्भनो हि गुणः शीत उष्णो विलयनः स्मृतः ॥७२॥

ज्वर की उष्णता के द्वारा संतप्त हुए रोगी में सर्वप्रथम उष्ण विधि करनी चाहिये, शीत नहीं। क्योंकि, शीतविधि उष्णता की बाधक होती है। जिस प्रकार संतप्त हुए तथा बन्द दरवाजों वाले अग्न्यागार (अग्निकोष्ठक) में चारों ओर से गरमी पहुंचाने वाली उष्णता अत्यधिक होती है, वही उष्णता अग्न्यागार के दरवाजे खोल देने पर उसी क्षण मन्द हो जाती है। उसी प्रकार रोगियों के शरीर में दोषों के द्वारा बन्द मार्ग वाले स्रोतों में हेतु एवं बल के आश्रय के अनुसार ज्वर की ऊष्मा वृद्धि को प्राप्त होती है। उन बन्द स्रोतों को खोलने के लिये उष्ण चिकित्सा अभिप्रेत है। शीत गुण दोषों का स्तम्भन करने वाला है तथा उष्ण गुण दोषों का विलयन करने (पिघलाने) वाला है ॥६८-७२॥

तस्मादुष्णाम्बु पानाय ज्वरिताय प्रदीयते । तेनास्य दोषाः पच्यन्ते कायाग्निश्चाभिदीप्यते ॥७३॥ ज्वरोष्मा मार्दवं याति विबन्धश्च प्रशाम्यति । तृष्णा निवर्तते चाशु प्रकाङ्क्षा चोपजायते ॥७४॥

इसलिये ज्वर रोग वाले व्यक्ति को पीने के लिये उष्ण जल देना चाहिये। इससे उसके दोषों का पाक हो जाता है तथा जाठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है। ज्वर की उष्णता कम हो जाती है तथा विबन्ध (मलबन्ध) दूर हो जाता है। प्यास शीघ्र ही शान्त हो जाती है तथा भोजन में रुचि उत्पन्न हो जाती है। चरक वि. अ. ३ में भी कहा है-ज्वरितस्य कायसमुत्थानदेशकालानभिसमीक्ष्य पाचनार्थं पानीयमुष्णं प्रयच्छन्ति भिषजः, ज्वरो ह्यामाशयसमुत्थः, प्रायो भेषजानि चामाशयसमुत्थानां विकाराणां पाचनवमनापतर्पणसमर्थानि भवन्ति, पाचनार्थं च पानीयमुष्णं, तस्मादेतज्ज्वरितेभ्यः प्रयच्छन्ति भिषजो भूयिष्ठं, तद्धीयेषां पीतं वातमनुलोमयति, अग्निमुदर्यमुदीरयति, क्षिप्रं जरां गच्छति, श्लेष्माणं च परिशोषयति, स्वल्पमपि च पीतं तृष्णाप्रशमनायोपपद्यते ॥७३-७४॥

ऋते पित्तज्वरादुष्णो विधिः सर्वो ज्वरापहः । तत्राप्यनुष्णाशीतादिरुपचारो विधीयते ॥७५॥

पित्त ज्वर के अतिरिक्त सम्पूर्ण ज्वरों को नष्ट करने के लिये उष्ण विधि का प्रयोग करना चाहिये तथा पित्त ज्वर में भी ऐसा उपचार करना चाहिये जो न उष्ण हो और न शीत हो ॥

इति सप्त यथाप्रश्नं निर्दिष्टा विषमज्वराः । वक्ष्ये सततकादीनां चिकित्सां शृण्वतः परम् ॥७६॥

इस प्रकार प्रश्न के अनुसार सात विषम ज्वरों का निर्देश किया गया है। अब मैं सतत आदि विषय ज्वरों की चिकित्सा कहूँगा। उसे तू सुन ॥७६॥

उपक्रमैः परिक्लिष्टं क्षीणधातुबलौजसम् । ज्वरः पुराणो रूक्षत्वादनुबध्नाति देहिनम् ॥७७॥

चिकित्सा के द्वारा परिक्लिष्ट हुए तथा जिसके धातु, बल एवं ओज क्षीण हो गये हैं ऐसे व्यक्ति को रूक्ष होने के कारण पुराण ज्वर पकड़ लेता है ॥७७॥

तस्मादस्य बलाधाने प्रयतेत विचक्षणः । रम्यैर्विचित्रैराहारैर्हृद्यैः श्रद्धोपपादितैः ॥७८॥ सुराग्रपानैर्मांसानां वैष्किराणां च भक्षणैः । सर्पिषः पञ्चगव्यस्य पयसो लशुनस्य च ॥७९॥

४५ का.सं.

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