भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 710

३५० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विषमज्वरनिदंशीयाध्याय ? ]

अथ कस्माज्ज्वरो जन्तोर्जायते दाहपूर्वकः । स एव हेतुरत्रापि बलीयस्त्वादुदाहृतः ।।५९।।
अत्युदीर्णं यदा पित्तं वायुनाऽल्पेन मूर्च्छितम् ।
अनुबद्धं रसस्थाने श्लेष्मणाऽल्पबलेन च ।।६०।।
दाहः पूर्वं तदा जन्तोः शीतमन्ते प्रवर्तते । सोद्वेपकः सप्रलापस्मृतिबुद्धिप्रमोहनः ।।६१।।

प्रश्न—अब अगला प्रश्न यह है कि मनुष्य को दाहपूर्वक (जिसमें प्रारम्भ में दाह होती है) ज्वर क्यों होता है ?
उत्तर—यहां भी वही कारण है। बलवान् होने के कारण जब उदीर्ण हुआ पित्त अल्प वायु तथा अल्प बलवाले श्लेष्मा के द्वारा मूर्च्छित हुआ रस के स्थान आमाशय में स्थित हो जाता है तब रोगी को प्रारम्भ में दाह होता है तथा बाद में ठण्ड लगती है। इस ज्वर में रोगी को कंपकंपी, प्रलाप (Detirium) तथा स्मृति एवं बुद्धि का व्याघात हो जाता है ।।५९-६१।।

तावेतौ शीतदाहादी ज्वरौ संसर्गसंभवौ । असाध्यः कृच्छ्रसाध्यो वा दाहपूर्वो ज्वरस्तयोः ।।६२।।
इस प्रकार सर्दी एवं गर्मी वाले ये दोनों ज्वर संसर्ग से उत्पन्न होते हैं। इनमें दाह पूर्व (जिसमें प्रारम्भ में गर्मी लगती है) ज्वर असाध्य अथवा कृच्छ्रसाध्य होता है ।।६२।।

प्रत्यनीकगुणाः सन्तो दोषा वातादयः कथम् ।
संभूय कुर्वते रोगानान्योऽन्यं शमयन्ति च ।।६३।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २०० तमं पत्रम्।)

प्रश्न—ये वातादिदोष विरोधी गुण वाले होते हुए भी परस्पर मिलकर किस प्रकार रोगों को उत्पन्न करते हैं तथा विरोधी होने के कारण ये दोष परस्पर एक दूसरे को शान्त क्यों नहीं करते हैं ।।६३।।

स्वभावाददूषणाद्दोषा नान्योन्यशमनाः स्मृताः । यस्मात्तस्माद्बहुविधाः संसृष्टाः कुर्वते गदान् ।।६४।।
विरुद्धा गुणतोऽन्योन्यं कार्यं सत्त्वादयो यथा ।

उत्तर—क्योंकि स्वभाव से तथा दूषित होते के कारण ये दोष परस्पर एक दूसरे को शान्त नहीं करते हैं इसीलिये ये मिलकर अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न करते हैं। जिस प्रकार गुणों में विरुद्ध होते हुए सत्त्व आदि गुण परस्पर मिल-कर कार्य करते हैं ।।६४।।

शिरः संतप्यते कस्माज्ज्वरितस्य विशेषतः ।।६५।।
सति सर्वाङ्गतापे च शैत्यं भवति पादयोः ।

प्रश्न—ज्वर के रोगी का विशेष कर सिर क्यों गरम रहता है तथा सम्पूर्ण शरीर गरम होने पर भी पैर ठण्डे क्यों होते हैं ।।

दोषैरावृतमार्गत्वादूर्ध्वगत्वाच्च तेजसः ।।६६।।
बाहुल्यादिन्द्रियाणां च शिरः संतप्यतेऽधिकम् । तेजसाऽतिप्रवृद्धेन सोमधातुः प्रपीडितः ।।६७।।
अधः प्रपद्यते तेन शैत्यं भवति पादयोः ।।

उत्तर—दोषों के द्वारा मार्गों के बन्द होने से, तेज के ऊर्ध्वगति का स्वभाव होने से तथा इन्द्रियों की बहुलता (अधिकता) के कारण सिर अधिक सन्तप्त (गरम) रहता है। तथा अत्यन्त बढ़ी हुई तेजधातु के कारण पीडित हुआ सोमधातु नीचे की ओर आता है इसलिये रोगी के पैर ठण्डे रहते हैं ।।६६-६७।।