भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 709, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 709

विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३४९

होने से प्रदीप्त (तेजी से जलना) होता है उसी प्रकार धातु एवं बल के क्षीण हो जाने पर ज्वर क्षीण बलवाला हो जाने पर भी उपादान दोषों के बचे होने से मोक्षकाल में विशेष कर बचे हुए दोष रूप हेतुओं को विशेषरूप से दहन करता (जलाता) हुआ अपने बलको प्रकट करता है। यह चिकित्सा की विशेषता के कारण शान्त हो जाता है अथवा रोगी को मार देता है अर्थात् यदि ठीक तरह से चिकित्सा हो जाय तो ज्वर शान्त हो जाता है अन्यथा रोगी समाप्त हो जाता है ॥४७-४९॥

पाकाद्वा शमनाद्वाऽपि शोधनाद्वा हृताधिके । स्वस्थानस्थे नरो दोषे शुद्धस्रोता विसृज्यते ॥५०॥

दोषों के पाचन, शमन अथवा शोधन के द्वारा अपने स्थान में स्थित दोषों के नष्ट हो जाने से शुद्ध स्रोतों वाला मनुष्य ज्वर से मुक्त हो जाता है ॥५०॥

निर्दिष्टो दोषपाकादेरस्माद्धेतुत्रयात् परम् । अन्यत्र चैव नान्योऽस्ति हेतुर्ज्वरविमोक्षणे ॥५१॥

ज्वर से मुक्त होने का इन दोषपाक आदि तीन कारणों के अतिरिक्त और कहीं कोई कारण नहीं होता है ॥५१॥

कस्माद्दोषपरिक्षोभे प्रायशः शीतपूर्वकम् । निर्वर्तते ज्वरो जन्तोः पश्चाद्दाहः प्रवर्तते ॥५२॥

दोषों के प्रकुपित होने पर मनुष्य को ज्वर में पहले ठण्ड तथा बाद में गर्मी क्यों लगती है ? ॥५२॥

वायुर्व्यवायी विशदः शीतो रूक्षश्चलः खरः । पित्तमाग्नेयमुष्णं च तीक्ष्णमल्पं लघु द्रवम् ॥५३॥
सौम्यः शीतो गुरुः स्निग्धो बलवान् कफको बहु । कफो मन्दव्यवायी च चिरोत्थाननिवर्तनः ॥५४॥
वायुश्च शीतसामान्यात् कफस्यानुबलो बली ।
बलवान् हि गुणः सौम्य आग्नेयो दुर्बलः स्मृतः ॥५५॥
हेतुनाऽनेन महता श्लेष्मा हि बलवत्तरः । तस्मात् पूर्वं ज्वरे शीतं पश्चाद्दाहः प्रवर्तते ॥५६॥

उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर—वायु व्यवायी, विशद, शीत, रूक्ष, चल तथा खर होता है। पित्त आग्नेय, उष्ण, तीक्ष्ण, अल्प, लघु एवं द्रव होता है। कफ, सौम्य, शीत, गुरु, स्निग्ध, अत्यन्त बलवान् एवं मन्दव्यवायी होता है तथा इसकी उत्पत्ति एवं निवृत्ति दोनों देर से होते हैं अर्थात् श्लैष्मिक रोग उत्पन्न भी देर में होते हैं तथा समाप्त भी देर में होते हैं। शीत की समानता से वायु भी कफ के समान ही बलवाला होता है। सौम्यगुण बलवान् होते हैं तथा आग्नेय गुण दुर्बल माने गये हैं। इस उपर्युक्त महान् हेतु के कारण कफ अधिक बलवान् होता है। इसीलिये ज्वर में पहले शीत लगती है तथा बाद में दाह होता है। विषमज्वर (मलेरिया) का जब आक्रमण होता है तब पहले Cold stage ही होती है। पीछे Hot stage आती है। अर्थात् पहले ठण्ड लगती है पीछे गरमी। G. E. Beaumont की Medicine में कहा है—He feels cold all over and may vomit. After a Varying period of about 2 hours the skin becomes hot and flushed and the beadache is more intense. This phase persists for 2 or 3 hours and is then followed by sweating and marked relief from the discomforts.

स्ववेगपरिणामाच्च क्रियाभिश्च यदा कफः । उष्णाभिः प्रशमं याति तदा पित्तं प्रकुप्यति ॥५७॥
परीणामक्रियाभिर्वा शान्ते तस्मिन् सुखी भवेत् । हेतुरुक्तो महानेष यथावच्छीतपूर्वके ॥५८॥

अपने वेग के परिणाम तथा उष्ण क्रियाओं के द्वारा जब कफ शान्त हो जाता है तब पित्त प्रकुपित होता है। तथा उसके बाद परिणाम एवं क्रियाओं के द्वारा जब पित्त शान्त हो जाता है तब मनुष्य स्वस्थ हो जाता है। ज्वर में प्रारम्भ में ठण्ड लगने का यह महान् हेतु बतलाया गया है ॥५७-५८॥